क्या भविष्य में ड्रोन से लड़े जाएँगे युद्ध? – दुनिया जहान

इस साल फरवरी में रूसी सेना का विशाल काफिला यूक्रेन की राजधानी पर कब्ज़े के लिए आगे बढ़ रहा था. उधर कीएव हमले का सामना करने की तैयारी कर रहा था.

रक्षा क्षेत्र में निवेश, लड़ाकू विमानों, टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों के उत्पादन और हथियारों के मामले में रूसी सेना यूक्रेनी सेना के मुक़ाबले कहीं बड़ी है, लेकिन कुछ सप्ताह में ये स्पष्ट हो गया कि रूसी सेना आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

रूस-यूक्रेन युद्ध में देखा जा रहा है कि रूसी सेना को आगे बढ़ने से रोकने के लिए यूक्रेन शक्तिशाली ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है और उसे इसमें कामयबी भी मिल रही है.

रूसी सैनिक लंबी सर्द रातें गाड़ियों में बिताने को बाध्य थे. खुद को गर्म रखने के लिए उन्हें गाड़ियों और टैंकों का इंजन चालू रखना पड़ रहा था. इसका फायदा उठाया यूक्रेनी ड्रोन्स ने, जो रात के अंधेरे में गाड़ियों के इंजन की गर्मी से उनके ठिकाने का सटीक अंदाज़ा लगाकर उनपर हमले करने लगे.

युद्ध के मैदान में ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल से ये सवाल पैदा हो रहा है कि क्या एक समय ऐसा आएगा जब लड़ाईयाँ ड्रोन से लड़ीं जाएँगी?

ड्रोन का इतिहास

कैरोलाइन केनेडी-पाइप ब्रिटेन के लब्रो यूनिवर्सिटी में वॉर स्टडीज़ की प्रोफ़ेसर हैं.

वो बताती हैं कि पहले विश्व युद्ध के बाद जंग में दुश्मन से आगे रहने के लिए अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स यानी मानवरहित विमान बनाने की कोशिश की गई. इसके तहत दो तरह की चीज़ें बनीं- पहला, मिसाइलें जो एक तय दिशा में जाकर खुद को और इस प्रक्रिया में लक्ष्य को नष्ट कर सकती थीं; दूसरा, ऐसे व्हीकल्स जो साजोसामान पहुंचा सकते थे या ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठा कर सकते थे और जिनका बार-बार इस्तेमाल संभव था.

कैरोलाइन कहती हैं, "प्रथम विश्व युद्ध में नुक़सान झेल चुके पश्चिमी देश खंदकों में छिपकर जंग लड़ने की रणनीति का विकल्प चाहते थे. उन्हें ऐसे विमान चाहिए थे जो दुश्मन के इलाक़े में ज़मीन से नहीं बल्कि ऊपर से जा सकें. वो पारंपरिक युद्ध से अपने सैनिकों को बचाना चाहते थे, साथ ही दुश्मन पर लगातार हमले कर उनका मनोबल तोड़ना चाहते थे."

लंदन में जन्मे वैज्ञानिक आर्चिबाल्ड लो स्वेच्छा से सेना में शामिल हुए और रॉयल फ्लाइंग कोर में काम करने लगे. उन्हें फ़ादर ऑफ़ रेडियो गाइडेंस सिस्टम कहा जाता है. वो विमान को दूर से कंट्रोल करने के तरीकों पर काम कर रहे थे ताकि विमानों को गाइडेड मिसाइलों के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके. 1917 में उन्होंने अपने पहले ऐसे मानवरहित विमान का परीक्षण किया जो सफल नहीं हो सका.

अमेरिकी सेना ने 1918 में वैज्ञानिक चार्ल्स केट्टरिंग से एक ऐसा फ्लाइंग बम बनाने की गुज़ारिश की थी, जिसे बिना पायलट के उड़ाया जा सके. उन्होंने इसे नाम दिया केट्टरिंग बग. ये एक पारंपरिक एयरक्राफ्ट की तरह दिखने वाला 3.8 मीटर लंबा प्लेन था जिसकी चौड़ाई 4.5 मीटर थी. इसका उद्देश्य 40 मील दूर किसी लक्ष्य को भेदना था.

