ग्लोबल वॉर्मिंग की मार झेलता हिमालय

- Author, सुहैल हलीम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पर्यावरण पर एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में 1950 से लेकर अब तक 95 फ़ीसदी ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए इंसान ही ज़िम्मेदार है.
स्टॉकहोम में पेश की गई इस रिपोर्ट में ख़बरदार किया गया है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से दुनिया के तापमान में और वृद्धि होगी.
ये रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संघ की समीति ने तैयार की है. ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से दुनिया भर में ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं और ज़ाहिर है इस तरह का ख़तरा हिमालय के क्षेत्र में मौजूद ग्लैशियरों पर भी है.
भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में कम से कम अस्सी करोड़ लोग पानी के लिए इन्हीं ग्लेशियरों पर निर्भर करते हैं.
पिघलते ग्लेशियर
हिमालय के दिलकश पहाड़ अब बढ़ते हुए प्रदूषण की क़ीमत चुका रहे हैं. प्रदूषण से वातावरण में गर्मी बढ़ी है और अब इसका असर साफ़ तौर पर नज़र आने लगा है.
बाताल ग्लेशियर तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम है लेकिन वातावरण में बढ़ती हुई गर्मी का असर अगर ग्लेशियरों पर क़रीब से देखना हो तो कोई दूसरा तरीक़ा भी नहीं.
सामने की पहाड़ी पर मौजूद बाताल ग्लेशियर अब तेज़ी से पिघल रहा है. सुनील डार इस ग्लेशियर में होने वाली तब्दीली का अध्ययन कर रहे हैं. डार ने कुछ इस तरह की जानकारियां हासिल की हैं जो किसी सैटेलाइट से नहीं देखी जा सकती हैं.
वो कहते हैं, “ये ग्लेशियर पिघल रहा है. यहां की चट्टानों को देख कर साफ पता चलता है कि पहले ग्लेशियर की बर्फ यहां तक फैली हुई थी. लेकिन अब ये पिघल गई है.”
मौसम में बदलाव से बर्फबारी बढ़ी है और इसके कारण कुछ क्षेत्रों में ग्लेशियरों में भी बढ़ोतरी हुई है. लेकिन ज़्यादातर इलाक़ों में ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं. बाताल ग्लेशियर भी इसी बदलती हुई वैश्विक तस्वीर का हिस्सा है.
रोज़ी रोटी पर संकट
ये फ़िक्र की बात है क्योंकि इन्हीं ग्लेशियरों से बहुत सारे लोगों की पानी की ज़रूरतें पूरी होती हैं – खेती के लिए और ज़िन्दगी के लिए भी.
हिमाचल के एक गांव में ये महिला कहती हैं, “अगर हिमालय नहीं होगा, तो हमारी सेब से चलने वाली ये जो रोजी रोटी है, वो भी खत्म हो जाएगी.”

पास ही हिमाचल प्रदेश का मनाली शहर है. यहां के सेब पूरे भारत में मशहूर हैं. यहां के पानी की ज़रूरत भी ग्लैशियर्स से ही पूरी होती है. लेकिन अगर पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाने वाले गैसों के कारण गर्मी इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो ये ग्लेशियर कितने दिन बचे रहेंगे.
पहले संयुक्त राष्ट्र की समीति का ख़्याल था कि ये अगले कुछ दशकों में समाप्त हो जाएंगे. लेकिन संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि ख़तरा अभी भी बना हुआ है और इनपर स्थानीय स्तर का प्रदूषण भी अहम रोल अदा कर रहा है.
'मंज़िल दूर'
अमरीकी एजेंसी नासा के मुताबिक़ हिमालय पर धुंए के बादल जो अकसर दिखाई देते हैं वो स्थानीय प्रदूषण का ही नतीजा है. वाहनों से निकले वाला धुंए, जंगल की आग और लकड़ी के चूल्हे से निकलने वाला धूंए जैसे प्रदूषण से भी ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार तेज़ हो रही है.
भारत में 15 करोड़ से अधिक लोग इसी तरह के चूल्हों का इस्तेमाल करते हैं जिनमें ज्यादातर ग़रीब लोग शामिल हैं.
क़रीब के एक घर में टिन के बने हुए चूल्हे का प्रयोग हो रहा है इसमें धुंआ 80 फ़ीसदी कम है लकड़ी भी दूसरे चूल्हें की तुलना में 50 प्रतिशत कम खर्च होती है.
लेकिन इस बेहतर तकनीक वाले चूल्हे की क़ीमत ढ़ाई हज़ार रुपए हैं. ग्लेशियरों को बचाने की राह में ये एक छोटा सा क़दम है. मंजिल दूर है क्योंकि असल ख़तरा ग्रीन हाउस गैसों से है जो अब भी बढ़ रही हैं.
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