तीन तलाक़ बिल में संशोधन से कौन खुश, कौन नाराज़?

    • Author, भूमिका राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

राज्यसभा में शुक्रवार को तीन तलाक़ बिल को पेश नहीं किया गया और इसे शीतकालीन सत्र तक के लिए टाल दिया गया है.

कैबिनेट ने पिछले साल लोकसभा में पारित बिल में गुरुवार को कुछ संशोधन किए. अगर बिल शीतकलाीन सत्र में राज्यसभा में पारित हो जाएगा तो राष्ट्रपति के पास जाने से पहले इस संशोधित बिल को एक बार फिर लोकसभा में पास कराना होगा और उसके बाद कहीं जाकर ये क़ानून की शक़्ल लेगा.

सुप्रीम कोर्ट पहले ही एक बार में तीन तलाक़ को असंवैधानिक क़रार दे चुका है. गुरुवार को केंद्रीय कैबिनेट ने इस बिल में कुछ संशोधनों को मंज़ूरी दी.

इसके तहत पत्नी को एक बार में तीन तलाक़ देने के दोषी पति को ज़मानत मिल सकने का प्रावधान बिल में जोड़ा जाएगा.

अगर कोई पति किसी महिला को तीन तलाक़ दे देता है, तब पीड़िता या उसके परिवार के लोगों की शिकायत पर ही एफ़आईआर दर्ज होगी.

केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गुरुवार को कैबिनेट की बैठक के बाद कहा,"अगर पति और पत्नी अपने मतभेद सुलझाना चाहते हैं तो कुछ नियम-शर्तों पर मजिस्ट्रेट के पास अपराध माफ़ कर देने का अधिकार होगा."

याचिकाकर्ता का रुख़

देश की सबसे बड़ी अदालत में तीन तलाक़ के मुद्दे को उठाने वाली पांच महिलाओं में से एक आतिया साबरी इस संशोधन से बहुत खुश हैं. वो चाहती हैं कि बिल राज्यसभा में पारित हो जाए और सभी राजनीतिक पार्टियां इस पर एक साथ आगे आएं.

आतिया इस बात से थोड़ा दुखी हैं कि राज्यसभा तक बिल आने में काफ़ी वक़्त लग रहा है लेकिन इस बात से ख़ुश भी हैं कि बिल में जो संशोधन हुए हैं, वो बहुत ज़रूरी थे.

वो कहती हैं, "मैं ख़ुद भुक्तभोगी हूं इसलिए कह सकती हूं कि जो संशोधन किए गए हैं वो ज़रूरी थे. अगर क़ानून बन जाएगा तो नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ लड़ने की हिम्मत भी बढ़ेगी."

"ज़रूरी नहीं है कि तलाक़ के बाद औरत को उसके मायके वाले अपनाएं और उसकी देखभाल करें. ये संशोधन औरतों के हक़ में है."

एक ओर जहां आतिया संशोधन को न्यायसंगत और मुस्लिम महिलाओं के हित में मानती हैं. वहीं, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव ज़फ़रयाब जिलानी मानते हैं कि ये पूरा बिल ही ग़लत है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की राय

वो कहते हैं, "बिल में तीन तलाक़ के बारे में जो कहा गया है वो सुप्रीम कोर्ट के हवाले से बिल्कुल अलग है. सुप्रीम कोर्ट ने एक बार मे शौहर के तीन बार तलाक़ कहने को असंवैधानिक बताया था लेकिन इस बिल में तो कई तरह के तलाक़ आ जाते हैं. ऐसे में तो सही नहीं है."

जिलानी कहते हैं कि हर बार ज़रूरी नहीं होता कि शौहर ही तीन तलाक़ बोले. कई बार ऐसा भी होता है कि पत्नी ही ज़िद्द करके तीन तलाक़ मांगती है. अब ऐसी स्थिति में भी दोषी पति ही हो जाएगा.

वो कहते हैं कि जब तीन तलाक़ ही असंवैधानिक है तो उसके लिए किसी को सज़ा देने का क्या मतलब?

जिलानी का दावा है कि मुस्लिम समुदाय की करोड़ों औरतें इस बिल का विरोध कर रही हैं और महज़ कुछ लाख महिलाओं के कहने से इस तरह का क़ानून बनाया जाना सही नहीं है.

"हमें विपक्ष पर पूरा भरोसा है. जिस तरह उसने पहले स्टैंड लिया था, वैसे ही वो राज्यसभा में भी स्टैंड लेगी. वो ये मांग करेगी कि बिल को सिलेक्ट कमेटी को भेजा जाए और अगर क़ानून बन भी जाता है तो सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े तो खुले ही हैं."

अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम मर्दों के एक बार में तीन तलाक़ कहने की प्रथा को असंवैधानिक क़रार दिया था. फिर चाहे वो ईमेल या टेक्स्ट मैसेज के ज़रिए ही क्यों ना कहा गया हो.

एक ओर जहां कुछ लोग और संस्थाएं बिल का विरोध कर रही हैं. वहीं, इसके पक्ष में केन्द्र सरकार की अपनी दलील है.

सरकार के मुताबिक़, तीन तलाक़ का मुद्दा लिंग न्याय, लिंग समानता और महिला की प्रतिष्ठा, मानवीय धारणा से उठाए हुए मुद्दा हैं, न कि विश्वास और धर्म से जुड़ा मुद्दा है.

मुस्लिम महिला संगठन का पक्ष

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन अध्यक्ष ज़ाकिया सोमन ने भी बिल में संशोधन का स्वागत किया है.

ज़ाकिया कहती हैं, "हमने बिल में संशोधन के लिए यही तीन मुख्य सुझाव दिए थे और हमें बहुत ख़ुशी है कि कैबिनेट ने उस सभी पर ग़ौर किया."

लेकिन मुंबई की मुस्लिम महिला संगठन 'बेबाक़ कलेक्टिव' की हसीना ख़ान अब भी इस बिल का विरोध कर रही हैं.

हसीना कहती हैं कि हमारा सबसे बड़ा मसला ये कि इसे अपराधिक श्रेणी में क्यों डाल रहे हैं.

"सरकार जो बिल ला रही है वो कोर्ट के फ़ैसले के अनुरूप नहीं है. संशोधन में कहा गया है कि सिर्फ़ पीड़िता और परिवार वाले ही एफ़आईआर करा सकते हैं, ऐसे में तो लड़की पर पारिवारिक दबाव भी बनाया जा सकता है."

हसीना कहती हैं कि भले ही सरकार ये कह रही हो कि इस बिल से महिलाओं को अपने अधिकार मिलेंगे लेकिन ऐसा नहीं है. ये बिल पूरी तरह से महिला विरोधी है.

"सरकार को अगर क़ानून लाना ही है तो पहले एक कमिटी बनाई जाए. उसमें मामले के जानकारों से चर्चा-विमर्श किया जाए. सरकार को सोचना चाहिए कि जो औरतें कोर्ट नहीं जा सकतीं, उनका क्या होगा."

हसीना का कहना कि अगर ये क़ानून बन जाएगा तो वो लोग सड़कों पर उतरेंगे और प्रदर्शन करेंगे.

आज केंद्र सरकार राज्य सभा में संशोधित बिल के साथ नहीं पहुंच सकी. हालांकि ये पहला मौक़ा नहीं है. इससे पहले भी सरकार ने राज्यसभा में बिल पेश कराने की कोशिश की थी लेकिन विपक्ष के विरोध की वजह से बिल पास नहीं हो सका.

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