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गुरुवार, 27 नवंबर, 2003 को 23:36 GMT तक के समाचार
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बूढ़ी मांसपेशियों को जवान बनाने के प्रयास
ताज़ा अनुसंधान से चोटग्रस्त खिलाड़ियों को लाभ मिलेगा

अमरीका में वैज्ञानिकों ने उम्मीद ज़ाहिर की है कि बूढ़ी और चोटिल मांसपेशियों में नई जान डालना जल्दी ही संभव हो सकेगा.

इस बारे में चूहों पर प्रयोग सफल रहे हैं.

कैलीफ़ोर्निया में स्टैनफ़ोर्ड विश्विद्यालय के वैज्ञानिकों ने रासायनिक संकेतों में फेरबदल कर अपेक्षाकृत ज़्यादा उम्र वाले चूहों को जवानों जैसी मांसपेशियाँ देने में सफल रहे हैं.

विज्ञान पत्रिका 'साइंस' में इस अनुसंधान की रिपोर्ट देते हुए वैज्ञानिकों ने कहा है कि आने वाले दिनों में खिलाड़ियों की चोटग्रस्त मांसपेशियों को नया जीवन दिया जा सकेगा.

इससे मांसपेशियों के शिथिल पड़ते जाने की बीमारी से ग्रस्त लोगों को भी आशा की किरण दिखाई पड़ी है.

और वैज्ञानिकों को इतना तक यक़ीन है कि ताज़ा अनुसंधान आगे चल कर बुढ़ापे की प्रक्रिया के ख़िलाफ़ भी सफलतापूर्वक आजमाया जा सकेगा.

रासायनिक संकेत

उल्लेखनीय है कि जीवों के बूढ़ा होने की स्थिति में चोटिल मांसपेशियों के सामान्य होने में बहुत वक़्त लगता है.

इस बारे में वैज्ञानिकों का यह मानना रहा है कि उम्र बढ़ने पर मांसपेशियों के उतक बनाने वाली कोशिकाएँ ख़त्म हो जाती हैं.

लेकिन अब डॉ. थॉमस रैंडो और उनके सहयोगियों ने पता लगाया है कि मूल समस्या शरीर में रासायनिक संकेतों की प्रक्रिया में गड़बड़ी का है.

उन्होंने यह भी पता लगाया कि इस तरह की गड़बड़ी को ठीक भी की जा सकती है.

वैज्ञानिकों ने मांसपेशियों के बाहरी आवरण पर मौजूद 'सैटेलाइट' कोशिकाओं को सक्रिया बनाने वाले रासायनिक संकेतों पर अपना ध्यान केंद्रित किया.

यही कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त मांसपेशियों से नए उतक बनाने के लिए ज़िम्मेदार होती हैं.

डॉ. रैंडो का मानना है कि क्षतिग्रस्त मांसपेशियों के संबंध में लागू यह सिद्धांत बूढ़ी मांसपेशियों पर भी लागू हो सकती हैं.

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