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एडिनबरा यूनिवर्सिटी ने श्रीलंका को लौटाईं वेद्दा जनजाति की 200 साल पुरानी खोपड़ियां
स्कॉटलैंड की एडिनबरा यूनिवर्सिटी ने श्रीलंका के नौ आदिमानवों की खोपड़ियां उनके वंशजों को लौटा दी हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि ये हड्डियां श्रीलंका की वेद्दा जनजाति के सदस्यों की हैं, जो 200 वर्षों से भी ज़्यादा पुरानी हो सकती हैं.
ये हड्डियां यूनिवर्सिटी के शरीर रचना विज्ञान संग्रह का हिस्सा थीं और इन्हें कम से कम 100 साल पहले जुटाया गया था.
आदिमानवों की इन खोपड़ियों और हड्डियों को यूनिवर्सिटी के प्लेफ़ेयर पुस्तकालय के एक कार्यक्रम में वेद्दा प्रमुख वन्निया उरुवारिगे के समक्ष पेश किया है.
वन्निया ने कहा, "हमारे मृतक पूर्वज वेद्दा समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. हर साल हम इन्हें सम्मानित करने के लिए एक ख़ास कार्यक्रम करते हैं. भले ही हमारे पूर्वजों के अवशेष इतने वर्षों तक एडिनबरा में थे लेकिन उनकी आत्माएं हमारे साथ श्रीलंका में थीं. अब हमारे पूर्वजों के भौतिक अवशेष और आत्माओं का मिलन हो गया है और इसके लिए मैं विश्वविद्यालय का शुक्रिया अदा करता हं. ये मेरे लोगों के लिए बेहद ख़ास पल है. "
हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि वेद्दा जनजाति की ये अस्थियां यूनिवर्सिटी के संग्रह का हिस्सा कैसे बन गई. एडिनबरा यूनिवर्सिटी में 12,000 पुरानी चीज़ें और अवशेष रखे हुए हैं.
जर्मनी और एडिनबरा में इन हड्डियों पर अध्ययन करने वाले कुछ शोधकर्ताओं ने इनके श्रीलंका की वेद्दा जनजाति से ताल्लुक रखने की पुष्टि की है.
शोधकर्ताओं ने ये भी कहा कि वेद्दा जनजाति के लोग पहले श्रीलंका के घने जंगलों में शिकारियों का जीवन व्यतीत करते थे.
ये जानकारियां सामने आने पर एडिनबरा यूनिवर्सिटी ने जब ये हड्डियां वेद्दा समुदाय के लोगों को लौटाने का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया.
शोधकर्ताओं का कहना है कि वेद्दा जनजाति के लोगों की पारंपरिक जीवनशैली पर अगले दो पीढ़ियों में विलुप्त होने का ख़तरा मंडरा रहा है. विशेषज्ञों ने गृह युद्ध और ज़मीन खोने की इसकी वजह बताया है.
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यूनिवर्सिटी में मानव रचना विज्ञान के प्रमुख प्रोफ़ेसर टॉम गिलिंगवॉटर ने कहा कि उन्हें एडिनबरा में वेद्दा समुदाय का स्वागत करके बहुत ख़ुशी हुई.
प्रोफ़ेसर टॉम ने कहा, "हमारे विशाल और विविधतापूर्ण संग्रह का इस्तेमाल अक्सर शोध कार्यों और सीखने-सिखाने में होता है. हमें ख़ुशी है कि हम सांस्कृतिक तौर पर महत्वपूर्ण अवशेषों को उनके वंशजों को लौटा सके और वेद्दा परंपरा को आने वाली पीढ़ियों के लिए संजोने में मदद कर सके."
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