इन्हें पॉइन्टलेस व्हीकल्स कहा गया. हालांकि इनका इस्तेमाल कभी नहीं हुआ. बाद में 1944 में हथियार के तौर पर विमानों का इस्तेमाल किया गया.

कैरोलाइन कहती हैं, "वॉटेन एंड विज़रनेस और मिमोयेक में मौजूद नाज़ी जर्मनी के हथियारों के ठिकानों को तबाह करने के लिए अमेरिका मानवरहित विमान बना रहा था. ये जगह आज के दौर के फ्रांस में हैं.एक अभियान के तहत विमानों को खालीकर उनमें विस्फोटक भरा गया. ये सही मायनों में मानवरहित विमान नहीं थे क्योंकि पायलट और फ्लाइट इंजीनियर विमान को लक्ष्य के क़रीब 2,000 फीट की ऊंचाई तक ले जाते, विस्फोटक के फटने की तैयारी करते और फिर कंट्रोल, रिमोट ऑपरेटर को देकर, विमान से बाहर कूद जाते."

इस तरह के एक अभियान में अमेरिकी नेवी में पायलट रहे राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी के भाई जोसेफ़ पी केनेडी की मौत हो गई. विस्फोटक डिटोनेट करने से पहले ही उनके विमान में धमाका हो गया और पूरा चालक दल की मौत के मुंह में समा गया. ऐसे कुछ और हादसे हुए, जिसके बाद इन अभियानों पर रोक लगा दी गई.

सालों बाद वियतनाम युद्ध में ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठा करने और प्रोपेगेंडा के लिए ऐसी मानवरहित मशीनों का इस्तेमाल किया गया.

कैरोलाइन कहती हैं, "सर्विलांस, विमान से पर्चे फेंकने और कई कामों के लिए इनका इस्तेमाल किया गया. उस वक्त विएतनाम में दो युद्ध लड़े जा रहे थे. उत्तर की तरफ आम नागरिकों का मनोबल तोड़ने की कोशिश की जा रही थी तो वहीं दक्षिण में इनकी इस्तेमाल जानकारी इकट्ठा करने के लिए किया जा रहा था."

वक्त के साथ तकनीक बेहतर होती गई और इनकी क्षमता भी बढ़ी. वो कहती हैं, "1990 के खाड़ी युद्ध और कोसोवो अभियान के वक्त लक्ष्य भेदने और तकनीक के मामले में स्थिति पहले से बेहतर थी. दावा किया गया कि अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स से आम नागरिकों के लिए भी ख़तरा पहले से कम था. इनका इस्तेमाल चुने हुए ठिकानों और दुश्मनों को ख़त्म करने के लिए किया जाने लगा. इसका असर भी दिखा और खाड़ी युद्ध में अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना को कम नुक़सान झेलना पड़ा."

अमेरिका में 9/11 की घटना और उसके बाद इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान युद्ध के वक्त ऐसे अनमैन्ड व्हीकल्स का इस्तेमाल आम होने लगा था जो रीयलटाइम में जानकारी देने और मिसाइल हमले करने में सक्षम थे. इनके ज़रिए अमेरिका में बैठकर अफ़ग़ानिस्तान की सुदूर जगहों के बारे में जानकारी इकट्ठा करना आसान हो गया था.

एक रिपोर्ट के अनुसार अपने कार्यकाल में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने क़रीब 50, बराक ओबामा ने 1,800 से अधिक और उनके बाद आए डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल पहले दो सालों में 2,200 से अधिक ड्रोन हमलों के आदेश दिए.

कैरोलाइन कहती हैं, "ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ने लगा था, चुने हुए टार्गेट पर हमले के लिए इनकी मदद ली जाने लगी. लेकिन इसके लिए सटीक जानकारी की ज़रूरत होती, नहीं तो ग़लती का जोखिम रहता. अमेरिकी सेना के साथ-साथ अमेरिकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए भी ड्रोन कार्यक्रम चला रही थी."

