इंटरनेट न होता तो बीमारी का पता कभी न चलता

एमी और जेन ह्यूज़
    • Author, जेन ड्रेपर
    • पदनाम, स्वास्थ्य संवाददाता, बीबीसी न्यूज़

एमी गार्टन ह्यूज़ 22 साल की हैं लेकिन उनके शरीर का आकार एक 8 साल के बच्चे जितना है.

उन्हें कोकाएने सिंड्रोम है. यह एक दुर्लभ आनुवांशिक विकार है जिससे शरीर विकृत होने लगता है और आयु कम होती है.

इस बीमारी से एमी का संतुलन बिगड़ गया है. उनकी आवाज़ ख़राब हो गई है और उनमें मनोभ्रंश (डिमेंशिया) के लक्षण हैं. इसके बावजूद वह व्यस्त रहती हैं. वह संगीत सुनती हैं, तैराकी करती हैं, बॉउलिंग करती हैं और अपने जैसे शौक वाले दोस्तों से मिलती हैं.

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मेर्सेसाइड में रहने वाली एमी की मां जेन ह्यूज़ ने अपनी बेटी की बीमारी का पता लगाने के लिए सालों का वक़्त लगाया. लेकिन डॉक्टर इससे हैरान थे और लाइब्रेरी की किताबों से कोई जवाब नहीं मिल रहा था.

लेकिन ऑनलाइन सर्च से उन्हें एमी जैसे ही ख़ास तरह की धंसी हुई आंखों और परी-सरीखे चेहरों वाले कई बच्चों की तस्वीरें मिलीं.

जेन कहती हैं, "जब इंटरनेट पर मुझे कोकाएने सिंड्रोम के बारे में पता चला तो वहां उसकी तरह दिखने वाले कई बच्चों की तस्वीरें भी दिखीं."

जेन मज़ाक करते हुए कहती हैं कि अभी हाल ही में उन्होंने 'कट और पेस्ट' करना सीखा है लेकिन उन्हें इंटरनेट काफ़ी काम का लगा है.

आग से खेलने जैसा

उनके परिवार की वेबसाइट, एमी एंड फ़्रेंड्स, दुनिया भर में कोकाएने से ग्रस्त 1500 और बच्चों की भी मदद करती है.

जेन कहती हैं, "अगर इंटरनेट नहीं होता तो मैं अब भी यही पता लगाने की कोशिश कर रही होती कि एमी को हुआ क्या है."

वे कहती हैं, "यह एक जुनून की तरह था मैं चैन से बैठ या सो नहीं पाती थी. मैं अपने दूसरे बच्चों को भी ठीक से नहीं देख पाती थी. इंटरनेट नहीं होता तो मैं न जाने क्या करती."

लेकिन सभी के लिए वेब फ़ोरम और ऑनलाइन लक्षणों की पहचान इतनी फ़ायदेमंद नहीं होती. बल्कि कुछ के लिए तो यह आग से खेलने सरीखा है.

लंदन में इंपीरियल कॉलेज हेल्थकेयर के संचालित एक मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में सामुदायिक मनोचिकित्सक (कम्यूनिटी साइकैट्रिस्ट) ऐसे लोगों का इलाज करते हैं जिन्हें "साइबरकॉन्ड्रिया" है. यह ऐसी व्यग्रता है जो इंटरनेट से और बढ़ती है.

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प्रोफेसर पीटर टायरर कहते हैं, "साइबरकॉन्ड्रिया लोगों में गंभीर बीमारी का डर पैदा करता है. यह लगातार बढ़ रहा है. इसकी आशंका वाले पांच में से चार लोग इंटरनेट पर घंटों समय बिताते हैं."

इस संबंध में उनका शोध दि लांसेट में प्रकाशित हुआ है.

हालांकि अच्छी ख़बर यह है कि सामान्य थेरेपी से इसका इलाज किया जा सकता है.

प्रोफ़ेसर टायरर कहते हैं, "सबसे पहले हम उन्हें कहते हैं कि वह इंटरनेट पर ब्राउज़िंग करना बंद कर दें. हम उन्हें डायरी रखने को कहते हैं, जिसमें साफ़ दिखता है कि जब वह इंटरनेट पर बैठे उनकी व्यग्रता बढ़ गई."

इंटरनेट ब्राउज़िंग
इमेज कैप्शन, इंटरनेट पर बहुत सी वेबसाइट और डॉक्टर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दे रहे हैं

वे कहते हैं, "दिक्कत यह है कि इंटरनेट पर वह सब जानकारी है जो आप चाहते हैं- लेकिन इन जानकारियों के साथ कोई निर्णय नहीं जुड़ा होता."

