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कोरोना: लॉन्ग कोविड के ये चार लक्षण हो सकते हैं
लॉन्ग कोविड यानी लंबे समय के लिए कोरोना वायरस के संक्रमण से कई लोगों के प्रभावित होने की बात सामने आ रही है. एक रिव्यू के मुताबिक़ ये चार तरह से लोगों पर असर डाल सकता है.
ये बात भी सामने आई है कि वो लोग जिनमें लगातार कोरोना वायरस के कुछ लक्षण देखे जा रहे हैं, उन पर या तो विश्वास नहीं किया जा रहा या फिर उन्हें सही इलाज नहीं मिल रहा.
नेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर हेल्थ रिसर्च के मुताबिक़, लंबे समय से कोविड-19 के शिकार लोगों पर मानसिक रूप से बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है. उन्हें बेहतर मदद की ज़रूरत है और हेल्थकेयर स्टाफ़ को इससे जुड़ी अधिक जानकारी देने की ज़रूरत है.
जिंदगी पर असर डालने वाला तजुर्बा
ज़्यादातर लोगों ने बताया कि वो कोरोना वायरस के इंफ़ेक्शन से दो हफ़्तों में ठीक हो गए. जो गंभीर रूप से बीमार थे, उन्हें तीन हफ़्ते तक का समय लगा.
लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक कई लोग 'ऑनगोइंग कोविड' के साथ जी रहे हैं. दुनियाभर में बढ़ते कोरोना वायरस के मामलों के साथ ऐसे लोगों की संख्या भी बढ़ती जा रही है.
फ़ेसबुक पर लॉन्ग कोविड सपोर्ट ग्रुप के 14 लोगों से हुई बातचीत के आधार पर हाल में ये रिसर्च पब्लिश की गई है. इस रिव्यू में पाया गया है कि लगातार रहने वाले लक्षण के कारण सांस लेने, दिमाग, दिल और इसकी प्रणाली, गुर्दे, आंत और त्वचा पर बुरा असर पड़ सकता है.
इसके चार मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:
- फेफड़ों और दिल को नुक़सान
- पोस्ट इंटेनसिव केयर सिंड्रोम
- पोस्ट वायरल फ़टीग सिंड्रोम
- लगातार रहने वाले कोविड-19 से जुड़े लक्षण
इससे पीड़ित कुछ लोगों को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा. लेकिन कई ऐसे लोग जिनमें मामूली लक्षण थे, उनका या तो टेस्ट नहीं हुआ है या फिर बीमारी का पता ही नहीं चला.
रिव्यू के मुताबिक, ऑनगोइंग कोविड-19 की पहचान के लिए नए तरीके निकालने से लोगों को मदद मिलेगी.
रिपोर्ट के मुताबिक, "ये बात धीरे-धीरे साफ़ हो रही है कि कुछ लोगों के लिए कोविड-19 संक्रमण लंबे समय तक चलने वाली बीमारी है."
"कुछ लोगों के लिए ये अस्पताल में भर्ती होने के बाद वापस ठीक होने से जुड़ा है. लेकिन कई लोगों ने 'जीवन पर असर डालने' जैसे अनुभवों का ज़िक्र किया है. इसमें पहले थोड़ा इंफ़ेक्शन होता है जो घर में ठीक हो जाता है. बाद में समय के साथ ये लक्षण गंभीर होते जाते हैं."
रिपोर्ट को लिखने वाली डॉक्टर एलेनी मैक्सवेल के मुताबिक़ वो मान रहीं थीं कि कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार लोगों पर सबसे बुरा असर पड़ेगा. साथ ही जिनके मरने का ख़तरा कम है, उनकी बीमारी के लंबे समय तक चलने का ख़तरा भी कम होगा. लेकिन रिव्यू के नतीजे बताते हैं कि ऐसा नहीं है.
"हम अब ये जानते हैं कि कई हफ़्ते तक वेंटिलेटर पर रहे लोगों के मुक़ाबले वो लोग ज़्यादा परेशान हैं जिनका कोविड का कोई रिकॉर्ड नहीं है."
मेरा बेटा खाना बना रहा हैं
जो हाउस ब्रिस्टल विश्वविद्यालय में पढ़ातीं हैं, 6 महीने पहले वो संक्रमण का शिकार हुईं थीं, लेकिन अभी तक अपने काम पर वापस नहीं लौट पाईं हैं.
शुरुआत खांसी और सांस लेने में दिक्कत से हुई, फिर अत्याधिक कमज़ोरी और सिरदर्द की शिकायत हुई, इसके बाद हार्ट और त्वचा से जुड़ी परेशानियां और दर्द शुरू हो गए.
वो कहती हैं, "एक दिन मैं उठी, तो मुझे चक्कर आ रहे थे, मैं गिर गई और फिर मुझे अस्पताल ले जाना पड़ा."
उनके हार्ट की हालत पहले से बेहतर है, सांस से जुड़ी तकलीफ़ भी कम है, लेकिन अभी भी बीमारी का उनके और उनके परिवार पर बहुत बुरा असर हो रहा है.
उनके पार्टनर ऐश में भी लक्षण आ गए है, जो कि आसानी से नहीं जाएंगे. इस कारण उनके बच्चों को सफ़ाई और खाना बनाने जैसे घर के सारे काम करने पड़ रहे हैं.
वो कहती हैं, "कई लोगों को मामूली लक्षण की श्रेणी में रखा जा रहा है, लेकिन ये मामूली लक्षण नहीं हैं. हमें उन्हें सपोर्ट करना होगा."
जो को निमोनिया हुआ था, लेकिन उनका कोरोना वायरस टेस्ट नहीं किया गया था. उन्हें अस्पताल में भर्ती भी नहीं कराया गया था. वो कहती हैं, "हम लोग बहुत बीमार थे, हम लोग डरे हुए भी थे."
रिपोर्ट में अस्पतालों के अलावा कम्यूनिटी से भी लोगों का साथ देने की अपील की गई है.
इसमें ये भी कहा गया है कि ऑनगोइंग कोविड का कुछ समूहों, जैसे काले या एशियाई लोग या वो जिन्हें किसी तरह की मानसिक बीमारी है, पर बुरा असर पड़ सकता है.
डॉक्टर मैक्सवेल कहती हैं, "हमारी कोशिश है कि इसकी मदद से हेल्थकेयर सर्विस और स्टाफ़, मरीज़ों को बेहतर तरीके से समझें और उन्हें बेहतर इलाज और सपोर्ट देने में मदद मिले.
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