कोरोना वायरसः क्या 5G टेक्नॉलॉजी से भी संक्रमण फैल सकता है?

    • Author, राचेल सायरा एवं एलेनोर लॉरी
    • पदनाम, बीबीसी रियलिटी चेक

वैज्ञानिक समुदाय ने उन दावों की निंदा की है जिसमें कहा जा रहा था कि कोरोना वायरस संक्रमण फैलाने में 5-जी तकनीक ने मदद की है.

सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो शेयर किए गए हैं जिनमें बर्मिंघम और मेर्सेसाइड में इन दावों के चलते मोबाइल टॉवर को जलाया गया है.

इतना ही नहीं, इन पोस्ट को फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर सैकड़ों, हजारों फॉलोअर वाले वेरिफाइड एकाउंट्स यूजर्स ने शेयर किया है.

लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि कोविड-19 और 5-जी तकनीक के बीच संबंधों की बात पूर्ण बकवास है और यह जैविक रूप से संभव नहीं है.

एनएचएस इंग्लैंड मेडिकल के निदेशक स्टीफन पाविस ने ऐसे कांस्पेरिज थ्योरीज को, सबसे ख़तरनाक फेक न्यूज बताया है.

कांस्पेरेसी थ्योरी

जो लोग ऐसे पोस्ट शेयर कर रहे है वो सब कांस्पेरेसी थ्योरी को बढ़ावा दे रहे हैं. जिसमें 5-जी की मदद से कोरोना वायरस संक्रमण फैलने का झूठा दावा किया जा रहा है.

5-जी का इस्तेमाल मोबाइल फोन नेटवर्क के लिए किया जाता है और यह रेडियो वेब पर काम करता है.

इन थ्योरीज में कहा जा रहा है कि यह तकनीक कोरोना वायरस संक्रमण के फैलने के लिए जिम्मेदार है.

ऐसी थ्योरीज़ पहली बार जनवरी महीने के अंतिम सप्ताह में फेसबुक पर नजर आया था. इसी वक्त अमरीका में कोरोना वायरस संक्रमण का पहला मामला सामने आया था.

इन थ्योरीज़ वालों को मोटो तौर पर दो कैंप में रख सकते हैं-

• पहला कैंप वह जिसमें दावा किया जा रहा है कि 5-जी से इंसानों की प्रतिरोधी क्षमता कम होती है, जिसके चलते लोगों के कोरोना वायरस से संक्रमित होने की आशंका बढ़ जाती है.

• वहीं दूसरे कैंप में वे लोग हैं जो दावा कर रहे हैं कि पांच-जी तकनीक की मदद से वायरस को फैलाया जा रहा है, किसी तरह ट्रांसमिट किया जा रहा है.

रेडियो तरंगों से गर्मी

रीडिंग यूनिवर्सिटी के सेल्यूलर माइक्रोबॉयलॉजी विभाग के एसोशिएट प्रोफेसर डॉक्टर सिमोन क्लार्क, इन दोनों सिद्धांतों को पूर्ण रूप से बकवास बताते हैं.

सिमोन क्लार्क कहते हैं, "5-जी तकनीक से लोगों की प्रतिरोधी क्षमता कम होती है, यह दावा खरा नहीं उतरता. लोगों की प्रतिरोधी क्षमता थकान से कम हो सकती है या फिर अच्छी डाइट के अभाव में कम हो सकती है. हालांकि इनसे बहुत ज्यादा का अंतर नहीं आता लेकिन इससे वायरस से संक्रमित होने का खतरा जरूर बढ़ जाता है."

वैसे काफी शक्तिशाली रेडियो तरंगों से गर्मी जरूर उत्पन्न होती है, लेकिन 5-जी तकनीक से इतनी ज्यादा गर्मी भी उत्पन्न नहीं होती है कि उसका कोई असर आम लोगों पर हो.

सिमोन क्लार्क बताते हैं, "रेडियो तरंगे शारीरिक क्रियाओं को प्रभावित कर सकत है, लेकिन यह तब होगा जब वह आपके शरीर के तापमान को बढ़ा दे. वैसी स्थिति में लोगों की प्रतिरोधी क्षमता काम नहीं करेगी. लेकिन 5-जी रेडियो तरंगें छोटी होती हैं. वह इतनी शक्तिशाली नहीं होती हैं कि उनका असर लोगों की प्रतिरोधी क्षमता पर पड़े. इस पर काफी अध्ययन किया जा चुका है."

