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अमेरिका, रूस, भारत और अन्य मुल्कों की दिलचस्पी चांद में क्यों है?
बीते एक साल में चांद पर कोई अंतरिक्ष यान नहीं उतरा और न ही किसी ने कोई मिशन चांद पर भेजा. लेकिन इस पूरे साल हमें चांद से जुड़ी ख़बरें मिलती रहेंगी क्योंकि कई मुल्कों और कंपनियों ने इस साल चांद के लिए विशेष मिशन की योजना बनाई है.
नासा इस साल अपना आर्टेमिस प्रोग्राम शुरू करेगा. इस कार्यक्रम के तहत वो पहली महिला अंतरिक्ष यात्री को चांद पर भेजेगा और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर चांद पर लंबे वक्त तक मौजूदगी बनाए रखने के लिए ज़रूरी उपकरण और सामान चांद पर भेजेगा. भविष्य में वहां जाने वाले अंतरिक्ष यात्री इनका इस्तेमाल कर सकेंगे.
इसके लिए वो चांद पर एक ऐसा आर्टेमिस बेस कैंप बनाएगा जहां अंतरिक्ष यात्री रह सकेंगे और अंतरिक्ष में एक गेटवे भी बनाएगा, जहां रुक कर अंतरिक्ष यात्री चांद की सतह तक बढ़ने की अपनी यात्रा पूरी करेंगे.
इसमें एक अत्याधुनिक मोबाइल घर और एक रोवर होगा, ताकि चांद पर अभूतपूर्व रूप से खोजी अभियान को अंजाम दिया जा सके. इससे मंगल पर क़दम रखने की तैयारी में मदद मिलेगी.
कौन-कौन शुरू करेगा अभियान
भारत, जापान, रूस और दक्षिण कोरिया भी इस साल अपने-अपने लूनर मिशन लॉन्च करने वाले हैं. इनके अलावा कई और मुल्क और कंपनियां भी इस साल धरती की कक्षा में अपने सैटेलाइट छोड़ने वाली हैं.
इनमें से अधिकतर ऐसे मानव रहित मिशन होंगे जो चांद पर रहने के लिए ज़रूरी सामान पहुंचाएंगे, ताकि दशकभर के भीतर इंसान चांद पर रहने की शुरुआत कर सके. इसके साथ ही चांद के पास अंतरिक्ष में लूनर स्पेस स्टेशन बनाने की भी योजना है.
लेकिन इन मिशनों का आख़िरी उद्देश्य ये नहीं होगा. दरअसल ये मंगल पर क़दम रखने की योजना का पहला कदम होगा.
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिस्टल में एस्ट्रोफ़िज़िसिस्ट डॉक्टर ज़ोई लिनहार्ट कहती हैं कि ये साल एक नई तरह की स्पेस रेस का गवाह बनेगा और इस लिस्ट में कई और मुल्कों के नाम जुड़ेंगे.
इनमें से अधिकतर चांद के खोजी अभियान होंगे लेकिन कुछ होंगे जिनका उद्देश्य चांद पर लंबे वक्त तक रहने से बड़ा होगा.
डॉक्टर ज़ोई लिनहार्ट कहती हैं, "कुछ मिशन का उद्देश्य एक बड़ी परियोजना के लिए पहला कदम बढ़ाने जैसा है. चांद का मिशन कुछ नए कॉन्सेप्ट को साबित करने का मौक़ा तो होगा ही, ये अंतरिक्ष से जुड़ी नई तकनीक और नई साझेदारियों की परीक्षा का भी बेहतर मौक़ा होगा."
आइए एक नज़र डालते हैं इस साल शुरू होने वाले लूनर प्रोग्राम और उनके उद्देश्यों पर.
नासा का आर्टेमिस-वन और कैपस्टोन
नासा के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का उद्देश्य साल 2025 तक एक बार फिर इंसान को चांद की सतह पर उतारना है. लेकिन ये मिशन केवल इतने में ख़त्म नहीं होगा, इसकी सफलता एक और महत्वाकांक्षी उद्देश्य के लिए पहला क़दम साबित होगी.
इस मिशन का अधिकतर हिस्सा मानवरहित यानों द्वारा पूरा किया जाएगा. लेकिन आर्टेमिस-वन में "मूनिकिन" को चांद पर भेजा जाएगा. इसके ज़रिए उस स्पेससूट की टेस्टिंग की जाएगी जो बाद में इस मिशन के तहत जाने वाले अंतरिक्षयात्री पहनेंगे.
इस मिशन को नासा के अब तक के सबसे शक्तिशाली रॉकेट स्पेस लॉन्च सिस्टम (एसएलएस) के ज़रिए लॉन्च किया जाएगा. ये ओरायन अंतरिक्ष यान को चांद के पास लेकर जाएगा और क्रू को जिस यान में चांद पर उतारा जाएगा उसकी टेस्टिंग करेगा.
