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सद्दाम हुसैन को बेबीलोन से प्यार क्यों था
- Author, पॉल कूपर
- पदनाम, बीबीसी कल्चर
इराक़ में सूर्य की प्रचंड रोशनी में सद्दाम हुसैन के चमकते महल को नहीं देखा जा सकता था. चारों तरफ़ से और सभी कोणों से इसमें बड़ी-बड़ी खिड़कियां थीं.
आप घुमावदार सड़क से और ढलान के ज़रिए ऊपर चढ़ सकते हैं. जैतून और खजूर के पेड़ यहां जंगल की तरह उगे हुए थे, लेकिन एक दिन ये पेड़ भव्य पार्क के रूप में तब्दील हो गए. यह सद्दाम हुसैन का सबसे शानदार महल था.
महल के भीतर उसकी चमक और शान के अवशेष को अब भी महसूस किया जा सकता है और यह महल के प्रवेशद्वार से ही शुरू हो जाता है.
अब इसकी दीवारों पर दाग़ दिखते हैं और आसपास बच्चे फुटबॉल खेलते नज़र आते हैं. अब महल देखने से ही पता चल जाता है कि इसमें सद्दाम हुसैन नहीं रहते हैं. अगर आप बेडरूम से बालकनी में जाते हैं तो वहां से महल के इतिहास और वर्तमान दोनों की तस्वीर उभरकर सामने आ जाती है.
बेबीलोन से सद्दाम का प्रेम
यह 2,500 ईसा पूर्व पुराने बेबीलोन का वह इलाक़ा है जिसका दबदबा कभी पूरी दुनिया में था. जब आप बेबीलोन के खंडहरों को देखेंगे तो पता चलेगा कि एक महान शासक की मौजूदगी विरासत के तौर पर हज़ारों सालों से है.
वास्तव में सद्दाम हुसैन कोई पहले शासक नहीं थे, जिन्होंने प्राचीन खंडहरों का इस्तेमाल अपने तरीक़े से किया है बल्कि इसके उलट इतिहास में तानाशाह शासकों और अवशेषों के इस्तेमाल की लंबी परंपरा रही है.
इसकी वजह यह है कि खंडहर जैसे दिखते हैं वो बिल्कुल वैसे ही नहीं होते हैं. ये खंडहर यादों और मान्यताओं की क़ब्र होते हैं. इससे किसी भी तानाशाह को अतीत की महानता का चोला ओढ़ने में मदद मिलती है. वो तानाशाह अतीत की महानता को फिर से स्थापित करने का दावा करता है.
खंडहरों के ऐसे इस्तेमाल के अपने ख़तरे भी हैं. इस्लामिक स्टेट के हमले में कई प्राचीन इमारतों को निशाने पर लिया गया. सद्दाम हुसैन के साथ मुसोलिनी और हिटलर की ऐसी विरासतों को बचाने की कोशिशें की थीं.
बेबीलोन में बुलडोज़र
वर्तमान समय में इराक़ पुरातात्विक विरासत के मामले में काफ़ी संपन्न है. दजला और फरात नदियां इराक़ की रीढ़ की हड्डी है. इराक़ में यूरुक, यूआर, बेबीलोन और निनेवेह के खंडहर आज भी काफ़ी अहम हैं.
इराक़ की ऐतिहासिक विरासतों की औपनिवेशिक ताक़तों ने चोरी भी की है. इराक़ ने विदेशी संग्रहालयों में मौजूद अवेशेषों पर दावा भी किया. 19वीं सदी में लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में कुछ ऐसे ही अवशेष मिले थे. इसके साथ ही बर्लिन के एक संग्रहालय में बेबीलोन में इश्तार गेट के टाइल्स मिले थे.
सद्दाम हुसैन ने जब राष्ट्रपति की कमान संभाली तो उन्होंने इन अवशेषों का इस्तेमाल दूसरे कामों के लिए करने का फ़ैसला किया. उन्होंने अपने नेतृत्व में इराक़ी सर्वोच्चता स्थापित करने की कोशिश की.
इस फ़ैसले से पुरातत्व की अहमियत इराक़ में बढ़ गई. सद्दाम का कहना था कि प्राचीन चीज़ें इराक़ियों की सबसे बहुमूल्य संपदा हैं और वो चाहते हैं कि पूरी दुनिया देखे कि उनकी पुरानी सभ्यता ने मानवीय जीवन के विकास में किस हद तक मदद की है.
सद्दाम हुसैन और उनकी पार्टी की ताक़त के विस्तार के साथ ही इराक़ के प्राचीनकालीन वस्तुओं के विभाग के बजट में 80 फ़ीसदी से ज़्यादा की बढ़ोतरी की गई. सद्दाम हुसैन के दिल में बेबीलोन हमेशा से केंद्र में रहा है.
दीवार खड़ी करने का आदेश
18वीं सदी से छठी सदी ईसा पूर्व का यह शहर दुनिया की अहम ऐतिहासिक धरोहर है. से संभवत: पहली सभ्यता है जिसमें दो लाख से अधिक लोग रहते थे. चार ईसा पूर्व में सिकंदर ने इस पर कब्ज़ा किया था और यहां शासन किया था. इसी के बाद वो आगे और युद्ध लड़ने चले गए अपने नए 'सिंकदर के साम्राज्य' की स्थापना की.
