हिमालय में धधक रही आग से क्यों चिंतित हैं दुनिया के वैज्ञानिक

    • Author, नवीन सिंह खड़का
    • पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी

नैनीताल की नैनी झील के पीछे दिखने वाले हरे-भरे पहाड़ उत्तराखंड के इस शहर को और ख़ूबसूरत बना देते हैं. लेकिन पिछले कुछ दिनों से जंगल की आग से उठ रहे धुएं ने पहाड़ों को छुपा लिया है और अब झील की वो सुंदरता पहले जैसी नहीं है.

इस क्षेत्र में जंगलों के इतिहास के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर शेखर पाठक कहते हैं, 'मैं झील के जिस तरफ़ रहता हूं वहां से आप इस धुएं की गंध को सूंघ सकते हैं.'

वो कहते हैं, "ना सिर्फ़ देवदार के पेड़ जो बहुत जल्दी आग पकड़ते हैं, जल रहे हैं बल्कि ओक (शाह बलूत) के पेड़ भी जल रहे हैं जिसका मतलब ये है कि हालात बहुत गंभीर हैं."

जंगल की आग से सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाक़े में रहने वाले लोगों ने बीबीसी को बताया है कि वो रातों को सो नहीं पा रहे हैं.

पिथौरागढ़ ज़िले के बन्ना गांव के रहने वाले केदार अवनी कहते हैं, "हम आधी रात में जागते हैं और आसपास के जंगल में जाकर देखते हैं कि कहीं आग हमारे घरों तक तो नहीं पहुंचने वाली है."

पिथौरागढ़ पहाड़ी प्रांत उत्तराखंड का सबसे पूर्वी ज़िला है.

केदार कहते हैं, "आग ने हमारा चारा और जानवरों के लिए रखी गई घास को जला दिया है. अब हमें डर है कि कहीं हमारे घर भी ना जल जाएं."

वो कहते हैं कि आग इतनी तेज़ है कि बीस मीटर दूर से ही जलन होने लगती है.

"हमारे पास इस आग को बुझाने का कोई तरीका नहीं है."

जंगल की आग के रिकॉर्ड मामले

वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तर भारत और नेपाल के कुछ इलाक़ों में लगी जंगल की आग पिछले पंद्रह साल की सबसे भीषण आग है.

यूरोपीय संघ की कॉपरनिकस एटमॉस्फ़ेरिक मॉनीटरिंग सर्विस (सीएएमएस) के मुताबिक बीते एक महीने में उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग से 0.2 मेगा टन कार्बन उत्सर्जन हुआ है. ये 2003 के बाद से सबसे ज़्यादा है.

एजेंसी ने सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें के विश्लेषण से बताया कि इसी दौरान नेपाल में 18 मेगा टन कार्बन का उत्सर्जन हुआ है. ये 2016 के बाद से सबसे ज़्यादा है. उस साल 27 मेगा टन उत्सर्जन हुआ था.

सीएएमएस के शीर्ष वैज्ञानिक मार्क पैरिंगटन कहते हैं, "'ये बताता है कि इस क्षेत्र में आग किस तीव्रता से फैल रही है. ये चिंता की बात है."

नेपाल और उत्तराखंड में जंगल की आग से अब तक बीस लोगों की मौत की सूचना है. माना जा रहा है कि लाखों हेक्टेयर जंगल जल कर राख हो चुका है. हालांकि आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया गया है.

बीते महीने एक समय नेपाल में पांच सौ से अधिक जगह जंगलों में आग लगी थी. बीते कई दिनों से नेपाल की हवा का स्तर ख़तरनाक बना हुआ है.

नेपाल के कई राष्ट्रीय उद्यान और जंगल भारत के उद्यानों और जंगलों से मिलते हैं जिसका मतलब ये है कि नेपाल से भारत में और भारत से नेपाल में आग फैल सकती है.

