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को-वैक्सीन को लेकर आशंका कितनी जायज़
- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हरियाणा के गृहमंत्री अनिल विज ने शनिवार को जैसे ही कोरोना पॉज़ीटिव होने की ख़बर ट्वीट की, वैसे ही भारत में बन रही को-वैक्सीन को लेकर सवाल उठने लगे.
दरअसल, अनिल विज ने 20 नवंबर को को-वैक्सीन का टीका लगवाकर वैक्सीन के तीसरे चरण के ट्रायल की शुरुआत की थी.
ऐसे में जब उनके संक्रमित होने की ख़बर सामने आई, तो को-वैक्सीन की सफलता को लेकर आशंका जताई जाने लगी.
आशंका कि क्या, को-वैक्सीन का एडवांस ट्रायल 'फ़ेल' हो गया?
हालांकि कुछ ही देर बाद ही को-वैक्सीन बनाने वाली कंपनी भारत-बायोटेक की ओर से इस पर एक विस्तृत जवाब दिया गया.
भारत बायोटेक की ओर से कहा गया है कि इस वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल के दौरान व्यक्ति को दो डोज़ दिए जाते हैं जो 28 दिनों बाद यानी लगभग एक महीने के अंतराल पर दिए जाते हैं.
समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार कंपनी ने कहा कि दूसरा डोज़ दिए जाने के 14 दिनों के बाद ही वैक्सीन के असर के बारे में पता लगाया जा सकता है. इस वैक्सीन को इस तरह से बनाया गया है कि ये उन लोगों पर प्रभावी होती है जो इसकी दो डोज़ लेते हैं.
वैक्सीन के तीसरे चरण के क्लिनिकल ट्रायल के बारे में कंपनी ने कहा कि तीसरे चरण के ट्रायल में 50 फ़ीसद लोगों को वैक्सीन दी जाती है जबकि अन्य 50 फ़ीसद को प्लेसिबो दिया जाता है.
प्लेसिबो शरीर पर किसी तरह का प्रभाव नहीं डालती. डॉक्टर इसका इस्तेमाल ये जानने के लिए करते हैं कि व्यक्ति पर दवा लेने का कितना और कैसा मानसिक असर पड़ता है.
आम बोलचाल की भाषा में कहें तो प्लेसिबो एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है जिसमें दवा का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. यह भ्रम या एहसास के आधार पर काम करती है. यानी मरीज़ को गोली तो दी जाती है लेकिन वो दवा नहीं होती.
को-वैक्सीन पर सवाल उठाने का अस्पष्ट कारण
वैक्सीनोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहरिया कहते हैं, "सबसे पहले तो यह समझना ज़रूरी है कि किसी भी ट्रायल में जो लोग हिस्सा लेते हैं वो वॉलेंटियर होते हैं और क्लीनिकल ट्रायल डबल ब्लाइंडेड होते हैं. डबल ब्लाइंडेड होने का मतलब यह हुआ कि ना तो परीक्षक को पता होता और ना ही व्यक्ति को कि उसे वैक्सीन दी गई है या फिर प्लेसिबो. इसीलिए इसे डबल ब्लाइंडेड ट्रायल कहा जाता है. ऐसे में जबकि यह ट्रायल डबल ब्लाइंडेड था तो कोई यह कैसे बता सकता है कि उन्हें (अनिल विज) असल वैक्सीन का डोज़ ही दिया गया या फिर प्लेसिबो."
डॉ. लहरिया बताते हैं, "किसी वैक्सीन ट्रायल का प्रभाव इस आधार पर तय किया जाता है कि जिन लोगों को वैक्सीन दी गई है उनमें कितने संक्रमित हुए हैं और जिन्हें नहीं दी गई उनमें से कितने लोग संक्रमित हुए हैं. इस तुलना के आधार पर वैक्सीन के प्रभाव का आंकलन किया जाता है. जिन लोगों को वैक्सीन दी गई है अगर उनमें तुलनात्मक रूप से संक्रमण कम है तो वैक्सीन प्रभावी है. लेकिन यहां यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि कोई भी वैक्सीन सौ फ़ीसद कारगर नहीं होती. इसका मतलब ये हुआ कि जिन लोगों को वैक्सीन दी गई है उनमें भी कुछ लोगों के संक्रमित होने का ख़तरा बना रहता है."
डॉ. लहरिया के मुताबिक़, कोई वैक्सीन कितनी कारगर है ये तभी मालूम चल सकता है जब सारे ट्रायल पूरे हो जाएं और संक्रमण का विस्तृत आंकलन कर लिया जाए.
वे कहते हैं कि किसी एक मामले के आधार पर वैक्सीन के प्रभाव का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है.
पहली डोज़ और दूसरी डोज़ में इतने दिनों का अंतर क्यों?
डॉ. लहरिया के अनुसार, कोई भी वैक्सीन प्राइमिंग एंड बूस्टिंग के सिद्धांत पर काम करती है. इसमें पहले डोज़ का काम होता है कि व्यक्ति के इम्यून सिस्टम को धीरे-धीरे री-एक्ट करने के लिए तैयार करे. वैज्ञानिक तौर पर इस प्रक्रिया में कुछ दिनों का समय लगता है.