युद्ध में संतुलन

सारा क्रेप्स अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में टेक पॉलिसी लैब की निदेशक हैं और ड्रोन्स पर दो क़िताबें लिख चुकी हैं. वो कहती हैं कि पहले जंग में उस देश को बढ़त मिलती थी जो सेना और हथियारों में अधिक निवेश करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा.

वो कहती हैं, "ऐसे देश जो अपनी सेना पर लाखों-अरबों खर्च नहीं कर पाते, ड्रोन्स उनको भी आगे रहने का मौक़ा देते हैं. ये दुश्मन को चकमा देते हुए उनके सुरक्षा घेरे को पारकर हमला कर सकते हैं. लेकिन इससे चिंता भी पैदा होती है क्योंकि इनके ज़रिए हमला कब-कहां होगा, आपको नहीं पता. जैसे खेल आयोजन और ख़ास कार्यक्रम में संभावित हमले का ख़तरा बना रहता है."

अमेरिका के लिए सुरक्षा अब महंगा सौदा बनता जा रहा है. यहां छोटे ड्रोन और आईईडी के संभावित हमलों से निपटने के लिए अलग-अलग यूनिट बनाए गए हैं.

आईईडी या इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस बनाने के लिए किसी विशेष कौशल की ज़रूरत नहीं होती. इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में विद्रोहियों ने इनका काफी इस्तेमाल किया था.

सारा कहती हैं, "आईईडी का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने के लिए अमेरिका ने अरबों डॉलर खर्च किए. ये अपने आप में उनके दुश्मन की जीत थी. 500 डॉलर के ड्रोन या आईईडी से निपटने के लिए वक्त और पैसा लगाने के लिए बाध्य करना, आप इसे कामयाबी ही कहेंगे."

वक्त के साथ ये स्पष्ट हो रहा है कि ड्रोन जंग के मैदान में चुनौती बढ़ा रहे हैं. ग़रीब देशों में मौजूद चरमपंथी भी इनकी मदद से ज़्यादा ख़तरनाक भूमिका ले रहे हैं.

वो कहती हैं, "ड्रोन्स की क्षमता अलग-अलग होती है. चरमपंथियों के पास विकसित देशों की सेना जैसी बेहतर तकनीक नहीं है. उनके ड्रोन साधारण होते हैं जबकि बेहतर तकनीक वाले ड्रोन न केवल जानकारी जुटाने में अच्छे होते हैं बल्कि हमला करने में भी बेहतर होते हैं."

लेकिन फिर, बेहतर ड्रोन के ज़रिए हमले को अंजाम देने के लिए सटीक जानकारी की ज़रूरत होती है. बीते साल अफ़ग़ानिस्तान में हुए अमेरिकी ड्रोन हमले की कड़ी आलोचना की गई थी. इसमें 10 आम नागरिकों की मौत हुई थी. बाद में अमेरिका ने इसे 'ग़लती' कहा था.

सारा कहती हैं, "ड्रोन ने एक सफ़ेद कार को निशाना बनाया. लेकिन गाड़ी में संदिग्ध इस्लामिक स्टेट खुरासान से जुड़े लोग नहीं थे बल्कि एक आम नागरिक का परिवार था. मुझे लगता है कि पूरी जानकारी नहीं जुटाई गई और फ़ैसला हड़बड़ी में लिया गया. जांच से पता चला कि आप जो उम्मीद करते हैं वैसी तस्वीर दिखने पर आपसे ग़लती हो सकती है."

लेकिन सवाल ये है कि इस तरह की अलग रणनीति यानी ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन में युद्ध को किस तरह प्रभावित कर रहा है.

यूक्रेन के हथियारों का ज़ख़ीरा

रूस को उम्मीद थी कि जंग के दौरान यूक्रेन के एयरस्पेस पर उसका नियंत्रण हो सकेगा. लेकिन यूक्रेन ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा था और ऐसे में रूस के लिए उसके एयरस्पेस पर नियंत्रण करना असंभव था.

