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दुनिया में पहली बार मृत महिला के गर्भाशय से पैदा हुआ बच्चा
- Author, जेम्स गैलहर
- पदनाम, स्वास्थ्य एवं विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
किसी व्यक्ति के मरने के बाद उसके अंगों को ज़िंदा लोगों के शरीर में प्रत्यारोपण किया जाना बेहद आम बात है.
लेकिन दुनिया में ये पहला मामला है जब किसी मृत महिला का गर्भाशय ज़िंदा महिला में प्रत्योरोपित किया गया हो. यही नहीं, इस गर्भाशय को लेने वाली महिला ने एक स्वस्थ बच्ची को भी जन्म दिया है.
ब्राज़ील के साओ पॉलो शहर में साल 2016 में मृत महिला के शरीर से गर्भाशय निकालकर मां बनने वाली महिला के शरीर में प्रत्यारोपित किया गया था.
दस घंटे तक चले प्रत्यारोपण के बाद इस महिला का फ़र्टिलिटी ट्रीटमेंट किया गया.
इससे पहले दुनिया भर में मृत महिलाओं के गर्भाशयों को प्रत्यारोपित करने की कोशिश की गई थी.
लेकिन इन सभी मामलों में ऑपरेशन या तो असफल हुए हैं या महिलाओं का गर्भपात हो गया था.
कैसे सफल हुआ ये ऑपरेशन?
इस मामले में जिस महिला का गर्भाशय लिया गया वो तीन बच्चों की मां थी और उनकी मौत दिमाग़ में ख़ून बहने की वजह से हो गई थी.
वहीं, गर्भाशय पाने वाली महिला मेयर-रोकिटानस्की-होज़र सिंड्रोम पीड़ित थी जो हर साढ़े चार हज़ार महिलाओं में से एक महिला में पाई जाती है.
इस सिंड्रोम की वजह से योनि और गर्भाशय सही ढंग से विकसित नहीं हो पाता है. हालांकि, इस मामले में गर्भाशय पाने वाली महिला का अंडाशय बिलकुल ठीक था.
डॉक्टरों ने मां बनने वाली महिला के शरीर से अंडे डासने से पहले उन्हें पिता बनने वाले व्यक्ति के स्पर्म से फ़र्टिलाइज़ कराया.
इसके बाद महिला को ऐसी दवाइयां दी गईं जिससे उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम हो जाए.
रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होने से वो गर्भाशय के शरीर में ठीक ढंग से व्यवस्थित होने में बाधा खड़ी कर सकता था.
इसके छह हफ़्तों बाद महिला को मासिक धर्म होना शुरू हो गए.
फिर, सात महीनों बाद फ़र्टिलाइज़्ड अंडों को महिला के गर्भाशय में डाला गया.
इसके बाद 15 दिसंबर 2017 को गर्भाशय पाने वाली महिला ने ऑपरेशन के ज़रिए 2.5 किलोग्राम की स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया.
साओ पाओलो के हॉस्पिटल दास क्लीनिक से जुड़े डॉ. दानी एज़ेनबर्ग कहते हैं, "जीवित दानकर्ताओं के गर्भाशय का प्रत्यारोपण मेडिकल क्षेत्र के लिए मील का पत्थर साबित हुआ था. इससे मां बनने में असमर्थ कई महिलाओं को मां बनने में मदद मिलेगी".
"लेकिन जीवित दानकर्ता का मिलना एक बड़ी चुनौती है. ऐसे दानकर्ताओं का मिलना लगभग दुर्लभ होता है जो अपनी और परिवार की इच्छा से दान करने के लिए तैयार हों."
वहीं, लंदन स्थित इंपीरियल कॉलेज से जुड़े डॉ. सरदजान सासो कहते हैं, "इसके नतीजे बहुत ही उत्साहजनक हैं."
"इसके बाद अब संभावित दानकर्ताओं की संख्या बढ़ जाएगी और इसमें ख़र्च भी कम होगा. इसके बाद अब जीवित दानकर्ताओं के गर्भाशय के प्रत्योरोपण में सामने आने वाले जोख़िम से भी बचा जा सकता है."
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