अब भी मंडरा रहा है टीबी का ख़तरा

दुनिया भर में क्षयरोग (टीबी) को कम करने की योजनाएं सफल नहीं हो पा रही हैं. डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह के मुताबिक़ इस बीमारी को रोकने के लिए एक नए दूरदर्शी दृष्टिकोण की ज़रूरत है.
दुनिया भर में चिंता का विषय यह है कि अगर क्षयरोग में वृद्धि होती है तो यह कई देशों के लिए एक ख़तरा बन सकता है.समूह ने लैंसेट मेडिकल जर्नल में लिखा है कि दुनिया भर की सरकारें इस बीमारी के प्रति उदासीन और लापरवाह हैं.
इस रिपोर्ट में दुनिया के देशों से यह गुज़ारिश की गई है कि वह इस समस्या को दूर करने के लिए कुछ और पहल करें. विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि हर साल क्षय रोग से 90 लाख लोग बीमार पड़ते हैं और 14 लाख लोग मरते हैं.
दवा का असर नहीं
कुछ देश दवा की प्रतिरोध क्षमता घटने की समस्या का सामना कर रहे हैं. अब आलम यह है कि क्षयरोग के जीवाणुओं को नियंत्रण में करने के लिए जिन एंटीबॉयोटिक दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल करने को तरजीह दी जाती थी, अब वे असर नहीं करती हैं.
पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया के कुछ हिस्से में यह बीमारी ज्यादा गंभीर है. इन क्षेत्रों में इस बीमारी के एक-तिहाई मामले में कई दवाइयां लेने के बावजूद उनका असर नहीं होता है जिसे एमडीआर-टीबी कहते हैं.
कई प्रयोगशालाएं इस बात की पुष्टि करती हैं कि दुनिया भर में एमडीआर-टीबी के मामले वर्ष 2005 के 12,000 के मुक़ाबले बढ़कर 2011 में 62,000 हो गए.
हालांकि ऐसा माना जाता है कि वास्तविक आंकड़े 300,000 के क़रीब हो सकते हैं. दवा प्रतिरोधक क्षयरोग के मामले 84 देशों में देखे गए हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है, “दुनिया भर में यात्रा करने में अब कोई मुश्किल न आने और पूर्वी यूरोप, मध्य एशिया तथा कई अन्य जगहों पर एमडीआर टीबी की दरों में बढ़ोत्तरी होने से वास्तव में इलाज न हो सकने वाले क्षयरोग में तेज़ी आएगी और ख़तरा बढ़ेगा.”
प्रोफेसर अलीमुद्दीन जुमला का कहना है, “यह लंदन और यूरोप में एक बड़ी समस्या तो है ही इसके अलावा पिछड़े देशों के लिए भी एक बड़ा संकट है.”
इस रिपोर्ट का यह तर्क है कि कई देशों ने इस बीमारी के संक्रमण के प्रति दशकों तक उदासीनता दिखाई जिसके लिए बड़े वैचारिक परिवर्तन और दूरदर्शी वैश्विक नेतृत्व की ज़रुरत थी.
इसमें कहा गया कि इस बीमारी को रोकने के लिए राजनीतिक और वैज्ञानिक सोच में मूल बदलाव के साथ ही दुनिया भर में विशेष उपायों पर अमल करने की ज़रूरत है.
इस रिपोर्ट में कहा गया है, “वैश्विक आर्थिक संकट और स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश कम होने से राष्ट्रीय क्षयरोग योजनाओं पर ख़तरा मंडरा रहा है.”
गरीब देशों पर संकट
रिपोर्ट के लेखकों में से एक प्रोफेसर अलीमुद्दीन जुमला का कहना है, “यह लंदन और यूरोप में एक बड़ी समस्या तो है ही इसके अलावा पिछड़े देशों के लिए भी एक बड़ा संकट है.”
हालांकि उन्होंने यह चेतावनी भी दी है कि रातों-रात इस बीमारी का कोई इलाज नहीं हो सकता है.
उनका कहना है कि इस बीमारी के रोकथाम के लिए एंटीबॉयोटिक के अलावा और कई दवाईयां पहले ही तैयार की गई हैं लेकिन गरीब देशों में उपयुक्त तरीक़े से इसका इस्तेमाल करना सबसे बड़ी चुनौती है.