डेविड हैम्बलिंग वरिष्ठ पत्रकार हैं और 'स्वार्म ट्रूपर्स: हाउ स्मॉल ड्रोन्स विल कॉन्कर द वर्ल्ड' के लेखक हैं. वो कहते हैं कि रूसी सेना के ख़िलाफ़ यूक्रेन अलग-अलग तरीकों से ड्रोन को काम पर लगा रहा है.

वो कहते हैं, "एंटी-टैंक मिसाइल वाले रूसी टैंकों को नष्ट करने के लिए यूक्रेन ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है. इंफ्रारेड कैमरे वाले ड्रोन टैंकों के इंजन की गर्मी से उनके ठिकाने का पता लगा लेते हैं. ये आसान है क्योंकि रूसी सैनिक ठंड से बचने के लिए टैंकों के इंजन चालू रख रहे हैं."

यूक्रेनी सेना बम गिराने के लिए भी ड्रोन का इस्तेमाल कर रही है.

डेविड समझाते हैं "उनके पास सोवियत दौर के एंटी टैंक ग्रेनेड का बड़ा ज़खीरा है. सैनिकों के लिए इन्हें फेंकना जाखिम भरा है क्योंकि ये भारी हैं और कुछ मीटर दूरी पर गिर जाते हैं. उन्होंने थ्रीडी प्रिंटिंग की मदद से इनमें बदलाव किए हैं और ड्रोन के ज़रिए इन्हें रूसी सेना पर गिरा रहे हैं. "

और फिर यूक्रेन के पास तुर्की में बने बड़े बायरेक्टार ड्रोन भी हैं जो घातक हमला करने में सक्षम हैं.

डेविड बताते हैं, "ये 16 घंटों तक आसमान में रह सकते हैं और इलाक़े का चक्कर लगाकर अपना लक्ष्य तलाश सकते हैं. ये एक साथ चार लेज़र गाइडेड मिसाइलें ले जा सकते हैं और बख्तरबंद गाड़ियों से लेकर टैंक तक को नष्ट कर सकते हैं."

यूक्रेन के पास अमेरिका का स्विचब्लेड ड्रोन भी है जो इतना सटीक है कि एक व्यक्ति तक को निशाना बना सकता है.

वो कहते हैं, "ये एक साथ दो लक्ष्य पर निशाना लगा सकते हैं और इन्हें लॉन्च करने से पहले लक्ष्य के बारे में जानकारी ज़रूरी नहीं. ये 15 मिनट तक हवा में रहकर टार्गेट की तलाश करते हैं, ऑपरेटर को जानकारी भेजते हैं और फिर अपने लक्ष्य को नष्ट करते हैं."

डेविड कहते हैं कि यूक्रेनी सेना ड्रोन के इस्तेमाल की अपनी काबिलियत का बेहतर प्रदर्शन कर अपने से कई गुना बड़ी रूसी सेना को आगे बढ़ने से रोक सकी है. और रूसी सेना अब तक यूक्रेनी हमलों का जवाब देने में सुस्त रही है.

लेकिन आगे की लड़ाई में ड्रोन क्या-कुछ बदल सकते हैं. जानते हैं हमारे चौथे और आख़िरी एक्सपर्ट से.

ड्रोन की रणनीति

डॉक्टर जेम्स रॉजर्स लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में वॉर स्टडीज़ के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. वो कहते हैं कि यूक्रेन में शौकिया तौर पर ड्रोन चलाने वालों और कमर्शियल दुकानों ने अपने ड्रोन सेना को दान दिए . युद्ध में इनका इस्तेमाल नहीं हो सकता, लेकिन ये नज़र रखने में मदद करते हैं और पता लगाते हैं कि रूसी सेना कहां-कहां है.

