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रविवार, 03 अक्तूबर, 2004 को 04:27 GMT तक के समाचार
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क्या बदल सकता है चेहरा भी?
चेहरा
चेहरों के साथ प्रयोग से पहचान पर ही ख़तरा
आपने कभी यह सोचा है कि आज से 50 साल बाद इंसान का चेहरा कैसा नज़र आएगा.

क़ुदरत के नियमों को मानें तो इन्सान तो इन्सान ही रहेगा लेकिन विज्ञान का सहारा लेकर ख़ूबसूरती हासिल करने की चाह इन्सान का चेहरा आने वाले 50 साल में शायद बहुत बदल डाले.

लंदन में एक विज्ञान प्रदर्शनी इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश कर रही है कि डिजिटल युग में इन्सान का चेहरा कैसे-कैसे रूप लेगा.

हॉलीवुड की एक मशहूर फ़िल्म फ़ेस ऑफ़ में जब दो अभिनेता एक दूसरे का चेहरा चुरा लेते हैं तो वह सिर्फ़ एक कल्पना नज़र आती है लेकिन तकनीक ने अब ऐसा आसान बना दिया है कि किसी चेहरे को मन मुताबिक रूप दिया जा सके.

अमरीका में वैज्ञानिकों ने उन शवों पर नए चेहरे लगाने के पहले से ही प्रयोग किए हैं जो चिकित्सा प्रयोगों के लिए दान दिए गए थे.

अब इस तरह के प्रयोग जीवित इन्सानों पर किए जाने के लिए मंज़ूरी का इंतज़ार किया जा रहा है लंदन में विज्ञान प्रदर्शनी में सवाल उठाए गए हैं कि चेहरों के साथ इस तरह खिलवाड़ करने से समाज पर क्या असर पड़ेंगे.

फ़्यूचर फ़ेस नाम की इस प्रदर्शनी में सवाल उठाया गया है कि जिस तरह से डिजिटल तकनीक से फ़ोटो में फ़ेरबदल किए जाते हैं, क्या असल में भी चेहरों के साथ ऐसे ही प्रयोग होने लगेंगे.

ब्रिटेन में हर साल क़रीब पच्चीस हज़ार लोग सर्जरी कराते हैं और इस पर क़रीब सवा दो करोड़ पाउंड ख़र्च किए जाते हैं.

 लोग फ़ोटोशॉप का इस्तेमाल करते हुए अपनी तस्वीरों में तरह-तरह के प्रयोग करते रहते हैं और उनका रंग-रूप बड़ी आसानी से बदला जा सकता है.
सांद्रा केम्प

सर्जरी के इन मामलों में ज़्यादातर ऐसे हैं जो चेहरों की ख़ूबसूरती बढ़ाने के इरादे से कराए जाते हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि चेहरे को बिल्कुल नया रूप दे देना तो अभी मुमिकन ना हो लेकिन ऐसा शायद जल्दी ही संभव हो सकेगा.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन ने एक ऐसी 3डी स्कैनिंग तकनीक विकसित की है जिसमें किसी के चेहरो को छुए बिना ही उस पर सर्जरी के प्रयोग किए जा सकते हैं.

इस तकनीक में चेहरे की स्कैनिंग की जाती है और उसके पचास हज़ार से भी ज़्यादा नक्शे तैयार हो जाते हैं जिन पर तरह-तरह के प्रयोग किए जा सकते हैं लेकिन इसके ज़रिए किसी चेहरे का पूरा रूप नहीं बदला जा सकता.

नए चेहरे की चाहत

इस विज्ञान प्रदर्शनी की कर्ता-धर्ता हैं रॉयल कॉलेज ऑफ़ आर्ट की प्रोफ़ेसर सांद्रा केम्प. वह दृश्य संस्कृति की भी विशेषज्ञ हैं.

सांद्रा कहती हैं कि आज के दौर में कोई भी पहले की तरह अलबम नहीं रखता बल्कि डिजिटल फ़ोटो कंप्यूटरों में रहते हैं.

चेहरों के साथ प्रयोग

"लोग फ़ोटोशॉप का इस्तेमाल करते हुए अपनी तस्वीरों में तरह-तरह के प्रयोग करते रहते हैं और उनका रंग-रूप बड़ी आसानी से बदला जा सकता है."

सांद्रा को चिंता है कि तस्वीरों पर डिजिटल प्रयोगों से ऐसा युग आ रहा है कि जिसमें चेहरों की वह ख़ास पहचान ही ख़त्म ना हो जाए जिनके साथ हर इन्सान इस दुनिया में आता है यानी हर इन्सान का चेहरा दुनिया भर में ख़ास होता है.

"जितना हम अपने चेहरे को ख़ूबसूरत और चिकना बनाने की कोशिश करते हैं, उतना ही हम उसकी ख़ासियत को ख़त्म कर रहे होते हैं."

प्रदर्शनी में यह भी दिखाने की कोशिश की गई है कि चेहरों को नक़ल का इतिहास कब शुरू होता है और उनके साथ कब और किस-किस तरह की छेड़छाड़ की गई.

प्रदर्शनी का मुख्य वाक्य है - "हमारा चेहरा दुनिया में हमारी पहचान है. इसी पहचान के ज़रिए हम अपनी पहचान के साथ-साथ व्यक्तिगत, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थान हासिल करते हैं."

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