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महमूद मदनी से बीबीसी एक मुलाक़ात | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. बीबीसी एक मुलाक़ात में इस बार मेहमान हैं एक बहुत ही क़ाबिल, नेकदिल, पढ़े-लिखे और सुलझे हुए विचारों वाले मज़हबी और सामाजिक नेता महमूद मदनी. मैंने आपको सुलझा हुआ, नेकदिल, मज़हबी नेता, अच्छा इंसान बताया. आप खुद को किसके सबसे ज़्यादा क़रीब पाते हैं? एक इंसान. इसमें से अच्छा भी हटा दीजिए. इंसान का इंसान हो जाना काफ़ी है, इसके ऊपर की सभी चीजें बनावटी हैं. आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत अच्छी रही है. आप ऐसे परिवार से हैं जिनकी पढ़ाई-लिखाई बहुत ज़बर्दस्त रही. इस पृष्ठभूमि ने आपकी सोच और व्यक्तित्व पर कितना असर डाला है? हालाँकि मेरा व्यक्तित्व इतना बड़ा नहीं है, लेकिन मेरे परिवार के लोगों की सोच मुझे मिली है. यकीनन आज मेरी जो छवि है वो मेरे बुजु़र्गों की रवायतें और उनकी सोच से है. और जब इस परिवेश में बड़े हो रहे थे तो कैसा लगता था? दो बातें थी. मैं अमरोहा में पढ़ता था. उस ज़माने में कुछ विवाद हुआ तो लोग मेरे पिता को गाली देते थे. मुहल्ले के मुसलमान लोग ख़ासतौर से मुझे गालियाँ दिया करते थे. तब दिल में ये बातें आई कि मुझे न तो जमीयत करनी है और न ही राजनीति. मैंने सोचा था कि मैं अपना कारोबार करूँगा. एक और बात थी कि हमने बचपन से जवानी तक अपने पिता को घर में मेहमान की तरह देखा. तो आपने कहा कि बचपन में आपने सोचा था कि न तो जमीयत करनी है और न ही राजनीति, लेकिन अब तो आप इन दोनों में हैं? बात ये है कि जब मैंने दारुल उलूम देवबंद से अपनी तालीम पूरी की तो उसके बाद मैंने लकड़ी का कारोबार शुरू किया. मेरा बिज़नेस बहुत अच्छा चल रहा था. तभी संगठन ने फ़ैसला किया कि मुझे थोड़ा समय संगठन को देना चाहिए. शुरुआती हिचकिचाहट के बाद मैंने कहा कि चलिए महीने में दस दिन मैं संगठन को दूँगा. तो इस तरह मर्जी़ के ख़िलाफ़ मुझे संगठन में फंसना पड़ा. आपके बचपन पर लौटते हैं. ऐसा परिवेश था कि मज़हबी तालीम हासिल करने पर ज़ोर रहा होगा. तो आप कैसे बच्चे थे, गंभीर या बहुत शैतान? बहुत शैतान तो नहीं था, लेकिन पढ़ाई पर कम ध्यान था और घूमने-फिरने का शौक था जो अब तक कायम है. बचपन की कोई मजे़दार घटना? बचपन से ही मेरे साथ ये बात थी कि मैं अगर किसी को तकलीफ़ में देखता था तो मेरी आँखों में पानी भर जाता था. मैं अमरोहा में पढ़ता था और फूफी के पास रहता था. तभी मेरी पिंडलियों में ऐंठन होने लगी. वहाँ डॉक्टरों की समझ में नहीं आया. फिर दिल्ली में डॉक्टर करौली को दिखाया. उन्होंने कहा कि मुझे पोलियो हो गया है, लेकिन वक़्त रहते डॉक्टर के पास जाने से ठीक हो गया. आपके पिता मौलाना असद मदनी साहब स्वतंत्रता सेनानी थे, राजनीति में थे, सांसद रहे. आपके जीवन में उनका कितना असर रहा? सौ फ़ीसदी. मेरी विचारधारा, देश, मुस्लिम कौम के बारे मेरा नज़रिया जो कुछ भी आपको दिखता है उन सभी पर उनका पूरा-पूरा असर है. हालांकि बचपन में वो हमसे दूर रहे, लेकिन उनके आखिरी वर्षों में संगठन में मेरा और उनका साथ रहा, उसने मेरे जीवन को नई दिशा दी. मैं तो ये कहता हूँ कि काश बचपन से ही हमें उनका साथ मिला होता और हमारी पढ़ाई पर उन्होंने ध्यान दिया होता तो मैं पूरे यकीन के साथ कहता हूँ कि हम भाइयों की टक्कर का हिंदुस्तान में कोई स्कॉलर नहीं होता. तो इससे आपने क्या सीखा. आप कैसे पिता हैं?
