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'आम लोगों पर बमबारी कर रही है सेना' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तमिल विद्रोही संगठन, एलटीटीई के एक प्रवक्ता ने श्रीलंका सरकार पर मासूम लोगों के नरसंहार का आरोप लगाते हुए सरकार पर बर्बर रवैया अपनाने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि उत्तरी हिस्से में अभी भी तमिल विद्रोहियों का नियंत्रण है और यहाँ श्रीलंका सेना की ओर से बड़ी तादाद में आम लोगों पर बमबारी की जा रही है. बीबीसी से बातचीत करते हुए एलटीटीई प्रवक्ता थिलीपन ने बताया कि सेना की ओर से जारी बमबारी में एक अस्पताल, एक अनाथालय और कई मकान ध्वस्त हो गए हैं और इन हमलों में बड़ी तादाद में आम लोग मारे गए हैं. उन्होंने बताया कि स्थिति इतनी चिंताजनक है कि लोगों को पेड़ों और रेत में बने बंकरों की शरण लेनी पड़ रही है. हालांकि इन आरोपों का खंडन करते हुए श्रीलंका सरकार ने कहा है कि उन्होंने एलटीटीई के नियंत्रण वाले इलाके में उन जगहों को निशाना नहीं बनाया है जहाँ आम नागरिक मौजूद हैं. हज़ारों नागरिक निकले उधर एलटीटीई और सेना के बीच जारी भीषण संघर्ष के दौरान बड़ी तादाद में लोगों का युद्ध प्रभावित इलाकों से पलायन जारी है.
सोमवार को संयुक्त राष्ट्र के हवाले से बताया गया कि श्रीलंका में विद्रोहियों के नियंत्रण वाले क्षेत्र में फँसे 35 हज़ार आम नागरिक बचकर भाग निकले हैं. ऐसा उस समय हुआ जब श्रीलंका के सैनिकों ने घिरे हुए विद्रोहियों को बचाने वाले एक बड़े अवरोध को गिराकर वहाँ नियंत्रण कर लिया. श्रीलंका सेना ने बताया कि आम लोगों को लड़ाई वाली जगह से काफ़ी दूर सुरक्षित शिविरों में ले जाया जा रहा है. इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय राहत संस्था रेड क्रॉस ने भी समुद्र के रास्ते आम लोगों को बाहर निकालने का काम किया है. श्रीलंका सेना ने सोमवार को एक कड़ी चेतावनी जारी करते हुए तमिल विद्रोहियों को हथियार डालने के लिए 24 घंटे का समय दिया है और ऐसा नहीं करने पर सैनिक कार्रवाई करने की चेतावनी दी है. अनुमान है कि इन इलाक़ों में क़रीब एक लाख लोग रह रहे हैं जहां कई महीनों से संघर्ष चल रहा है. रेड क्रॉस पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि संघर्ष वाले इलाक़ों में उनके डॉक्टर बुरी तरह थक चुके हैं और उनके पास दवाइयों का पर्याप्त स्टॉक भी नहीं बचा है. आरोप प्रत्यारोप
दोनों ही पक्ष यानी सेना और एलटीटीई एक दूसरे पर आम नागरिकों को मारने का आरोप लगाते रहे हैं. विदेशी पत्रकारों को संघर्ष वाले क्षेत्र में जाने की अनुमति नहीं दी गई है जिसके कारण इन आरोपों की सच्चाई का पता नहीं चल पा रहा है. सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर उदय नानायक्कारा ने कहा कि सेना ने उस किलेनुमा गतिरोध को तोड़ दिया जो एलटीटीई के आखिरी ठिकानों तक पहुंचने में रोड़ा बना हुआ था. संवाददाताओं का कहना है कि जिस क्षेत्र में यह संघर्ष चल रहा है वहां रह रहे लोगों के लिए जीवन नरक समान हो गया है. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि इन क्षेत्रों में पिछले कई महीनों से लगातार बमबारी हो रही है और एलटीटीई लोगों को वहां से बच निकलने से रोक रही है. सरकार ने रेड क्रॉस को भी कई संघर्षरत क्षेत्रों की ज़मीन पर जाने नहीं दिया है. यही कारण है कि रेड क्रॉस सिर्फ़ समुद्र के रास्ते से ही लोगों को बाहर निकाल पा रही है. | इससे जुड़ी ख़बरें श्रीलंका में फँसे हज़ारों आम तमिल भागे20 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस श्रीलंका में नागरिकों को लेकर चिंता27 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस सौ से अधिक 'तमिल विद्रोही' मारे गए04 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस 'विद्रोहियों का आख़िरी गढ़ ध्वस्त'05 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस श्रीलंका में '60 आम नागरिकों की मौत'09 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस श्रीलंका में अस्थाई संघर्षविराम की घोषणा12 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस 'सेना ने अभियान फिर शुरु किया'15 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस 'श्रीलंका में मेडिकल आपूर्ति की कमी'19 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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