नासा ओरायन पर लगे हीट शील्ड का भी अध्ययन करेगा. धरती पर लौटते वक्त ओारायन जब पृथ्वी के वायुमंडल में तेज़ गति से प्रवेश करेगा तब उसे लगभग 2760 डिग्री सेल्सियस तापमान का सामना करना पड़ सकता है.
आर्टेमिस कार्यक्रम के तहत इस साल हम एक और बड़ा काम होता देखेंगे. नासा इस साल आर्टेमिस कार्यक्रम का पहला कदम उठाते हुए केपस्टोन अंतरिक्ष यान मार्च 2022 तक भेजेगा. इसके ज़रिए माइक्रोवेव अवन के आकार के जितना बड़ा एक ऑटोनॉमस पोज़िशनिंग सिस्टम क्यूबसैट लॉन्च करेगा जो चांद के चारों ओर चक्कर काटेगा. इसका उद्देश्य भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होगा.
मंगल परक़दम रखने की महत्वाकांक्षी योजना
आर्टेमिस कार्यक्रम के तहत जो जानकारी इकट्ठा की जाएगी उसका इस्तेमाल गेटवे बनाने में किया जाएगा. गेटवे "चांद के पास अंतरिक्ष में बना एक आउटपोस्ट होगा जो लंबे वक्त तक चांद पर इंसानों के रहने के लिए ज़रूरी मदद मुहैय्या कराएगा."
अगर सब कुछ योजनानुसार हुआ तो साल 2025 तक आर्टेमिस-तीन के ज़रिए इंसान को चांद पर भेजा जाएगा. अपोलो 17 के बाद ये पहली बार होगा जब अंतरिक्ष यात्री चांद पर उतरेंगे. इसके साथ दुनिया की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री और पहले काले अंतरिक्ष यात्री को चांद की सतह पर उतारा जाएगा.
डॉक्टर हान्ना सार्जेंट अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ सेंट्रल फ्लोरिडा में प्लानेटरी साइंटिस्ट हैं. वो कहती हैं कि चांद पर कदम रखना एक बड़े मुकाम को हासिल करने की शुरुआत भर है.
वो कहती हैं, "चांद पर पूरा किया जाने वाला रोबोटिक मिशन एक बड़ी योजना की शुरुआत होगी. इसी के आधार पर बाद में चांद के पास एक स्पेस स्टेशन, चांद में एक बेस कैम्प और बाद में मंगल पर इंसान को भेजने की तैयारी होगी."
नासा के अलावा भारत, जापान और दक्षिण कोरिया और कई कंपनियां भी इस साल चांद को लेकर अपनी योजनाएं बना रही हैं.
भारत का चंद्रयान
भारत ने चांद की सतह पर उतरने के लिए एक चंद्रयान भेजा था. ये मिशन नाकाम रहा था. इसके बाद इस साल भारतीय स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइज़ेशन (इसरो) चंद्रयान-3 नाम का खोजी अभियान चांद पर भेजने की योजना बना रहा है.
एक अंतरिक्ष यान, एक रोवर और एक लैंडर वाले चंद्रयान-3 को इस साल के ख़म होने से पहले लॉन्च किया जा सकता है. ये एक ऑर्बिटर मिशन होगा जो चांद पर सॉफ्ट लैंडिग करने की कोशिश करेगा. रोवर चांद की तस्वीरें पृथ्वी पर भेजेगा जिससे चांद की सतह को समझने में मदद मिलेगी.
चंद्रयान-3 के ज़रिए चांद के डार्क साइड में रोवर उतारने की योजना है. ये चांद का वो हिस्सा है जिस पर अरबों सालों से सूरज की रोशनी नहीं पड़ी है. माना जा रहा है इस हिस्से में बर्फ़ और महत्वपूर्ण खनिज पदार्थ हो सकते हैं.
जापान की क्या है योजना?
इस साल चांद को लेकर जापान के भी दो प्रोजेक्ट्स हैं.
जापानी स्पेस एजेंसी (जेएएक्सए) इस साल अप्रैल में चांद पर एक लैंडर उतारने की योजना बना रहा है. स्मार्ट लैंडर फ़ॉक इन्वेस्टिगेटिंग द मून (एसएलआईएम) नाम के इस मिशन के साथ चांद पर लैंडिंग तकनीक का परीक्षण किया जाएगा. ये मिशन फ़ेशियल रिकग्निशन सिस्टम के ज़रिए चांद पर मौजूद गड्ढों के बारे में जानकारी इकट्ठा करेगा.
इसमें एक एक्स-रे इमेजिंग एंड स्पेक्ट्रोस्कोपी मिशन (एक्सआरआईएसएम) नाम का स्पेस टेलिस्कोप भी होगा.