मुझे बहुत कुछ सीखना चाहिए था, लेकिन मैं भी उनकी ही राह पर चल रहा हूँ. मेरी तीन बेटियाँ और एक बेटा है. मैं भी अपने बच्चों से दूर हूँ. जमीयत का काम ही ऐसा है कि हमें अपने परिवार से दूर रहना पड़ता है. दरअसल, मेरे पिता को देशभर में कई-कई जगह जाना पड़ता था. वो सिर्फ़ रमजा़न का एक महीना ही घर में गुजा़रा करते थे. तो उनके जो समर्थक हैं वो कहते हैं कि वो मुझे मेरे पिता की जगह देखते हैं. इसलिए मिशन और उनके खातिर जाना पड़ता है. आप अपने बेटे से क्या चाहेंगे. वो अपने बच्चों को खुदा के भरोसे छोड़े या फिर आपके रास्ते पर चले? हम ये चाहते हैं कि वो उसी रास्ते पर चले जिस पर हमारे बाप-दादा चले हैं. बात तालीम की चल रही थी. आपने देवबंद से फ़ज़ीलत यानी ग्रेजुएशन की. आपने कभी ये नहीं सोचा कि आप भी लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स या दूसरे मॉडर्न स्कूल-कॉलेजों में पढ़ते. क्या कभी इसका अफ़सोस होता है? अफ़सोस नहीं बल्कि हमें इस बात का गर्व है. हमें गर्व है कि हमने उच्चतम इस्लामिक शिक्षा हासिल की है. रही बात खुली सोच की तो इस्लाम की यही ख़ासियत है. जिसने इस्लाम को सही तरह से समझ लिया तो उसकी सोच तो तंग हो नहीं सकती. जहाँ तक दृष्टिकोण की बात है तो ये मुझे अपने पिता से मिला. हमने देखा कि हमारे पिता अपने देश और मज़हब के बारे में क्या सोचते हैं. तो अगर मेरी तालीम मुख्यधारा की किसी यूनीवर्सिटी में होती तो हमें संगठन में वो खिदमत करने का मौका नहीं मिलता. इसलिए मैं अपने बेटे को भी ऐसी ही तालीम देना चाहता हूँ. हाँ मैं चाहता हूँ कि उसे कुछ हद तक दुनियावी तालीम भी मिले. आपकी शादी 20 साल की उम्र में हो गई थी. आपकी पत्नी का नाम उज़मा मदनी है तो उनसे मुलाक़ात कैसे हुई थी? ये अरेंज मैरिज़ थी. वो मेरे पड़ोस में ही रहती थी. बचपन से ही एक-दूसरे के घरों में आना जाना था. मेरे वालिद मेरा रिश्ता लेकर खुद गए थे. शादी से पहले कभी मन में ये विचार आया था कि उज़मा मदनी से शादी होगी? हाँ बिल्कुल. विचार आया था. दरअसल, मेरे वालिद साहब बहुत खुले दिमाग के व्यक्ति थे. उन्होंने मेरी फूफी से कहा कि महमूद से पूछो कि वो शादी कहाँ करना चाहता है. मैंने फूफी को अपनी पसंद बता दी. हालाँकि परिवार में कुछ लोगों को आपत्ति थी, इस पर मेरे वालिद ने कहा कि ज़िंदगी उसे गुजारनी है तो फ़ैसला भी उसका ही होगा. आपने सक्रिय राजनीति में उतरने के बारे में कब सोचा और क्यों? राजनीति में बहुत लोग खराब हैं लेकिन मुझसे मेरे दोस्तों ने कहा कि अगर खराब खिड़की ही खुली रहेगी तो अच्छी हवा कहाँ से आएगी. दूसरी बात ये थी कि मेरा ये मानना है कि विकासशील देशों में सामाजिक कार्य भी बिना राजनीतिक शक्ति के नहीं किया जा सकता. विकासशील देशों में सबसे बड़ा सामाजिक काम नाइंसाफ़ी को रोकना होता है. तो हमें अहसास हुआ कि जमीयत के बैनर से जु़ल्म के ख़िलाफ़ काम करने के लिए कुछ न कुछ राजनीतिक ताक़त होनी ज़रूरी है. फिर आप सियासत में आए तो काफ़ी चंचल मन के रहे. कभी किसी पार्टी में तो कभी किसी में? बात ये है कि उसूल और ईमान को कभी बदला नहीं