You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कोरोना वायरस: रेमडेसिविर बना सकेंगी 4 भारतीय कंपनियां पर कब आएगी बाज़ार में
अमरीका की एक दवा बनाने वाली कंपनी ने कोविड रोगियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा रेमडेसिविर की सप्लाई बढ़ाने के लिए भारत और पाकिस्तान की दवा कंपनियों के साथ समझौता किया है.
अमरीकी फ़ार्मास्युटिकल कंपनी गिलीएड ने भारत और पाकिस्तान की पाँच दवा कंपनियों के साथ समझौता किया है जिससे वो 127 देशों में इस दवा को उपलब्ध करा सकेंगी.
रेमडेसिवर पर दुनिया के कई देशों में क्लीनिकल ट्रायल हुए जिनमें पाया गया कि इस दवा के इस्तेमाल से रोगियों के ठीक होने का समय 15 दिन से घटकर 11 दिन हो जाता है.
ये दवा वायरस के जीनोम पर असर करती है जिससे उसके बढ़ने की क्षमता पर असर पड़ता है.
कैलिफ़ोर्निया स्थित अमरीकी कंपनी गिलीएड ने ये दवा इबोला बीमारी के लिए बनाई थी.
कौन हैं ये कंपनियाँ
गिलीएड की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि अभी कंपनी ने जिन कंपनियों के साथ समझौता किया है उसके तहत इन पाँचों कंपनियों को गिलीएड से इस दवा को बनाने की टेक्नोलॉजी मिलेगी जिससे वो दवा का उत्पादन जल्दी कर सकेंगे.
बयान के अनुसार इस लाइसेंस के लिए कंपनी तब तक रॉयल्टी नहीं लेगी जब तक कि विश्व स्वास्थ्य संगठन कोविड-19 को लेकर घोषित आपातकाल को वापस नहीं हटा लेता, या इस बीमारी की कोई नई दवा या वैक्सीन को नहीं बना लिया जाता.
भारत की जिन चार कंपनियों के साथ समझौता किया गया है वो हैं – सिप्ला लिमिटेड, हेटेरो लैब्स लिमिटेड, ज्यूबिलेंट लाइफ़साइंसेज़ और माइलन.
पाकिस्तान की कंपनी का नाम है – फ़िरोज़सन्स लेबोरेट्रीज़.
कब शुरू होगा उत्पादन
हैदराबाद स्थित निजी कंपनी हेटेरो लैब्स के महाप्रबंधक वाम्सी कृष्णा बांदी ने बीबीसी से कहा कि अभी ये कहना मुश्किल है कि दवा की कीमत क्या होगी और इसका उत्पादन कब शुरू होगा.
उन्होंने कहा, ”स्थिति जून में और स्पष्ट होगी. हमारा अनुमान है कि इस दवा का सरकारी संस्थानों के ज़रिए नियंत्रित इस्तेमाल होगा. हमारा मुख्य उद्देश्य है कि भारत अगर इसका इस्तेमाल करता है तो वो इसे बनाने को लेकर आत्मनिर्भर हो जाए.“
एक अरब डॉलर के कारोबार वाली ये कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी ऐंटी-रेट्रोवायरल दवा बनाने वाली कंपनियों में आती है, जो एचआईवी-एड्स के 50 लाख रोगियों को दवा उपलब्ध कराती है.
हेटेरो लैब्स दुनियाभर में अपने 36 कारखानों में लगभग 300 तरह की दवाएँ बनाती है.
फ़िलहाल भारत में वैज्ञानिकों और दवा नियंत्रकों को ये तय करना है कि वे इस दवा का इस्तेमाल कैसे करेंगे.
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक रमन गंगाखेडकर ने कहा है कि वो इस दवा के इस्तेमाल के बारे में विचार करेंगे यदि भारतीय दवा कंपनियाँ इन्हें बना सकें.
उन्होंने कहा, “प्रारंभिक आँकड़ों से ऐसा लगता है कि ये दवा कारगर है. हम डब्ल्यूएचओ के परीक्षणों के नतीजों की प्रतीक्षा करेंगे और ये भी देखेंगे कि क्या दूसरी कंपनियाँ भी इस पर काम कर सकती हैं.“
परीक्षण में उत्साहवर्धक परिणाम
अमरीकी संस्था नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ एलर्जी ऐंड इन्फ़ेक्शस डिज़ीज़ेस (NIAID) ने इस दवा का क्लीनिकल ट्रायल किया था जिसमें दुनिया के कई देशों के हॉस्पिटलों में 1,063 लोगों पर परीक्षण किया गया और जिनमें अमरीका, ब्रिटेन, फ़्रांस, इटली, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देश शामिल हैं.
कुछ रोगियों को दवाएँ दी गईं जबकि कुछ का प्लैसीबो या वैकल्पिक इलाज किया गया.
NIAID के प्रमुख एंथनी फ़ाउची ने कहा, ”रेमडेसिविर से स्पष्ट देखा गया कि इससे रोगियों में सुधार का समय घट गया है.”
उन्होंने कहा कि नतीजों से ये सिद्ध हो गया कि कोई दवा इस वायरस को रोक सकती है और इससे रोगियों के इलाज की संभावना का द्वार खुल गया.
मगर इस दवा से इस बात का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिल सका है कि इससे कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है.
जिन रोगियों को रेमडेसिवर दी गई उनमें मृत्यु दर 8% पाई गई. वहीं जिन रोगियों का इलाज प्लेसिबो से किया गया उनमें मृत्यु दर 11.6% थी.
कुछ सवाल
बीबीसी के स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता जेम्स गैलेघर का कहना है कि अभी ये साफ़ नहीं है कि इस दवा से किसे फ़ायदा होगा और इससे कुछ सवाल भी पैदा होते हैं.
क्या इससे ऐसे लोग और जल्दी ठीक हो जा रहे हैं ऐसे भी ठीक हो रहे थे?
या क्या इससे लोगों को आईसीयू में पहुँचने की स्थिति से बचाया जा सकता है?
ये दवा युवाओं में ज़्यादा कारगर रही या बूढ़े लोगों में?
या ऐसे लोगों में कारगर हुई जिन्हें पहले से कोई बीमारी नहीं थी?
संवाददाता का कहना है कि ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो इस दवा का पूरा ब्यौरा सामने आने के बाद पूछे जाएँगे.
- कोरोना वायरस के क्या हैं लक्षण और कैसे कर सकते हैं बचाव
- कोरोना महामारीः क्या है रोगियों में दिख रहे रैशेज़ का रहस्य
- कोरोना वायरसः वो शहर जिसने दुनिया को क्वारंटीन का रास्ता दिखाया
- कोरोना वायरस से संक्रमण की जांच इतनी मुश्किल क्यों है?
- कोरोना वायरस वैक्सीन: दुनिया भर की नज़र आख़िर भारत पर क्यों?
- कोरोना संकट: गूगल, फ़ेसबुक, ऐपल और एमेज़ॉन का धंधा कैसे चमका
- कोरोना वायरसः वो छह वैक्सीन जो दुनिया को कोविड-19 से बचा सकती हैं
- कोरोना वायरस: सरकार का आरोग्य सेतु ऐप कितना सुरक्षित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)