जापानी कंपनी आईस्पेस भी इस साल के आख़िर में पहला और अगले साल दूसरा लैंडर चांद पर भेजने की तैयारी कर रहा है. हाकूटो-आर कार्यक्रम के तहत इन दोनों मिशन को मिशन-1 और मिशन-टू नाम दिया गया है. ये चांद के लिए बने ख़ास खोजी अभियान होंगे जो चांद पर इंसानों के रहने में मदद के मौक़े तलाश करेंगे.
कंपनी का कहना है कि भविष्य में अगर इंसान चांद पर अपना ठिकाना बनाता है तो पृथ्वी के लोगों और चांद के बीच संपर्क बनाए रखेगा और चांद पर व्यापार की संभावनाएं तलाशने में मदद करेगा.
अपने तीसरे से लेकर नौवें मिशन में कंपनी चांद पर पेलोड डिलिवरी सिस्टम खड़ा करेगी और इसके बाद वहां पर एक इंडस्ट्रियल प्लेटफ़ॉर्म बनाएगी.
जापान के अलावा रूस लूना-25 मिशन और दक्षिण कोरिया अपने लूनर ऑर्बिटर मिशन लॉन्च करने की योजना पर काम कर रहे हैं.
रूसी स्पेस एजेंसी रॉसकॉसमॉस के अनुसार रूस इसी साल जुलाई में लूना-25 लैंडर मिशन चांद पर उतरेगा. ये पूरी तरह देश में बना लैंडर होगा. 45 सालों में ये चांद पर रूस का पहला मिशन होगा.
उम्मीद की जा रही है कि ये चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा. नासा अपने मिशन में चांद के इसी हिस्से पर अंतरिक्ष यात्रियों को उतारने की योजना पर काम कर रहा है.
इसके बाद रूस 2024 में लूना-26, 2025 में लूना-27 और 2027-28 में लूना-28 मिशन लॉन्च करने की योजना पर काम कर रहा है.
दक्षिण कोरिया की स्पेस एजेंसी कोरिया एरोस्पोस रिसर्च इंस्टीट्यूट इस साल अगस्त में चांद के लिए अपना पाथफाइंडर लूनर ऑर्बिटर मिशन (केपीएलओ) लॉन्च करने वाली है.
ये मिशन चांद की सेहत के बारे में और जानकारी इकट्ठा करेगा और भविष्य में चांद पर भेजे जाने वाले मिशन में मदद करेगा.
नासा के कमर्शियल रोबोट्स
कई निजी कंपनियां भी इस साल चांद पर जाने की होड़ में हैं. जापानी कंपनी आईस्पेस तो इस रेस में शामिल है ही, नासा के एक कार्यक्रम कमर्शियल लूनर पेलोड सर्विसेस के तहत कई कंपनियां चांद तक सामान पहुंचाने के लिए एक-दूसरे से प्रतिद्वंदिता करने के लिए कमर कस रही हैं.
अमेरिका के ह्यूस्टन में मौजूद कंपनी इटूइटिव मशीन्स 2022 की शुरुआत में नोवी-सी नाम के छह पैर वाले लूनर रोबोट के ज़रिए चांद पर सामान पहुंचाएगा.
अमेरिका के पेन्सिल्वेनिया की एक कंपनी एस्ट्रोबॉटिक टेक्नोलॉजी इस साल के मध्य में एक मिशन लॉन्च करने वाली है. इसके ज़रिए चार पैरों वाला एक लैंडर साइंटिफ़िक रिसर्च के लिए सामान चांद की सतह तक पहुंचाएगा.
लेकिन इस मिशन का उद्देश्य क्या है?
डॉक्टर सार्जेंट के अनुसार इनमें से कई मिशन का काम चांद के वातावरण के बारे में अधिक जानकारी इकट्ठा करना है. ताकि तेज़ सोलर विंड और लूनर डस्ट से इंसानों और चांद पर भेजे जा रहे उपकरणों को बचाया जा सके.
साथ ही ये वैज्ञानिकों को ऐसे उपकरण टेस्ट करने और शोध करने के मौक़े देगा जिनके ज़रिए चांद पर पानी जैसे संसाधन की व्यवस्था की जा सके.
डॉक्टर सार्जेंट कहती हैं, "हम चाहते हैं कि चांद पर इंसान उतरे उससे पहले ये सुनिश्चित किया जाए कि सारे ज़रूरी उपकरण चांद पर पहुंचें और सही तरीके से काम करें. आख़िर में इनसे जो जानकारी इकट्ठा होगी, उसी से मंगल मिशन के लिए योजना बनने में मदद मिलेगी."
वो कहती हैं, "चांद हमारे के लिए एक बड़ी प्रयोगशाला जैसा है, वहां पर हम उन सभी तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं जो हम बाद में मंगल ग्रह पर करना चाहते हैं. चांद हमसे केवल तीन दिनों की दूरी पर मौजूद है और जबकि मंगल तक पहुंचने में हमें कम से कम छह महीनों तक का वक्त लग सकता है."
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