जा सकता. अगर हम ईमानदार नहीं हैं तो उसूलों पर कायम नहीं रह सकते. तो या तो हम एक पार्टी में बंधकर रहें और कुछ भी हो जाए पार्टी को न छोड़ें या फिर अपने उसूलों पर कायम रहें. हालाँकि ये भी गलत है कि लोग कपड़ों की तरह पार्टियां बदलते हैं. मैंने समाजवादी पार्टी से राजनीति का सफ़र शुरू किया था. फिर उनका और शरद पवार का गठबंधन हुआ. बगैर पूछे ये क़दम उठा लिया गया. मुझे मजबूरन पार्टी छोड़नी पड़ी. फिर मैं छह साल तक कांग्रेस में रहा. कांग्रेस ने मुझसे कहा था कि असम में ढुबरी से चुनाव लड़ाएँगे, लेकिन बाद में मुकर गए. फिर पाँच साल बाद कह दिया कि असम से नहीं उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ लो. मैं अमरोहा से चुनाव लड़ा, लेकिन मैं सात-आठ हज़ार वोटों से चुनाव हार गया. फिर उन्होंने मुझे राज्यसभा में लिया. रही बात अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल को छोड़ने की तो वो खुद एनडीए में शामिल हो गए और मुझसे भी अलग हो गए. तो क्या इन दिनों आप पार्टी की तलाश में हैं या पार्टियाँ आपकी तलाश में? इत्तेफ़ाक से इन दोनों में से कुछ भी नहीं चल रहा है. न मैं पार्टी की तलाश में हूँ और न ही पार्टियाँ मुझे तलाश रही हैं. ऐसा लगता है कि ये चुनाव यूँ ही निकल जाएगा. वैसे मेरे भाई अमरोहा से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं. आपके पसंदीदा राजनेता?
दो लोगों को मैं काफ़ी पसंद करता हूँ. सोनिया गांधी और डॉ मनमोहन सिंह. हालाँकि सोनिया गांधी से मुझे बहुत शिकायतें हैं, लेकिन देश के बारे में वो जितना सोचती हूँ, वो मुझे बहुत अच्छा लगा. ईमानदारी और गंभीरता के लिहाज़ से मनमोहन सिंह से बहुत प्रभावित हूँ. वैसे और भी बहुत अच्छे लोग हैं. निजी तौर पर मैं मुलायम सिंह को बहुत अच्छा नेता मानता हूँ. बात करते हैं आपके संगठन की. आज़ादी के संघर्ष के दौरान जमीयत की अहम भूमिका रही. जमीयत ने विभाजन का विरोध किया. मैं आपसे पूछूँ आपके संगठन की तीन सबसे बड़ी खूबियाँ और तीन खामियाँ बताएँ तो वो क्या होंगी? बड़ा मुश्किल सवाल है. सबसे बड़ी खूबी ये है कि ये संगठन मुल्क को आज़ाद करने के लिए बनाया गया था. सबसे पहले इसी संगठन ने संपूर्ण आज़ादी का प्रस्ताव पारित किया था. कांग्रेस इसके दस साल बाद ऐसा प्रस्ताव लाने की हिम्मत कर सकी थी. दूसरी खूबी ये कि यही संगठन है जिसने कहा कि आज़ादी की लड़ाई हिंदु-मुसलमान साथ मिलकर लड़ेंगे. तीसरा ये कि संगठन ने पहले दिन से ही ये फ़ैसला किया था कि आज़ाद भारत के निर्माण में भी सभी को एक साथ रखा जाना चाहिए. रही बात खामियों की तो मूल रूप से ये मुस्लिम संगठन है. इसमें उलेमाओं का दखल है. हालाँकि इससे मुझे कुछ परेशानी नहीं होती. लेकिन मैं ये महसूस करता हूँ कि हमें लोगों से और ख़ासतौर पर उर्दू मीडिया से जो समर्थन मिलना चाहिए था वो नहीं मिला. मुस्लिमों को भावुक कौम बना दिया गया. इसमें संदेह नहीं कि कुछ ज़्यादतियाँ तो हुई हैं, लेकिन क्या आप भी मानते हैं कि मुसलमानों को अलग-थलग रखने के लिए उर्दू मीडिया भी ज़िम्मेदार है? देखिए, कोई भी कौम जब तक पुरउम्मीद