डॉक्टर का विकल्प नहीं

तकनीक से कई पुरानी बीमारियों के नए समाधान ज़रूर पेश करती है.

डॉ क्रिश्चियन जेसेन डॉक्टर (जनरल प्रैक्टिशनर), टीवी प्रजेंटर और ट्विटर पर अति-सक्रिय रहने वाले हैं. उनका अनुमान है कि उनके 30,000 ट्वीट में से करीब दो तिहाई लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं का जवाब होते हैं.

सबसे ताज़ा उदाहरण एक ऐसे व्यक्ति का है जो अपने कान साफ़ करवाने के लिए अपॉएंटमेंट लेने के लिए परेशान था.

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डॉ जेसेन कहते हैं, "मैंने उन्हें सलाह दी कि वह ऑलिव ऑयल कान में डालें. ऑलिव ऑयल एंटी बैक्टीरियल, एंटीसेप्टिक होता है और मुलायम भी करता है. हो सकता है कि इसके बाद उन्हें कान साफ़ करवाने की ज़रूरत ही न पड़े."

वह कहते हैं, "जब मैंने ऐसा (ट्वीट से स्वास्थ्य समस्या समाधान) करना शुरू किया तो डॉक्टर मुझसे इसके लिए नफ़रत करने लगे. उन्होंने कहा कि मुझे ऐसे लोगों से बात नहीं करनी चाहिए जिन्हें मैंने पहले कभी न देखा हो और स्वास्थ्य संबंधी सवालों के जवाब नहीं देने चाहिए."

वह लोगों को संतुलित जानकारियों के लिए पेशेंट को यूके और एनएचएल चॉयसेस देखने की सलाह देते हैं- लेकिन यह चेतावनी देना नहीं भूलते कि यह असली निदान के लिए कभी डॉक्टर का विकल्प नहीं हो सकता.

ब्रेन हेल्थ
इमेज कैप्शन, इंटरनेट पर वह सब जानकारी है जो आप चाहते हैं, लेकिन इसके साथ कोई फ़ैसला नहीं होता- प्रोफ़ेसर टायरर

एक अन्य प्रतिष्ठित वेबसाइट, हेल्थटॉकऑनलाइन, मरीज़ों की अनुभवों पर केंद्रित है. यह वेबसाइट गंभीर शोध पर आधारित है और इसका संचालन अकादमिक विद्वान करते हैं.

इस वेबसाइट की कहानियों के सत्रहवें संस्करण में ने खुलकर बताया कि वो अवसाद-निरोधक दवाएं ले रहे हैं.

नियमित हिस्सा

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर सू ज़ीब्लैंड ने 15 साल यह निरीक्षण किया है कि मरीज़ इंटरनेट का इस्तेमाल कैसे करते हैं. इनमें कैंसर के मरीज़ भी शामिल हैं.

वह कहती हैं, "जिन मरीज़ों का इंटरव्यू लिया गया उनमें से एक स्थानीय लाइब्रेरी में गया और इंटरनेट पर स्थानीय सपोर्ट ग्रुप के बारे में सूचना ढूंढी."

"उसे स्वयंसेवी सामाजिक वेबसाइट पर जो पहली चीज़ मिली, वह यह थी कि ख़ास किस्म के कैंसर में पांच साल तक ही जीने की संभावना होती है."

<link type="page"><caption> विकासशील देशों की जीवनशैली से बढ़े कैंसर मरीज़</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/12/131213_cancer_cases_reach_sks.shtml" platform="highweb"/></link>

"वह डर गया और कंप्यूटर बंद करके लाइब्रेरी से भाग गया."

"जो जानकारी उसे मिली वह बिल्कुल सही थी- लेकिन संभवतः इसे पहले पेज पर नहीं होना चाहिए था. ऐसा लग रहा था कि यह कोई साइनपोस्ट हो."

प्रोफ़ेसर ज़ीब्लैंड शुरुआती वक्त में इंटरनेट को एक ख़तरे के रूप में देखती थीं. वह कहती हैं कि अब डॉक्टर मरीज़ों को सलाह देते हुए नियमित रूप से इसे एक स्रोत के रूप में देखते हैं.

यह अब स्वास्थ्य चर्चाओं का एक नियमित हिस्सा बन गया है.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml " platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>