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चभर-चभर खाने वालों से क्यों होती है चिढ़
- Author, जेम्स गालाघर
- पदनाम, बीबीसी के स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता
खाना खाने और सांस लेने की आवाज़ से कुछ लोग ग़ुस्सा क्यों हो जाते हैं. दिमाग़ की स्कैनिंग कर इसका पता लगाया गया है.
इस तरह की आवाज़ों से चिढ़ की इस दशा को मिसोफ़ोनिया कहते हैं. नाखून से ब्लैकबोर्ड रगड़ने की आवाज़ से होनी वाली चिढ़ भी इसी दायरे में आती है.
केंट निवासी 29 साल की ओलना टैंसले हैनकॉक इसी मिसोफ़ोनिया से ग्रस्त हैं. वो कहती हैं कि इसमें उन्हें ख़तरा महसूस होता है.
ब्रितानी वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन कर दिखाया कि कुछ लोगों का दिमाग़ ज़्यादा भावनात्मक प्रतिक्रिया देने लगता है.
ओलना आठ साल की उम्र से ही इस तरह की आवाज़ों के प्रति संवेदनशील हो गईं. उन्हें खाने, सांस लेने और सरसराहट से भी चिढ़ होती है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, ''किसी के तेजी से खाने की वजह से भी मैं परेशान हो जाती हूं. किसी पैकेट की खड़खड़ाहट भी मेरी प्रतिक्रिया के लिए काफी है.''
वो कहती हैं कि यह कोई सामान्य चिढ़ नहीं है. यह कुछ ऐसा है, जिससे मैं भागना चाहती हूं या उसे बंद कर देना चाहती हूं.
उन्होंने बताया कि वो बहुत समय से सिनेमा घर जैसी जगहों पर जाने से बच रही हैं. आधे घंटे की ट्रेन यात्रा में मैं सात-आठ बार डिब्बे में घूमती हूं. उन्होंने बताया कि एक नौकरी मैंने केवल तीन महीने में ही छोड़ दी क्योंकि काम करने से अधिक समय तक रोती रहती थीं.
अध्ययन के दौरान ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने विभिन्न केंद्रों पर 20 मिसोफ़ोनिक और 22 सामान्य लोगों के दिमाग़ को स्कैन किया.
जब ये लोग एमआरआई करने वाली मशीन में थे तो उन्होंने बारिश जैसी प्राकृतिक आवाज़ और चिल्लाने जैसी कई तरह की आवाज़ों पर प्रतिक्रिया दी.
इस अध्ययन के नतीज़े विज्ञान पत्रिका 'करंट बायोलॉजी' में प्रकाशित हुए हैं.
इससे पता चलता है कि दिमाग़ का एक हिस्सा हमारे सेंस को हमारी भावनाओं से जोड़ता है. दिमाग़ में एंटीरियर इंस्यूलर कार्टेक्स नाम का यह हिस्सा मिसोफ़ोनिया में अत्यधिक सक्रिय रहता है.
न्यूकैसल विश्वविद्यालय के डॉक्टर सुखविंदर कुमार ने बीबीसी से कहा, ''जब वो इस तरह की आवाज़ सुनते हैं तो अधिक सक्रिय हो जाते हैं, लेकिन ट्रिगर्ड साउंड पर उनकी प्रतिक्रिया अलग होती है, बाकी की दो आवाज़ों जैसी नहीं.''
उन्होंन बताया कि इस पर होने वाली प्रतिक्रिया अधिकतर ग़ुस्से के रूप में होती है. हालांकि यह सामान्य व्यवहार जैसी ही प्रतिक्रिया होती है, लेकिन बाद में यह तीव्र हो जाती है.
इसका कोई इलाज़ नहीं है. लेकिन ओलना ने इसका सामना करने के लिए इयर प्लग जैसी चीजों का इस्तेमाल करती हैं. वह यह भी जानती हैं कि कैफ़ीन और शराब इस तरह की चीजों को और ख़राब बनाती हैं.
वो कहती हैं, ''मेरा मामला अपेक्षाकृत मध्यम स्तर का है. मैं नौकरी करने में भी सक्षम हूं. लेकिन मैं बहुत से लोगों को जानती हूं जो इसमें सक्षम नहीं हैं. मैं ख़ुद को भाग्यशाली मानती हूं.''
वो कहती हैं, '' मैं अभी यह नहीं जानती हूं कि यह विकार सामान्य तौर पर कितने लोगों में पाया जाता है. यह अभी हाल ही में खोजा गया है और इसके इलाज़ का कोई सही तरीका भी नहीं है.''
अंतत: शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि मिसोफ़ोनियाग्रस्त दिमाग़ में अंतर करने की समझ से इसका इलाज खोजने में मदद मिलेगी.