लंबा सूखा

बीते कुछ महीनों से नेपाल और उत्तर भारत के कई इलाक़ों में बारिश नहीं हुई है. जिसकी वजह से जंगल सूख गए हैं.

शेखर पाठक कहते हैं, "कई महीनों से ना ही बारिश हुई है और ना ही बर्फ़ पड़ी है. यही वजह के कि अब शाहबलूत के पेड़ भी जलने लगे हैं क्योंकि जिस ज़मीन पर वो खड़े हैं वो बिलकुल सूखी है."

चिंता की एक और बात ये है कि आमतौर पर जंगलों में सबसे भीषण आग मई में लगती है. अभी ये समय आना बाकी है ऐसे में हो सकता है कि जंगलों की ये आग और भयावह रूप ले ले.

वैज्ञानिक कहते हैं कि भले ही जलवायु परिवर्तन को सीधे तौर पर इस क्षेत्र में जंगलों में आग के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता हो लेकिन इससे यहां सूखा तो बढ़ा ही है.

वहीं नेपाल और भारत के अधिकारियों का कहना है कि कई जगह जंगलों में आग पास के खेतों में फसलें जलाए जाने की वजह से भड़की है.

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये समस्या सिर्फ़ मौसम और फसलों में आग लगाने तक सीमित नहीं है.

ऑक्सफ़ैम से जुड़े और भारत के छत्तीसगढ़ में काम करने वाले प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन विशेषज्ञ विजेंद्र अजनबी कहते हैं, "सरकार के नीतिकारों को लगता है कि जंगलों का काम सिर्फ़ कॉर्बन को ऑक्सीजन में बदलना है लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि जंगलों में आग भी लगती है और इससे भी कार्बन उत्सर्जन होता है."

"भारत में जंगलों की आग अभी कोई प्राथमिकता का मुद्दा नहीं है और यही वजह है कि आमतौर पर इस पर संसद में भी चर्चा नहीं होती है."

जंगल की आग कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है?

भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने जंगलों की आग को प्राकृतिक ख़तरा नहीं माना है.

एनडीएमए ने अपनी वेबसाइट पर सिर्फ़ चक्रवात, सूनामी, हीटवेव, भूस्खलन, बाढ़ और भूखंपों को ही इस श्रेणी में रखा है.

2019 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया के विश्लेषण से पता चला था कि देश में 36 प्रतिशत जंगलों पर आग का ख़तरा है और इनमें से एक तिहाई में ये ख़तरा बहुत ज़्यादा है.

एनडीएमए के एक सदस्य कृष्ण वत्स कहते हैं, "हमने भारत में जंगल की आग को प्राकृतिक ख़तरों की सूची में नहीं रखा है क्योंकि भारत में जंगल की अधिकतर आग जान बूझकर कृषि से जुड़े कारणों की वजह से लगाई जाती हैं और ऐसे में ये एक मानवनिर्मित ख़तरा है."

वो कहते हैं, "लेकिन हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि जंगल की आग एक गंभीर ख़तरा बनता जा रहा है और यही वजह है कि हम सभी प्रांतों के वन विभागों और दूसरी एजेंसियों के साथ मिलकर इनसे निबटने के लिए काम कर रहे हैं."

फ़ायर सर्विस की कमियां

स्टैंडिंग फ़ायर एडवायज़री कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर एनडीएमए पहले ही देश की अग्निशमन सेवाओं की गंभीर ख़ामियों को उजागर कर चुका है.

समिति ने अपनी जांच में पाया था कि देश में अग्निशमन दलों में शामिल 80 प्रतिशत वाहनों में खामियां हैं जबकि देश में ज़रूरत के हिसाब से अग्निशमनकर्मियों की संख्या 96 फ़ीसद कम है.

भारत के अग्निशमन सेवा महानिदेशालय के वरिष्ठ अधिकारी और सलाहकार डीके धामी कहते हैं, "उस रिपोर्ट के बाद से हमने बहुत से सुधार किए हैं लेकिन हम ये भी जानते हैं कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है."

