माइक्रोवेव हेलमेट फौरन भांप लेगा 'स्ट्रोक'

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- Author, मिशेल रॉबर्ट्स
- पदनाम, हेल्थ एडिटर, बीबीसी न्यूज़
स्वीडन के वैज्ञानिकों के अनुसार उन्होंने एक ऐसा हेलमेट तैयार किया है जो ये तुरंत पता लगा सकता है कि मरीज़ को 'स्ट्रोक' यानी पक्षाघात हुआ था या नहीं.
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस हेलमेट की मदद से 'स्ट्रोक' के लक्षणों को पहचानने और इसका इलाज करने में तेजी आ सकती है. इससे मरीज के ठीक होने की संभावना कई गुना बढ़ जाएगी.
ये हेलमेट अपनी सूक्ष्म तरंगों की मदद से ये पता करता है कि मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त वाहिका से ख़ून का रिसाव तो नहीं हो रहा या खून का थक्का तो मौजूद नहीं.
ये उपकरण बनाने वाले स्वीडन के वैज्ञानिकों ने 45 मरीजों पर इसका परीक्षण किया, जो सफल रहा. अब वैज्ञानिकों ने तय किया है कि वे एंबुलेंसकर्मियों के दल को इसका परीक्षण करने का मौका देंगे.
कम समय
'स्ट्रोक' की स्थिति में इस बात की सख्त जरूरत होती है कि डॉक्टर बिना एक पल गंवाए फौरन इलाज शुरू करे. इलाज में लगने वाला समय काफी मायने रखता है क्योंकि तुरंत इलाज से मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को सीमित किया जा सकता है.
'स्ट्रोक' के बाद अस्पताल पहुंचने और इलाज शुरू होने में चार घंटे से ज्यादा वक्त लगने पर <link type="page"><caption> मस्तिष्क</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2012/10/121009_tomato_stroke_am.shtml" platform="highweb"/></link> के उत्तक नष्ट होने लगते हैं.
मरीज का बेहतर इलाज करने के लिए डॉक्टर सबसे पहले ये जानने की कोशिश करता है कि कहीं इस 'स्ट्रोक' का कारण रक्त नलिकाओं में ख़ून का रिसाव या नलिका का खून के थक्के से बंद होना तो नहीं.

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कंप्यूटराइज्ड टोमोग्राफी (सीटी) स्कैन से रक्त स्राव या थक्के का पता चल तो जाता है लेकिन मरीज के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती होने के बावजूद इसकी व्यवस्था करने में कुछ समय लग जाता है.
ऐसी नाजुक स्थिति में इलाज में आने वाला किसी तरह का भी विलंब मरीज के लिए जानलेवा साबित होता है.
फौरन इलाज
इलाज की प्रक्रिया को तेज करने के लिए स्वीडन के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा मोबाइल डिवाइस, माइक्रोवेव हेलमेट, तैयार किया जो 'स्ट्रोक' के फौरन बाद मरीज के अस्पताल पहुंचने के पहले रास्ते में ही इस्तेमाल किया जा सकता है.
मस्तिष्क के भीतर किस तरह की प्रक्रिया चल रही है, ये जानने के लिए यह हेलमेट माइक्रोवेव संकेतों का इस्तेमाल करता है. ये तरंगें वैसी ही हैं जो माइक्रोवेव अवन या मोबाइल फोन में होती हैं, लेकिन ये उनके मुकाबले कमजोर होती हैं.
शोधकर्ताओं का कहना है कि उपकरण पर अभी और काम करने की जरूरत है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि ये भविष्य में ये काफी उपयोगी साबित हो सकता है.
उन्होंने 'ट्रांजैक्सन ऑन बायोमेडिकल इंजीनियरिंग' पत्रिका को बताया कि डॉक्टरों को 'स्ट्रोक' के मरीजों का इलाज करने के लिए माइक्रोवेव हेलमेट के साथ ही, दूसरे डायग्नोस्टिक तरीकों का इस्तेमाल करने की भी जरूरत पड़ सकती है.
ब्रिटेन के 'स्ट्रोक' एसोसिएशन के डॉक्टर शमीम कादिर ने कहा, "जब व्यक्ति को लकवा मारता है तो मस्तिष्क को <link type="page"><caption> ऑक्सीजन की कमी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2011/05/110508_coffee_sex_stroke_mg.shtml" platform="highweb"/></link> होने लगती है. इससे मस्तिष्क के प्रभावित हिस्से में कोशिकाएं मरने लगती हैं. ऐसे में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जितनी जल्दी हो सके स्ट्रोक का पता लगाया जाए और इलाज शुरू हो."
उन्होंने बताया, "वैसे यह शोध अभी अपने पहले चरण में ही है, लेकिन यह बताता है कि माइक्रोवेव आधारित प्रणाली सस्ती और सुलभ हो सकती है. इससे 'स्ट्रोक' के प्रकार को तुरंत पहचानने और उसका जल्द से जल्द इलाज करने में मदद करती है."
उनके मुताबिक़, "जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी 'स्ट्रोक' का पता लगाने और इलाज करने से 'स्ट्रोक' के जानलेवा प्रभावों में कमी लाई जा सकती है. इससे मरीज जल्दी ठीक हो जाते हैं. क्योंकि इस बीमारी में समय गंवाना, जान गंवाने के बराबर होता है."
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां <link type="page"><caption> क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