है तब तक उसमें आगे बढ़ने का हौसला होता है, लेकिन अगर कौम मायूस हो जाए तो उसमें प्रगति का जज्बा खत्म हो जाता है. जमीयत समेत तमाम संगठनों ने मुसलमानों को मायूस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. मेरा मानना है कि छोटे मुद्दों की बजाय बड़े मसलों पर ध्यान देना चाहिए. ख़ासकर शिक्षा और वो भी लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान देने की ज़रूरत है. गुजरात के भूकंप के दौरान आपके संगठन ने जिस तरह का काम किया, उससे संगठन को पहचान भी मिली. तो ये विचार कैसे आया? जब गुजरात में भूकंप आया तो उस वक़्त मैं देहरादून में था. मैं देवबंद आया और वालिद साहब से कहा कि गुजरात जाना चाहिए. फिर हम भुज गए. मैं चार महीने भुज में रहा और काम किया. मुझे वहाँ काम करने से जो तसल्ली मिली वो दूसरे किसी काम में नहीं मिला है. अब तक हम सिर्फ़ कहते थे कि स्कूल बनाएँगे, लेकिन तब हमने स्कूल बनाए और बना रहे हैं. आपने शुरू में कहा था कि आपसे किसी का दर्द देखा नहीं जाता, तो भूकंप के बाद तो आपने बहुत पीड़ा देखी होगी? वहाँ के हालात देखने के बाद ही तो मैंने वहाँ रुकने का फ़ैसला किया. वहाँ तकरीबन तीन हफ़्ते तक हमने ऐसा खाना खाया कि रोटी में रेत होती थी. मुझे मुँह खोलकर सोने की आदत है. एक दिन रात में मैं टैंट में सोया था तो लगा कि गर्म-गर्म सांसे आ रही हैं, जब आँख खुली तो देखा कि एक कुत्ता मेरा मुँह चाट रहा था. भूकंप प्रभावित क्षेत्र की कोई यादगार घटना? हाँ. भुज में एक ही जामा मस्जिद बची थी. मैं वहाँ नमाज पढ़ने गया. नमाज पढ़ने के बाद जब बाहर आया तो एक बुजु़र्ग से मुलाक़ात हुई. उनका अच्छा बड़ा कारोबार था. भूकंप ने उनका सब कुछ छीन लिया था, बीवी-बच्चे, घर परिवार सब खत्म हो गया था, लेकिन उनके चेहरे पर मुस्कराहट थी. उनका जीवट देखकर मुझे बहुत हौसला मिला. बस बुजु़र्ग ने इतना भर कहा, ‘खुदा की मर्जी़’. आपने दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ अभियान चलाया है. आपकी पहल पर देवबंद ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ फतवा जारी किया है. जमीयत के लिए क्या ये भी टर्निंग प्वाइंट बन रहा है? बिल्कुल बन गया है. इस्लाम और मुसलमान बिल्कुल अलग-अलग चीजें हैं. मुसलमान कह रहे हैं कि न तो वो आतंकवादी हैं और न वो आतंकवाद फैला रहे हैं. ये बिल्कुल सही बात है कि मुसलमान आतंकवादी नहीं हो सकता, लेकिन आतंकवाद इस्लाम के खाते में जा रहा है. तो इस्लाम को बदनाम होने से बचाने के लिए हम इसका विरोध करें. भारत के लिए आज आतंकवाद सबसे बड़ी चिंता है. आतंकवाद के ख़िलाफ़ मुसलमान बहुत सक्रिय नहीं हैं. हमने ये महसूस किया है कि इस देश में ऐसे लोग बहुमत में हैं जो सही बात सुनने के लिए तैयार हैं. आज की तारीख में मुझे लगता है कि आतंकवाद से मुसलमान को अब तक जो नुक़सान हुआ है, हम आतंकवाद की मुख़ालफ़त कर मुसलमानों को उनके इंसानी हुकूक दिलाने में भी कामयाब रहेंगे. एक तरफ आप इस तरह की साफ़गोई की बातें करते हैं, दूसरी तरफ आपका पहनावा, दाढ़ी, मौलवी वाली टोपी. तो ये विरोधाभास नहीं है?