"उस समय हमारे पास क़रीब 55 हज़ार अग्नीशमन कर्मचारी थे. अब हमारे पास 75 हज़ार से अधिक कर्मचारी हैं."

पहले के मुकाबले सरकार ने अग्निशमन के बजट में भी बढ़ोत्तरी की है. अब सरकार ने इस साल से लेकर 2026 तक के लिए राज्यों के लिए क़रीब 50 अरब रुपए का प्रावधान किया है. ये पहले प्रावधानों के मुकाबले पांच गुणा ज़्यादा है.

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इससे ज़मीनी स्तर पर जंगल की आग से लड़ने में कोई ख़ास वास्तविक मदद नहीं हुई है.

कुमाऊं ज़िले के पर्यावरण कार्यकर्ता अनिरुद्ध जडेजा कहते हैं, "जंगल की आग पहले से बहुत अधिक गंभीर होती जा रही है लेकिन प्रशासन की कोई तैयारी नज़र नहीं आती है."

"हमारे जंगल बहुत बड़े हैं और वन विभाग के कर्मचारियों की संख्या बहुत कम है. जब भी कोई बड़ी आग लगती है, वो कुछ ख़ास नहीं कर पाते हैं."

नेपाल के भी वन विशेषज्ञों का ऐसा ही कहना है.

नेपाल के फ़ेडरेशन ऑफ़ कम्युनिटी फॉरेस्ट्री यूज़र्स की अध्यक्ष भारती पाठक कहती हैं, "हम सुनते हैं कि नेपाल को पर्यावरण के नाम पर विदेशों से करोड़ों डॉलर की मदद मिलती है लेकिन जंगलों की आग बुझाने के लिए उसमें से कुछ भी ख़र्च नहीं किया जाता है."

"हमारे कम्युनिटी फॉरेस्ट्री के काम को दुनियाभर में तारीफ़ मिली है लेकिन अब जंगलों में लगी आग सारे किए कराए को ख़त्म कर सकती है."

वहीं नेपाल के अधिकारियों का कहना है कि आग बुझाने के लिए वो जो कुछ भी कर सकते हैं कर रहे हैं.

नेपाल के वन मंत्रालय के प्रवक्ता प्रकाश लामसाल कहते हैं, "हम अपने सीमित संसाधनों से जो भी हो सकता है वो कर रहे हैं लेकिन आग ऐसे इलाक़ों में लगी है जहां पहुंचना मुश्किल होता है. उतार चढ़ाव की चोटियों, लोगों के जानबूझकर आग लगाने और सूखे मौसम की वजह से मुश्किलें आ रही हैं."

"हम सब देख चुके हैं कि विकसित देशों में भी जंगलों की आग बुझाने में कितनी दिक्कतें आती हैं."

स्थानीय समुदायों की मदद

विशेषज्ञ कहते हैं कि जंगलों में रहने वाले लोग आग बुझाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है.

पाठक कहते हैं, "इसकी वजह ये है कि जंगलों में रहने वाले लोगों और वन विभागों के बीच विश्वास की कमी है."

"जंगलों में रहने वाले बहुत से समुदाय चाहते हैं कि जंगलों पर उनके अधिकारों की रक्षा की जाए. इस वजह से उनके और वन विभाग के बीच तनाव का माहौल बना रहता है जिसकी वजह से विश्वास की कमी होती है. इसी वजह से जंगल की आग के ख़िलाफ़ लड़ाई भी प्रभावित होती है.'

वहीं वन्य अधिकारियों का कहना है कि वो क़ानून के तहत जंगलों की रक्षा करते हैं.

अजनबी कहते हैं, 'प्रशासन आमतौर पर जंगलों की आग के लिए स्थानीय समुदायों को ज़िम्मेदार ठहरा देता है लेकिन वास्तव में वह इनके साथ मिलकरी आग पर काबू पाने के लिए भी काम कर सकता है.'

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