क्या वक्त से लुका-छिपी का खेल मुमकिन है?

- Author, मेलिसिया होगेनबूम
- पदनाम, विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
रोशनी की चकाचौंध में भी इस लबादे का इस्तेमाल कर वक़्त को चकमा दिया जा सकता है.
यह लबादा ऑप्टिकल फ़ाइबर में प्रकाश की रफ़्तार बदल सकता है.
इसका मतलब है कि 'वक़्त के गड्ढे' में घटने वाली कोई भी घटना इस दौरान नहीं पकड़ी जा सकती.
यानी प्रकाश की किरण को उसके रास्ते में ही अपने हिसाब से बदल पाना मुमकिन हो गया है.
'नेचर' पत्रिका में छपा यह शोध पिछले साल बने अदृश्य होने वाले लबादे के आगे का काम है.
वो लबादा समय के महज़ कुछ हिस्सों को ही छिपाने की ताक़त रखता था.
छिपा हुआ डेटा
मौजूदा शोध दूसरे 'अदृश्य लबादों' से इस मायने में अलग है कि इसके तहत किसी ख़ास चीज़ के मुक़ाबले एक ख़ास वक़्त में घटने वाली घटनाएं छिपाई जा सकती है.
'परड्यू यूनिवर्सिटी ऑफ इंडियाना' की टीम ने इसे अंजाम दिया और दिखाया कि किसी जगह लगातार आ रही प्रकाश की किरणों के एक हिस्से में कई 'समय के गड्ढों' को पैदा कर इसमें घट रही चीज़ें छिपाई जा सकती हैं.
शोधकर्ता प्रकाश किरण के रास्ते में आने वाला क़रीब आधा डेटा अदृश्य बनाने में कामयाब रहे, जिसे पहले आराम से देखा जा सकता था.
इस क्लोक या लबादे का मतलब है कि जब कोई चीज़ या घटना आंखों की पकड़ में न आ सके.
यह लबादा प्रकाश और आवाज़ दोनों की फ्रीक्वेंसी पर काम करता है. मिसाल के लिए, लड़ाकू विमान दुश्मन के राडार की पकड़ में नहीं आ पाते.
शोधकर्ता प्रोफेसर एंड्र्यू वाइनर ने बताया, "हम इलेक्ट्रिक सिग्नल से नियंत्रित होने वाले व्यावसायिक दूरसंचार के अंश के ज़रिए प्रकाश को आगे-पीछे फेंकने में कामयाब रहे. जब कोई ऑप्टिकल फ़ाइबर के ज़रिए हाई स्पीड डेटा भेजता है तो ज़्यादातर मामलों में यह एक या ज़ीरो सेकेंड (बायनरी कोड) के बराबर होता है."
रोशनी की मुड़ी हुई किरण

प्रोफेसर वाइनर ने बीबीसी को बताया, "अपने सिस्टम में हम इसे एक या ज़ीरो सेकेंड को छिपा सकते हैं."
प्रकाश की किरण में दूसरे कई उतार-चढ़ाव हो सकते हैं पर ये आवरण ऐसी ज़ोन तैयार करता है जिसमें कोई ये पता नहीं लगा सकता कि प्रकाश की किरण कैसे बदली.
उन्होंने इसकी तुलना बहती हुई नदी से करते हुए कहा, "आप नदी के किसी ऐसे हिस्से की कल्पना करें और उसे इस तरह आगे-पीछे खींचें कि उसमें पानी न बचे. मान लीजिए कि इसके लिए किसी बांध को बार-बार लगाया-हटाया जाए ताकि पानी का रुख़ मोड़ा जा सके."
प्रोफ़ेसर वाइनर ने बताया, "अब हम पानी को ऐसे अलग करें कि ये उस उठते-गिरते बांध को न देख पाए, उसमें कोई विघ्न न पड़े और इसके बाद हम उसे फिर नदी के शांत पानी में तब्दील कर दें."
"इस तरह हम रोशनी के बहाव को नियंत्रित कर सकते हैं. हम उसे समय में आगे-पीछे करते हैं और कुछ घटनाएं इस तरह ग़ायब कर देते हैं जो सामान्य स्थिति में पूरे बहाव में गड़बड़ पैदा करतीं."
बड़ी छलांग
नॉर्थ कैरॉलिना यूनिवर्सिटी में ऑप्टिकल फ़िज़िक्स के विशेषज्ञ ग्रेग बर ने समझाया कि हालांकि इसे टाइम क्लोक कहा जा रहा है पर असल में ये "समय का नहीं प्रकाश का अपने ढंग से इस्तेमाल है."
ग्रेग इस शोध में शामिल नहीं हैं पर उनका मानना है कि ये टाइम क्लोक की दिशा में एक बड़ी छलांग है.
डॉ. ग्रेग के मुताबिक, "पहली बार उन्होंने एक सेकेंड के अरबवें हिस्से के बराबर घटनाएं अदृश्य करने की बात की गई है."
यहां वो समय का 46 फ़ीसदी हिस्सा छिपाने में कामयाब रहने की बात कर रहे हैं.
इससे पता चलता है कि अब यह महज़ उत्सुकता नहीं बल्कि इसे प्रकाश संबंधी संचार और डेटा प्रोसेसिंग में इस्तेमाल किया जा सकता है.
इम्पीरियल कॉलेज, लंदन के फ़िज़िसिस्ट ऑर्टविन हेस का कहना है कि ये शोध "अब तक ईजाद किए गए टाइम लेंस सिद्धांत का विस्तार" है.
ग़ैरज़रूरी संवाद पर नज़र

प्रो. हेस ने बीबीसी को बताया कि मौजूदा शोध में 'समय-आकाश' के विरोधाभास को शामिल किया गया है.
इसका मतलब है कि लौकिक लबादे के मूल सिद्धांत की तरह इसमें किसी लबादे की जगह समय ने ले ली है.
इससे पता चलता है कि ऑप्टिक्स में कितनी ख़ूबसूरती से समय-आकाश के सिद्धांतों का इस्तेमाल किया जा सकता है.’
इस शोध से कई संभावनाएं खुल गई हैं.
प्रो. हेस के मुताबिक़ इसका इस्तेमाल करके डेटा को छेड़छाड़ से बचाया जा सकता है.
'ग़ैरज़रूरी संवाद' पर नज़र रखी जा सकती है और संवेदनशील जानकारियां इस्तेमाल करने के लिए सरकारें या बड़ी संस्थाएं इसका उपयोग कर सकती हैं.
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