|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कार्यस्थल में खेलने से बढ़ सकती है उत्पादकता
बचपन में सुनी एक लोकप्रिय कहावत,' पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे बनोगे ख़राब' अब अपनी परिभाषा बदलती नज़र आ रही है. कम से कम हाल में वैज्ञानिकों के एक शोध से तो यही लगता है. निदरलैंड के उट्रेक्ट विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक डच बिमा कंपनी के 60 कर्मचारियों पर खेल के प्रभाव का अध्ययन किया. वैज्ञानिकों के इस दल ने पाया कि ऐसे सभी लोग जो अपने दफ़्तर में थोड़ा समय खेल पर भी देते हैं उनका अपने काम के प्रति नज़रिया बेहतर है. मतलब साफ़ है कि पढ़ लिख कर नवाब बनने के बाद भी अच्छे नवाब बने रहने के लिए ज़रा ध्यान खेल पर भी दे देना ज़रूरी है.
उल्लेखनीय है कि कई बड़ी कंपनियाँ कंप्यूटर में आने वाले तरह तरह के 'गेम्स' को यह कहकर प्रतिबंधित कर देती है कि इससे कर्मचारियों का समय बर्बाद होता है. प्रयोग की विधि इस शोध में लगे प्रोफेसर जेफ़री गोल्डस्टेन का कहना है," इस बारे में बहुत कम खोजबीन हुई है कि किस तरह से खेल कर्मचारियों के काम करने की उत्पादकता, संतुष्टि या उनकी उपस्थिति को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं." उन्हें इस प्रयोग के लिए किसी कंपनी की तलाश में काफ़ी मेहनत करनी पड़ी. शोध की टीम ने प्रयोग की जा रही कंपनी के कर्मचारियों को अलग अलग दलों में बाँट दिया. फिर उनमें से कुछ को कंप्यूटर के कुछ सरल खेल जैसे सॉलिटेयर औ माइनस्वीपर खेलने के लिए कहा गया और कुछ को खेलने से रोक दिया गया. बीबीसी न्यूज़ ऑनलाइन से बात करते हुए प्रोफ़ेसर गोल्डस्टेन ने बताया," हमलोगों ने उनसे कहा कि आप अगले एक महीने तक रोज़ एक घंटे का समय काम से निकाल कर खेलने में दे सकते हैं. ये आप पर है कि आप किस वक्त खेलना पसंद करेंगे." इसके बाद कर्मचारियों के खेलों, खेलने के समय, उनकी आदतों पर भी पूरी नज़र रखी गई. इस बात का भी लेखा जोखा रखा गया कि वे खेलने के बाद काम करने में कैसा महसूस करते हैं. प्रोफ़ेसर गोल्डस्टेन ने बताया ," इस शोध से ये पता लगता है कि खेलने के बाद कर्मचारियों की काम करने की उत्पादकता बढ़ जाती है." इस अध्ययन से तो यही पता चलता है कि खेल समय की बर्बादी नहीं बल्कि हैं बल्कि ये तो हमारे काम करने की क्षमता को और भी बढ़ाते हैं, उन्हें रोचक बनाते हैं. इससे दिमाग़ को काम करने की पेचीदगियों से कुछ समय के लिए ही सही छुट्टी मिलती है जिससे एक नई ताज़गी आ जाती है. प्रोफ़ेसर गोल्डस्टेन का कहना है कि फ़िलहाल ये अध्ययन अपनी प्रारंभिक अवस्था में है लेकिन धीरे धीरे इसे काफ़ी कारगर बनाया जा सकता है. काम के बीच में खेलने से हम अपना ध्यान कुछ समय के लिए बाँट सकते हैं. इससे दिमाग को भी आराम मिलता है और ख़ुद को आनंद की अनुभूति. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||