आख़िर क्या है फॉरेंसिक जाँच ?

जब भी कोई वारदात होती है, तो उसके सभी पहलुओ की जाँच करने में सबसे ज़्यादा मददगार होती है, फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट. बिहार में सरकार की मिड डे मील योजना के तहत मिलने वाले विषाक्त भोजन खाने से बच्चों की मौत हो गई. फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट में पाया कि खाने में ज़हर था.
तो आख़िर फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट इतनी अहम क्यों है और फ़ॉरेंसिक जांच आख़िर क्या है
कैसे होती है फ़ॉरेंसिक जाँच?
नमूनों का विश्लेषण किया जाता है . पोस्टमॉर्टम होने के बाद भी कुछ नमूने रखे हैं. जैसे विसरा संभाल कर रखा जाता है और उसका विश्लेषण अलग से होता है.
वारदात के अनुसार कारवाई होती है. जैसे ज़हर दिए जाने की वारदात हुई है तो इसमें सामान रखने के कंटेनर्स को भी लिया जाता है. पीड़ित से गैस्ट्रिक लावास नाम का एक नमूना लिया जाता है और इन सभी का रासायनिक विश्लेषण किया जाता है.
मान लीजिए कि भोजन में कीटनाशक मिले होंने का शक हो, तो फ़ॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी वाले रासायनिक विश्लेषण करते हैं तो वे वैसे ज़हर की जांच करते हैं जिसके बारे में आमतौर पर जानकारी नहीं होती है. इनसे जुड़ी एक पूरी सूची होती है और कीटनाशक भी उसी सूची में से एक है.
रिपोर्ट तैयार होने के बाद सबसे पहले किसके पास ?

रिपोर्ट फ़ॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी में बनती है. जिन मामलों में पोस्टमॉर्टम किया गया था उसमें इस रिपोर्ट को मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी को दी जाती है. पुलिस अधिकारी इस रिपोर्ट की एक प्रति डॉक्टर के पास भेजकर पूछेगा कि आख़िरकार मौत किस वजह से हुई ? वह डॉक्टर फिर रिपोर्ट देख कर इसका जवाब बताएगा.
जिन मामलों में पोस्टमॉर्टम नहीं किया गया था वह रिपोर्ट भी जांच कर रहे अधिकारी के माध्यम से अदालत में जाएगी. रिपोर्ट को सीधे अदालत में नहीं भेजा जा सकता.
पूरी प्रक्रिया में कितना समय लगता है ?
एक नमूने की जाँच के लिए फ़ॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी को दो से तीन दिन का समय लग सकता है जिसमे वो सारे अनाम ज़हर की जांच करते हैं. अब यह इस पर निर्भर करता है कि लैबोरेटरी में कितने कर्मचारी हैं. इसके अनुसार वह सारे नमूनों की जांच भी एक साथ कर सकते हैं और एक-एक करके भी.
पूरे मामले की जांच किस तेज़ी से होगी यह इसी बात पर निर्भर करता है. लेकिन एक नमूने की जांच के लिए दो से तीन दिन लगते ही हैं.