अमूमन ये 7-14 दिन या फिर 21-28 दिन का समय होता है.साधारण शब्दों में कहें तो पहले डोज़ का काम है, इम्यून सिस्टम को एक्टिवेट कर देना. इसके बाद जब इम्यून सिस्टम एक्टवेट हो जाता है और अपने चरम पर होता है तो उस समय अगर उस व्यक्ति को डोज़ का दूसरा शॉट दे दिया जाए तो उसके बाद उसमें एंटीबॉडी बनने की रफ़्तार बहुत तेज़ हो जाती है.
इस चरण में व्यक्ति में हाई-लेवल एंटीबॉडी बनते हैं जिससे इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि वह व्यक्ति लंबे समय तक सुरक्षित रहेगा.
डॉ. लहरिया का कहना है कि ज़्यादातर वैक्सीन इसी सिद्धांत पर काम करती हैं. पहले डोज़ से उतनी प्रतिक्रिया नहीं मिलती है और दूसरा डोज़ देने के बाद यह ज़्यादा कारगर साबित होता है.
एक वायरस का अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग असर, फिर क्या एक ही वैक्सीन सबके लिए कारगर होगी?
जब कोई वायरस किसी व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करता है तो उससे होने वाली बीमारी के क्या लक्षण होंगे ये बहुत सी चीज़ों पर निर्भर करता है. सिर्फ़ वायरस पर नहीं.
संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. तृप्ति गिलाडा के मुताबिक़, व्यक्ति का बीमार होना सिर्फ़ वायरस पर निर्भर नहीं करता है. यह उस व्यक्ति की उम्र, रोग-प्रतिरोधक क्षमता, स्वास्थ्य लक्षणों पर निर्भर करता है. लेकिन बीमारी के लक्षण कोई भी हों, शरीर में एंटीबॉडी हर किसी के बनता है. चाहे वो लक्षण वाली बीमारी हो या फिर बिना लक्षण वाली, एंटीबॉडी सभी के शरीर में बनेगी. ठीक उसी तरह से जब किसी व्यक्ति को किसी ख़ास वायरस के लिए वैक्सीन देते हैं तो वायरस का जो जेनेटिक मैटेरियल होता है उसके अनुसार एंटीबॉडी बनते ही हैं. ऐसा बहुत रेयर होता है कि किसी के शरीर में एंटीबॉडी ही न बनती हो.
डॉ. तृप्ति कहती हैं कि कोविड वैक्सीन को लेकर अभी कोई भी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि यह कितना कारगर होगा.
लेकिन अगर वायरस लगातार म्यूटेट होता रहा तो...?
इस सवाल के जवाब में डॉ. तृप्ति कहती हैं कि हर वायरस में कुछ ऐसे हिस्से होते हैं जो तेज़ी से म्यूटेट होते रहते हैं और कुछ हिस्से ऐसे होते हैं जो जस के तस रहते हैं, जिनसे इम्यूनिटी आती है और जब भी वैक्सीन बनाया जाता है तो यह कोशिश होती है कि उस हिस्से से वैक्सीन बनाया जाए जो ज़्यादा म्यूटेट ना हो.
भारत समेत दुनिया में कोरोना वैक्सीन की स्थिति
बीते महीने की 28 तारीख़ को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के तीन वैक्सीन विकास केंद्रों का दौरा किया था.
वो अहमदाबाद में जाइडस बायोटेक पार्क, पुणे में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और हैदराबाद में भारत बायोटेक का दौरा करने पहुंचे थे.
भारत में इस वक़्त पाँच अलग-अलग कोरोना वैक्सीन के ट्रायल चल रहे हैं. इनमें से दो तीसरे और एडवांस स्टेज में हैं. इसके साथ ही सीरम इंस्टीट्यूट ने ऑक्सफ़ोर्ड वैक्सीन के अलावा, दुनिया भर में बन रहे चार और वैक्सीन बनाने वाली संस्थाओं के साथ वैक्सीन के उत्पादन का क़रार किया है.
2 दिसंबर को ब्रिटेन दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया जिसने फ़ाइज़र/बायोएनटेक की कोरोना वायरस वैक्सीन के व्यापक इस्तेमाल के लिए मंज़ूरी दी है.
कुछ अन्य वैक्सीन प्रोजेक्ट्स पर अभी काम चल रहे हैं जिन्हें लेकर माना जा रहा है कि उन्हें जल्द ही मंज़ूरी मिल सकती है.
इनमें से एक मॉडर्ना वैक्सीन है जिसमें फ़ाइज़र की तरह ही एमआरएनए तकनीक का इस्तेमाल किया गया है.
ब्रिटेन ने मॉडर्ना वैक्सीन की 70 लाख ख़ुराक के लिए पहले से ही ऑर्डर कर रखा है. माना जा रहा है कि वसंत तक इसकी खेप तैयार हो जाएगी.
ब्रिटेन ने इसके अलावा ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी और एस्ट्राज़ेनेका की कोरोना वैक्सीन के दस करोड़ ख़ुराक के लिए पहले से ऑर्डर कर रखा है.
इस वैक्सीन में नुक़सानरहित विषाणु का इस्तेमाल किया गया है जिसमें कुछ ऐसे बदलाव किए गए हैं ताकि ये कोरोना वायरस जैसा लगे.
रूस भी स्पुतनिक नाम की कोरोना वैक्सीन पर काम कर रहा है. इसके अलावा चीन की मिलिट्री ने एक वैक्सीन को मंज़ूरी दी है जिसे कैनसिनो बॉयोलॉजिक्स ने मंज़ूरी दी है.
ये दोनों वैक्सीन ऑक्सफ़ोर्ड वाली वैक्सीन के तर्ज़ पर काम कर रहे हैं.
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