वो कहते हैं, "यूक्रेन अमेरिका के टेक्सास राज्य जितना बड़ा है और इतने बड़े इलाक़े में अपनी सेना को एयर डिफेंस देना किसी के लिए भी मुश्किल है. यूक्रेन की कोशिश है कि उसके हमले का असर बड़ा हो और सेना का मनोबल बढ़े. अब तक यूक्रेनी सेना शहरों के आसपास के इलाक़ों में ड्रोन का इस्तेमाल करती रही है लेकिन हो सकता है कि आने वाले वक्त में वो व्यापक तौर पर इनसे काम ले."

जेम्स कहते हैं कि केवल बड़ी सेनाएं ही नहीं, इस्लामिक स्टेट जैसे कथित चरमपंथी गुट भी रणनीतिक तौर पर ड्रोन्स का इस्तेमाल कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "हमने देखा है कि गठबंधन देशों की सेना पर हमले के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया गया. पहले ड्रोन को सामने की तरफ से भेजा गया ताकि सेना पीछे हटने लगे. फिर ड्रोन को पीछे की तरफ से भेजा गया, ऐसे में सेना बीच में फंस गई और उस पर हमला करना आसान हो गया."

लेकिन सवाल ये है कि ड्रोन के इस्तेमाल का भविष्य के संघर्षों पर क्या असर पड़ेगा. अभी तक हमने यूक्रेन में स्वॉर्मिंग जैसी रणनीति नहीं देखी है, लेकिन ये असंभव है ऐसा कहना मुश्किल है.

जेम्स कहते हैं, "स्वॉर्मिंग में कई तरह के सैंकड़ों हज़ारों ड्रोन और मिसाइलें एक साथ दुश्मन की तरफ भेजे जाते हैं. ये दुश्मन सेना की रक्षा रणनीति और उनके एयर डिफेंस सिस्टम के लिए बड़ी चुनौती पेश कर सकते हैं. इनमें से कुछ को गिराना संभव है लेकिन कुछ अपने लक्ष्य तक पहुंचेंगे, ये तय है. भविष्य की लड़ाइयों में हम इस तरह की रणनीति देख सकते हैं."

लेकिन एक और चीज़ है जो आने वाले वक्त में युद्ध का तरीका बदल सकते हैं, वो हैं ऑटोनोमस ड्रोन.

वो कहते हैं, "इस मामले में हमें मशीन पर इंसान के नियंत्रण को लेकर बात करने की ज़रूरत है. ऑटोनोमस ड्रोन पहले से बने एल्गोरिद्म के आधार पर अपना लक्ष्य खुद चुनकर उसे नष्ट करते हैं और ड्रोन ऑपरेटर को इसकी जानकारी देते हैं. निशाना सही था या नहीं, इसका पता बाद में लगाया जाता है. लेकिन इन मामलों में हादसा होने की गुंजाइश अधिक है और ऐसा हुआ तो ज़िम्मेदारी कौन लेगा."

लौटते हैं अपने सवाल पर- क्या भविष्य में ड्रोन युद्ध लड़ेंगे?

रूस-यूक्रेन युद्ध में दुश्मन के ठिकाने का पता लगाने से लेकर टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों को तबाह करने में अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स यानी ड्रोन्स ने बड़ी भूमिका निभाई है. बीती सदी में शायद ये पहली बार है जब युद्ध में ड्रोन अहम खिलाड़ी साबित हुए हैं.

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इसके इस्तेमाल की संभावनाओं में और इज़ाफ़ा कर सकता है, लेकिन सवाल ये भी उठ रहा है कि इस तरह की मशीनों को खुद फ़ैसला लेने की कितनी आज़ादी दी जानी चाहिए.

हो सकता है कि आने वाले वक्त में जंग के मैदान में ड्रोन का इस्तेमाल आम हो जाए और दुश्मन से आगे रहने के लिए इनकी मदद ली जाए. हमारे चौथे एक्सपर्ट जेम्स कहते हैं, भविष्य में हर जंग में ड्रोन शामिल होंगे लेकिन जंग केवल इन मशीनों से ही लड़ी जाए, ऐसा नहीं होगा.

प्रोड्यूसर - मानसी दाश

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