दिमाग किस तरह फ़ैसले करता है?

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    • Author, टॉबी मैकडोनाल्ड
    • पदनाम, प्रोड्यूसर, हॉरिज़न प्रोग्राम, बीबीसी

हम जब कोई भी फ़ैसला लेते हैं, किसी नतीजे पर पहुंचते हैं तो उससे पहले हमारे दिमाग में द्वंद्व चल रहा होता है- सहज बोध और तार्किकता के बीच. इस द्वंद्व में जिसकी जीत होती है, हमारा नतीजा उसी से प्रभावित होता है.

अगर आप ये सोचने लगे हों कि आप तार्किकता से फ़ैसले लेते रहे हैं तो एक मिनट ठहरिए क्योंकि वैज्ञानिक आधार पुष्टि करते हैं कि दिमाग में सहज बोध वाला हिस्सा कहीं ज़्यादा शक्तिशाली होता है.

हम लोगों में से ज़्यादातर लोग मानते हैं कि हम तार्किकता से फ़ैसले लेते हैं लेकिन ज़्यादतर मामलों में ऐसा होता नहीं है.

प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डेनियल काहनेमन ने इंसानी दिमाग के इसी पहलू को भांपने पर काम शुरू किया जिसने आगे चलकर उन्हें नोबेल पुरस्कार दिलाया.

उन्होंने अपने काम में इंसानी ग़लतियों को आधार बनाया. ये अचानक हुई ग़लतियां नहीं हैं बल्कि ऐसी ग़लतियां हैं जो हम सब करते हैं, हमेशा और इसका एहसास भी नहीं होता.

प्रोफ़ेसर काहनेमन ने येरूशलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रहे एमोस टेवर्स्के के साथ काम किया था, जो स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से भी जुड़े रहे. हालांकि एमोस का अब निधन हो चुका है लेकिन इन दोनों ने तर्क के आधार पर यह साबित करने के कोशिश की कि हमारे अंदर सोचने की दो व्यवस्थाएं काम करती हैं.

सोचने की दो व्यवस्थाएं

एक दिमाग का वह हिस्सा है जो किसी समस्या की गंभीरता को आंकता है और उसका एक तार्किक हल बताता है.

हम लोग अपने दिमाग के इस हिस्से के बारे में जानते हैं. यह समस्या को सुलझाने का विशेषज्ञ है लेकिन यह धीमे काम करता है. इसे काम करने के लिए बड़ी ऊर्जा की ज़रूरत होती है.

अब इसे समझने के लिए एक उदाहरण को समझा जा सकता है. टहलते वक़्त आपसे किसी ने कोई जटिल सवाल पूछ लिया तो सबसे पहले आप रुक जाते हैं क्योंकि सजग और चौकस दिमाग एक साथ दो काम कर ही नहीं सकते.

लेकिन इसके अलावा दिमाग में एक दूसरा हिस्सा भी होता है. जो अपने आप सहज बोध से काम करता है. यह तेज़ भी होता है और भी ऑटोमेटिक काम करता है. यह शक्तिशाली है, लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर नज़र नहीं आता. हालांकि यह इतना शक्तिशाली होता है कि हम जो भी काम करते हैं, सोचते हैं या मानते हैं, सबमें इसकी अहम भूमिका होती है.

इतना सब कुछ होता है लेकिन आपको पता नहीं होता. क्योंकि यह अपने आप ही काम करता है और कई बार तो आपको अपने अंदर ही किसी दूसरे के होने का बोध कराता है.

ज़्यादातर समय में हमारा तेज़ और सहज बोध वाला दिमाग हमारे रोजमर्रा के फ़ैसलों में अपनी भूमिका निभाता है. लेकिन मुश्किल तब पैदा होती है जब सहज बोध वाला दिमाग वह फ़ैसले ले लेता

है जो हमारी धीमी और तार्किक प्रणाली को लेना चाहिए. यहीं पर ग़लतियां होती हैं.

पूर्वाग्रह से प्रभावित दिमाग

ऐसी ग़लतियों को मनोचिकित्सक कॉजिनिटिव बायस (पूर्वाग्रह संबंधी धारणाएँ) कहते हैं. यह हमारे हर काम को प्रभावित करता है. इसके चलते ही हम ज़्यादा पैसे ख़र्च करने लगते हैं, सोचते हैं कि इससे लोग हमारे बारे में प्रभावित होंगे. यह हमारी सोच, विचार और फ़ैसले को प्रभावित करता है और हमें इसके बारे में कुछ भी पता नहीं चलता.

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इस पर यकीन करना मुश्किल है, महज इसलिए क्योंकि हमारा तार्किक दिमाग कोई ना कोई कहानी गढ़ लेता है. हमारी अधिकांश सोच एवं मान्यताएं अपने आप उत्पन्न होती है, लेकिन इसके बाद तार्किक दिमाग इसके कारण ढूंढ लेता है.

डेनिएल काहनेमन कहते हैं, "हमारी क्या राय है, हम सोचें कि इसके लिए हमारे पास तर्क हैं, ऐसी ग़लती हम प्राय: करते हैं. हमारी सोच और इच्छा और हमारी उम्मीद हमेशा तर्क पर आधारित नहीं होते."

उत्तीर कैरोलिना की ड्यूक यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉन एरेली कहते हैं, "पूर्वाग्रह के चलते हम कई काम करते हैं, मसलन ज़्यादा खाते हैं, सिगरेट पीते हैं, एसएमएस करते हैं, गाड़ी चलाते हैं और असुरक्षित सेक्स संबंध बनाते हैं."

पूर्वाग्रह के अलावा एक कंफर्मेशन बायस भी होता है, यह उन जानकारियों के प्रति होता है जिसके बारे में हम पहले से ही जान रहे होते हैं. इसके चलते ही हम वह अख़बार ख़रीदना पसंद करते हैं जो हमारे विचार से मेल खाता है.

मनोविज्ञान नहीं, अर्थशास्त्र

एक निगेटिव बायस भी हमारे अंदर होता है, जिसके चलते हमें नकारात्मक घटनाएं सकारात्मक घटनाओं के मुक़ाबले पहले याद आती हैं.

इन पूर्वाग्रह की मान्यताओं का सबसे ज़्यादा असर हमारे पैसे से जुड़ा होता है. यही वजह है कि प्रोफ़ेसर काहनेमन को नोबेल पुरस्कार मनोविज्ञान में नहीं मिला था, क्योंकि मनोविज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार दिया ही नहीं जाता है बल्कि अर्थशास्त्र के लिए दिया गया. क्योंकि उनके सिद्धांतों के चलते अर्थशास्त्र की नई शाखा व्यावहारिक अर्थशास्त्र की शुरुआत हुई.

उन्होंने यह भी महसूस किया था कि फ़ायदे और नुक़सान में हम अलग-अलग तरीक़े से रिएक्ट करते हैं. उनके मुताबिक़ नुक़सान में हमारा दुख ज़्यादा होता है, फ़ायदे में उतनी प्रसन्नता नहीं होती.

परंपरागत अर्थशास्त्र में यह माना जाता है कि हम अपने सारे फ़ैसले तार्किकता के आधार पर लेते हैं. लेकिन हक़ीकत इससे बेहद अलग होती है. व्यावहारिक अर्थशास्त्री अब कोशिशों में जुटे हैं कि एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनाई जाए जो हमारे फ़ैसलों की वास्तविकता पर आधारित हों.

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