पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं का दिमाग़ ज़्यादा जवां

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- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महिलाओं का दिमाग़ पुरुषों के दिमाग़ के मुक़ाबले ज़्यादा जवां होता है.
ये लाइन पढ़ते ही आप सोच रहे होंगे कि इसका मतलब क्या है और ये कैसे हो सकता है?
तो आप इसे ऐसे समझिए कि एक महिला और पुरुष दोनों ही 40 साल के हैं लेकिन महिला का दिमाग़ उस हमउम्र पुरुष के दिमाग़ से जवां होगा.
ये दावा एक नए अध्ययन में किया गया है.
अमरीका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ मेडिसिन के रिसर्चरों की एक टीम ने ये अध्ययन किया है.
रिसर्च में शामिल रेडियोलॉजिस्ट मनु श्री गोयल बताते हैं, "हमने 20 से 82 साल की उम्र के 205 लोगों पर ये अध्ययन किया है. ये सभी लोग पूरी तरह स्वस्थ थे और किसी को याददाश्त संबंधी समस्या नहीं थी."
उन्होंने कहा, "हम देखना चाहते थे कि उम्र के साथ इंसान का मेटाबॉलिज़्म कैसे बदलता है."

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अब ये मेटाबॉलिज़्म क्या होता है?
मेटाबॉलिज़्म मतलब आपका दिमाग़ कितनी ऑक्सीजन और ग्लूकोज़ इस्तेमाल कर रहा है.
ग्लूकोज़ खाने-पीने की चीज़ों से बनता है. फिर ये ऑक्सीजन के साथ घुलकर खून के रास्ते शरीर के बाकी हिस्सों में जाता है.
डॉक्टर मनु बताते हैं कि ग्लूकोज़ का 25 फ़ीसदी हिस्सा दिमाग़ में जाता है. इस ऑक्सीजन और ग्लूकोज़ की मदद से हमारा दिमाग़ काम करता है. इससे दिमाग़ एक्टिव बना रहता है और स्वस्थ रहता है.

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लेकिन उम्र बढ़ने के साथ हमारा दिमाग़ ऑक्सीजन और ग्लूकोज़ का इस्तेमाल कम कर देता है. जिससे हमारी याददाश्त भी कमज़ोर हो जाती है.
डॉक्टर मनु और उनकी टीम ने यही देखने के लिए अध्ययन किया था कि उम्र के साथ मेटाबॉलिज़्म की ये प्रक्रिया कैसे बदलती है.
इस अध्ययन में उन्होंने पाया कि उम्र बढ़ने के साथ दिमाग़ के मेटाबॉलिज़्म में कई महत्वपूर्ण बदलाव होते हैं.
दूसरा हासिल ये था कि एक ही उम्र के महिला और पुरुष के दिमाग़ का मेटाबॉलिज़्म कुछ अलग था और महिलाओं का मेटाबॉलिज़्म पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा अच्छा था.
या कहा जाए, महिलाओं का दिमाग़ पुरुषों के दिमाग़ से ज़्यादा जवां था.
शोधकर्ताओं का कहना है कि औसतन उनमें ब्रेन एज का अंतर तीन साल था. कई लोगों में एक साल और कई में तीन साल से ज़्यादा भी था.
उनके मुताबिक़ ये ऐसी पहली स्टडी है जिसमें ब्रेन की एज के अंतर को नापा गया, वो भी मेटाबॉलिज़्म के आधार पर.

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तो ये पता कैसे चला?
डॉ मनु बताते हैं कि जिन 205 लोगों पर ये अध्ययन किया गया, उन्हें एक-एक कर एमआरआई की तरह दिखने वाली पेट स्कैनर मशीन में सुलाया गया.
पेट (Positron Emission Tomography) दिमाग़ का मेटाबॉलिस्टम नापने के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है. हर व्यक्ति को तीन घंटे तक इस स्कैनर में सुलाया गया. इस दौरान उन्हें हिलना नहीं था. उन्हें सुलाने के लिए दवा दे दी गई थी.
पेट स्कैनर ने उनके दिमाग़ को स्कैन किया. फिर इस स्कैनर से मिले डेटा का एक कम्प्यूटर के ज़रिए अध्ययन किया गया.
रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर मनु बताते हैं, "इस कम्प्यूटर को ख़ास तौर पर ट्रेन किया गया है. जैसे उसे पता है कि 20 साल का ब्रेन कैसा दिखता है और 70 साल का कैसा."