नहीं, ये विरोधाभास नहीं है. अगर ये नहीं होते तो मेरे ये विचार भी नहीं होते. देश का विभाजन हुआ तो देश का विभाजन करने वाला नेता मदरसे में पढ़ा-लिखा, टोपी, पगड़ी पहनने वाला नहीं बल्कि सूट-बूट पहनने वाला जाना-माना वकील था. मेरा मानना है कि पहनावे को सोच से जोड़कर देखा जाने लगा है. एयरपोर्ट पर मुझे देखकर एक छोटा बच्चा बोलता है देखो बिन लादेन जा रहा है. दुर्भाग्य से ऐसा हो रहा है. आपने पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से तक़रीर की थी कि हमें आपकी सहानुभूति की ज़रूरत नहीं है. लेकिन आपके दिमाग में ये बात भी तो आई होगी कि उनकी बात कुछ हद तक सही है? बेशक, उनकी बात काफ़ी हद तक सही है, लेकिन सवाल ये है कि आप हमारी ओर से लड़ने वाले कौन होते हैं. हमें ये विश्वास है कि इस मुल्क में बसने वाले अधिकतर लोग मुसलमानों के जायज़ मसलों पर हमारे साथ थे, हैं और आगे भी रहेंगे. हम जमीयत की बात कर रहे थे. आपके वालिद और दादा बहुत सक्रिय रहे और अब आप. लेकिन क्या जमीयत में सिर्फ़ पारिवारिक नेतृत्व ही रहेगा? नहीं. अब तो प्रेसीडेंट मौलाना कारी मोहम्मद उस्मान साहब हैं. जनरल सेक्रेटरी मौलाना हकीमुद्दीन साहब हैं. ये दोनों हमारे परिवार से बाहर के हैं. मैं सिर्फ़ वर्किंग कमेटी का मेंबर हूँ. लेकिन क्या ये सही होगा कि क्योंकि मैं उस परिवार में पैदा हुआ इसलिए वर्किंग कमेटी का मेंबर भी नहीं रह सकता. आप कहते रहे हैं कि आपको मुसलमानों को अल्पसंख्यक कहने पर आपत्ति है? बिल्कुल. मुसलमानों की इस देश में दूसरी सबसे अधिक आबादी है. मुसलमान इस देश का भागीदार है, हिस्सेदार है. न तो मुसलमानों को खुद को छोटा समझना चाहिए और न ही दूसरों को मुसलमानों को छोटा दिखाने की कोशिश करनी चाहिए. मुसलमानों में मौलाना आज़ाद के कद का राष्ट्रीय नेता क्यों नहीं पैदा हो रहा है? बहुत मुश्किल सवाल है और इसका जवाब बहुत कड़वा होगा. इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि जो मुसलमानों में बड़ा नेता हो सकता है, राजनीतिक दलों ने साजि़श के तहत उसकी अनदेखी की है और तोड़ा है. आज राजनीतिक दलों में जितने भी मुसलमान नेता हैं वो सिर्फ़ राजनीतिक पार्टियों के मुस्लिम नेता हैं मुसलमानों के नेता नहीं. तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने मुसलमानों के साथ नाइंसाफी की है. इंसाफ़ किए बग़ैर उनका वोट लेने के लिए इन पार्टियों ने दंगे-फसाद कराए हैं और फिर बचाने के नाम पर उनकी सहानुभूति हासिल की है. मेरे ख़्याल में मुसलमानों को इस चुनाव में किसी की दुश्मनी की बुनियाद पर किसी और को समर्थन नहीं करना चाहिए. चाहे कांग्रेस हो, बसपा हो या सपा हो जो भी पसंद हो उसे वोट देना चाहिए. किसी को हराने के लिए वोट देना बंद होना चाहिए. अब कुछ हल्की-फुल्की बातें. आपने कहा था कि आपको घूमने-फिरने का शौक है. आपकी पसंदीदा जगह? पहाड़ों में पानी के किनारे और जंगल. मुझे प्रकृति से बहुत प्यार है. मुझे पेड़ बहुत पसंद हैं. कभी जब मैं बहुत परेशान होता हूँ तो अपने लगाए किसी पेड़ के पास खड़ा हो जाता हूँ. उस पर हाथ फेरता हूँ. मेरे दिल को बहुत सुकून मिलता है. मन बहलाने के लिए क्या करते हैं? इंटरनेट पर प्रमुख अखबारों की वेबसाइट सर्च करता हूँ. इस्लाम के बारे में, पेड़-पौधों के बारे में जानकारी हासिल करता हूँ. इसके अलावा जब हम मुराकबा करते हैं उससे मुझे बहुत ऊर्जा मिलती है. आपके पसंदीदा शायर? मुझे कलीम आज़िज की ग़जल बहुत पसंद है. उनकी गजलें, ‘मुक़द्दर में अगर बदनाम ही होना है हो लेंगे, जो आए जिसके जी में बोल ले हम कुछ न बोलेंगे’, और ‘जरा तल्खियों का मजा़ ले तो जानें..’ मुझे बहुत पसंद हैं. |
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