लेकिन बाद के वक्त में यहां आने वाले यात्रियो ने इसे एक खंडहर बताया. सद्दाम हुसैन बेबीलोन के इन खंडहरों से हमेशा से प्रभावित रहे थे. सद्दाम हुसैन ने इनकी दीवारों को फिर से खड़ा करने का आदेश दिया था.
ईरान के साथ युद्ध के दौरान उन्होंने इसमें लाखों डॉलर का निवेश किया था. इसकी दीवारें 11 मीटर से ज़्यादा ऊंची की गई थीं. सद्दाम हुसैन के इस क़दम की पुरातत्वविदों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना की थी.
तब उनकी आलोचना में कहा गया था कि एक निरंकुश शासक उस स्थान पर डिज़नीलैंड बना रहे हैं.
सद्दाम हुसैन ने उस जगह पर आख़िरकार रोमन शैली में एक थिएटर का निर्माण कराया. जब उनसे पुरातत्वविदों ने कहा कि बेबीलोनिया के शासकों ने ईंटों पर अपने नाम खुदवाए थे तो सद्दाम हुसैन ने भी अपना नाम ईंटों खुदवाने का आदेश दिया.
उनकी इन कोशिशों को अमरीकी राजनयिक पॉल ब्रेनर "मज़ाक, नक़ल और आत्मुग्ध हो कर की गई कोशिशें" कहते हैं. 2003 में अमरीका के हुसैन को इराक़ की सत्ता से बेदख़ल करने के बाद वहां ब्रेनर ने अहम भूमिका अदा की थी.
ईरान पर हमले का जश्न
1981 में बेबीलोन में ईरान पर इराक़ी हमले की पहली बरसी को लेकर महोत्सव मनाया गया था. इस महोत्सव में नारा लगाया जा रहा था- कल नेबुचदनेज़ार और आज सद्दाम हुसैन.
नेबुचदनाज़ार बेबीलोनिया के शासक थे. सद्दाम हुसैन ने ख़ुद को बेबीलोन का उत्तराधिकार घोषित करने की ख़ूब कोशिश की थी. बग़दाद में इश्तार गेट के ठीक सामने सद्दाम ने अपनी मूर्ति बनवाई थी.
ऐसा 1988 में एक महोत्सव के दौरान किया गया था. इस महोत्सव में एक अभिनेता ने नेबुचदनेज़ार का किरदार अदा किया था और वहां के संस्कृति मंत्री को एक बैनर सौंपा था जिसमें सद्दाम हुसैन प्राचीन राजाओं का पोता और दोनों प्राचीन नदियों का उत्तराधिकारी घोषित किया गया था.
मुसोलिनी और हिटलर की राह पर सद्दाम
हालांकि सद्दाम ने जो किया वो मुसोलिनी की नक़ल से ज़्यादा कुछ नहीं था. 20वीं सदी की शुरुआत में मुसोलिनी ने ख़ुद को 'द लीडर' घोषित कर लिया था. इससे पहले की सरकारों ने भी प्राचीन रोम के उत्तराधिकार होने का दावा किया था, लेकिन फ़ासीवादी मुसोलिनी इसे नए स्तर पर लेकर गए.
अपने प्रचार में मुसोलिनी ख़ुद को नए ऑगस्टस बताते थे. मुसोलिनी ने 1922 में अपना जन्मदिन मनाते वक़्त रोम की अहमियत को रेखांकित किया था.
मुसोलिनी ने कहा था, ''यह हमारा प्रतीक है. आप चाहते हैं कि हमारी मान्यताएं, एक रोमन इटली का सपना ज़मीन पर आए तो ये फ़ासीवाद में दिखाई पड़ता है.''
मुसोलिनी ने इस रोम का सपना लिए जो किया वो इतिहास में अपनी क्रूरता के लिए जाना जाता है. ऑगस्टस की क़ब्र जहां खुदवाई गई थी और मुसोलिनी ने भी वहां पर भी एक निर्माण करवाया था.
मई 1938 यानी दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने से ठीक 16 महीने पहले हिटलर इटली की राजधानी पहुंचे थे. हिटलर के इस दौरे में मुसोलिनी ने उन्हें अपने द्वारा कराए गए निर्माण को दिखाया था.
हिटलर रात में वहां गए थे और मुसोलिनी के लोगों ने वहां की इमारतों को लाल रोशनी से सजाया था.
हिटलर भी ऐतिहासिक अवशेषों से काफ़ी प्रभावित रहते थे. हिटलर के दफ़्तर में फ़्रांसीसी कलाकार ह्यूबर्ट रॉबर्ट की एक पेंटिंग लगी रहती थी. हिटलर ने भी अपने जीवन में कई पेंटिंग्स बनाई थीं.
हिटलर आधुनिक स्थापत्य कला से नफ़रत कई बार जता चुके हैं. उन्हें प्राचीन तरीक़े काफ़ी लुभाते थे.
हिटलर के लिए ये ऐतिहासिक अवशेष एक महान समाज की ओर इशारा करते थे जिसे दोबारा बनाने पर काम किया जाना चाहिए.
हिटलर के अनुसार ऐसी इमारतें बनाई जानी चाहिए जो अवशेष बन जाने पर भी आने वाली पीढ़ी के लोगों को प्रोत्साहित करती रहे.
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