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डॉक्टर मनु के मुताबिक़ इस अध्ययन से मिले डेटा को कम्प्यूटर में डाला गया तो एक उम्र के महिला और पुरुष के दिमाग़ में कुछ अंतर देखने को मिला. दोनों ही उम्र में एक थे, लेकिन उनके दिमाग़ दिखने में कुछ अलग थे.
डॉ मनु ने कहा, "हमने 40 साल के पुरुष और 40 साल की महिला का दिमाग कम्प्यूटर को दिखाया और उनके बीच की उम्र का अंतर पूछा. उस कम्प्यूटर ने कहा कि इस महिला का दिमाग़ उस पुरुष के दिमाग से कुछ जवां दिख रहा है."
"हमें लगता है कि इसका कारण है कि महिला के दिमाग़ में ब्लड फ़्लो और ग्लूकोज़ का इस्तेमाल ज़्यादा हो रहा है."

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दिमाग़ के जवां होने का मतलब क्या है
डॉक्टर मनु का कहना है कि महिलाओं के दिमाग का मेटाबॉलिज़्म पुरुषों के दिमाग़ के मुक़ाबले बेहतर था, इसलिए 'दिखने' में महिला का दिमाग़ ज़्यादा जवां था.
ये बोलते हुए उन्होंने 'दिखने' शब्द पर ज़ोर दिया. उनका कहना था कि दिमाग जवां दिख रहा था, लेकिन जवां होने का मतलब क्या है, ये अध्ययन में निकलकर नहीं आया है. "ये पता लगाने के लिए और अध्ययन किए जाने की ज़रूरत है."
हालांकि उन्होंने कहा कि इसका मतलब ये हो सकता है कि महिलाओं की याददाश्त अच्छी होती है, सोचने की शक्ति बेहतर होती है.

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और इसकी वजह क्या है?
अब सवाल ये भी उठता है कि किसी का दिमाग़ किसी हमउम्र के दिमाग़ से जवां कैसे हो सकता है?
डॉक्टर मनु कहते हैं कि अध्ययन की फाइंडिग्स में ये बात नहीं है. "लेकिन जो लोग कम सोते हैं, जो खाना ठीक से नहीं खाते, व्यायाम नहीं करते, ज़्यादा धूम्रपान करते हैं, शराब ज़्यादा पीते हैं या ड्रग्स लेते हैं, उनका दिमाग़ डैमेज हो जाता है और ज़्यादा उम्र का दिखने लगता है."
वो कहते हैं कि इसका जेनेटिक कारण भी हो सकता है.
डॉक्टर मनु कहते हैं कि लाइफ़स्टाइल को रखकर दिमाग़ को स्वस्थ और जवां रखा जा सकता है.

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लेकिन ऐसा नहीं है कि हर महिला ये सोच ले कि उसका दिमाग़ स्वस्थ है और उसे चिंता करने की ज़रूरत नहीं.
डॉक्टर मनु के मुताबिक़ ये एक विरोधाभास ही है कि महिलाओं को एल्ज़ाइमर (भूलने की बीमारी) पुरुषों से ज़्यादा होती है.
जैसे कई स्टडी कहती है कि महिलाएं पुरुषों से ज़्यादा जीती हैं, लेकिन उन्हें स्वास्थ्य से जुड़ी ज़्यादा समस्याएं होती हैं. इसे हेल्थ सर्वाइवल पेराडॉक्स कहते हैं.
अंत में डॉक्टर मनु कहते हैं कि ये एक शुरुआती अध्ययन है, इस विषय पर और काम किए जाने की ज़रूरत है.
"हो सकता है कि अमरीका के लोगों के लिए ये अध्ययन कुछ और कहता है और भारत के लोगों के लिए कुछ और कहे."
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