कम फ्रीक्वेंसी वाली तरंगें

5-जी तकनीक और दूसरे मोबाइल फोन तकनीकों में जिन रेडियो तरंगों का इस्तेमाल होता है वे इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में कम फ्रीक्वेंसी वाली तरंगें होती है.

यह दिखने वाली प्रकाश की तुलना में कम शक्तिशाली होता है और इससे शरीर की कोशिकाओं को नुकसान नहीं होता है.

सूर्य की किरणों और मेडिकल एक्सरे जैसी ज्यादा फ्रीक्वेंसी वाली तरंगों से शरीर की कोशिकाओं को नुकसान होता है.

ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में पेडियाट्रिक्स विभाग के प्रोफेसर एडम फिन के मुताबिक 5-जी तकनीक की मदद से वायरस को ट्रांसमिट करना असंभव है.

एडम फिन बताते हैं, "कोरोना वायरस की मौजूदा महामारी में वायरस एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरे तक पहुंचता है. इस सच को हमलोग जानते हैं. किसी संक्रमित व्यक्ति के वायरस को लैब में बढ़ाया भी जा सकता है. लेकिन मोबाइल फोन और इंटरनेट कनेक्शन में काम आने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें और वायरस, दोनों अलग अलग चीजें हैं. चूने और पनीर में जितना अंतर होता है, उतना समझ लीजिए."

कोरोना वायरस संक्रमण

इसके अलावा इस कांस्पेरीज थ्योरी में एक दूसरी अहम खामी भी नजर आती है- कोरोना वायरस ब्रिटेन के उन शहरों में भी फैल रहा है जहां अभी तक 5-जी की तकनीक का इस्तेमाल शुरू नहीं हुआ है.

यह बीमारी ईरान जैसे देशों में भी फैल रही है जहां अभी तक इस तकनीक की शुरुआत भी नहीं हुई है.

कोरोना वायरस संक्रमण के फैलने से पहले भी 5-जी तकनीक को लेकर डराने वाले कई दावे किए जा रहे थे. जिनकी पड़ताल बीबीसी की रियलिटी चेक की टीम ने की थी.

ऐसा ही एक दावा यह थ कि क्या 5-जी तकनीक से स्वास्थ्य को ख़तरा हो सकता है?

इस साल की शुरुआत में, वॉचडॉग की भूमिका निभाने वाली संस्था इंटरनेशनल कमीशन ऑन नान-आयोनाइजिंग रेडिएशन प्रोटेक्शन (आईसीएनआईआरपी) ने अपने लंबे अध्ययन के बाद उन दावों को खारिज किया जिसमें इस तकनीक इस्तेमाल से स्वास्थ्य को खतरा बताया जा रहा था.

अफवाहें चिंता में डालने वाली हैं...

कमीशन की ओर से कहा गया कि मोबाइल नेटवर्क के इस्तेमाल से कैंसर या किसी दूसरी बीमारी होने को कोई साक्ष्य नहीं मिला है.

बावजूद इसके तकनीक के इस्तेमाल को लेकर अफवाहें थमने का नाम नहीं ले रही हैं.

कारोबारी संस्था मोबाइल यूके ने कहा कि कोरोना वायरस और 5-जी तकनीक के आपसी संबंधों को लेकर फैल रही अफवाहें चिंता में डालने वाली हैं.

वहीं यूके के डिजिटल, कल्चर, मीडिया एवं स्पोर्ट्स विभाग ने इन दोनों में किसी तरह का कोई विश्वसनीय संबंध नहीं पाया है.

वायरस इंसान या जानवरों की कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं और वहां खुद की संख्या बढ़ाते रहते हैं, जिसके चलते इंफेक्शन होता है.

वायरस किसी जीवित कोशिका के बाहर लंबे समय तक नहीं रह पाते हैं लिहाजा वे एक रास्ता तलाशते हैं, अमूमन यह खांसी या छींक के बाद निकले ड्रॉपलेट्स के माध्यम से दूसरों तक पहुंच जाते हैं.

कोरोना वायरस के जीनोम सीक्वेंसिंग से पता चलता है कि यह जानवरों से इंसानों तक पहुंचा और उसके बाद इस संक्रमण के एक इंसान से दूसरे इंसान के बीच फैलने की शुरुआत हुई.

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