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रविवार, 15 मार्च, 2009 को 08:33 GMT तक के समाचार
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कश्मीरी गूजरों की दिलचस्पी राजस्थान में

क़मर रब्बानी चेची
क़मर रब्बानी चेची कश्मीरी गूजर नेता हैं
भारत प्रशासित कश्मीर और राजस्थान में फा़सला तो बहुत है, लेकिन बिरादरी के रिश्ते ने ये दूरियां कम की हैं.

इसीलिए जम्मू कश्मीर के गूजर नेता क़मर रब्बानी चेची राजस्थान के दौसा को लोक सभा के लिए अपने लिए उपयुक्त सीट मान रहे हैं और लोगों से संपर्क कर रहे हैं.

वे कहते हैं, " गूजर चाहे कहीं के भी हों, वो एक हैं. इसमे कोई धर्म या देश की बात नही है."

क़मर रब्बानी चेची को लगता है कि वो आदिवासी वर्ग के लिए सुरक्षित दौसा सीट से चुनाव जीत जाएंगे.

 क़मर रब्बानी चेची के लिए स्थानीए गूजरों का रुख़ सकारात्मक है. वो हमारे भाई ही हैं
गूजर नेता डॉ रूप सिंह

दौसा हाल तक सामान्य सीट थी. यहाँ से कांग्रेस के सचिन पायलट सांसद थे, लेकिन परिसीमन के बाद दौसा जनजाति वर्ग के लिए सुरक्षित हो गई है.

ख़ुद सचिन पायलट गूजर हैं, मगर अब कोई नई सीट तलाश रहे हैं.

दूसरी ओर राजौरी के क़मर रब्बानी चेची अब तक अनेक गाँवों में संपर्क कर लोगों से समर्थन मांग चुके हैं.

क़मर रब्बानी कहते हैं," मुझे ज़बर्दस्त समर्थन मिल रहा है."

लेकिन राजस्थान का आदिवासी मीना समाज इसे स्वीकार करने को तैयार नही है.

विरोध

जनजाति आरक्षण बचाओ संगठन के संयोजक श्रीनारायण कैमला ने बीबीसी से कहा, " ये कदापि स्वीकार नही होगा. हम विरोध करेंगे. जम्मू और कश्मीर के गूजरों को ख़ाली वहीं के लिए आरक्षण मिला है."

क़मर रब्बानी कहते हैं, " भारत के जनप्रतिनिधित्व क़ानून के मुताबिक़ कश्मीर का गूजर असम को छोड़कर पूरे भारत में कहीं भी चुनाव लड़ सकता है."

दौसा सीट के आरक्षित होने के बाद केंद्रीय मंत्री नमोनारायण मीणा और राज्य के एक और पूर्व मंत्री किरोडी़ लाल मीणा इस सीट पर नज़र लगाए हुए हैं.

गूजर नेता डॉ रूप सिंह कहते है, " क़मर रब्बानी चेची के लिए स्थानीए गूजरों का रुख़ सकारात्मक है. वो हमारे भाई ही हैं."

समानता

कश्मीर के गूजर नेता मानते हैं कि राजस्थान के गूजरों और कश्मीर के गूजरों में बहुत समानता है.

 गूजर कभी राजस्थान से ही कश्मीर और दूसरी जगह पहुंचे थे. गूजर बेशक आज कई धर्मों और देशों में बसते हैं. मगर वो सभी राजस्थान के साथ अपना भावनात्मक रिश्ता मानते हैं
मसूद चौधरी, गूजर इतिहास के जानकार

भारत प्रशासित कश्मीर में एक विश्वविद्यालय के कुलपति और गूजर इतिहास के जानकार मसूद चौधरी कहते हैं, " गूजर कभी राजस्थान से ही कश्मीर और दूसरी जगह पहुंचे थे. गूजर बेशक आज कई धर्मों और देशों में बसते हैं. मगर वो सभी राजस्थान के साथ अपना भावनात्मक रिश्ता मानते हैं."

मसूद चौधरी राज्य में हुए गूजर आंदोलन के दौरान सरकार और अपनी गूजर बिरादरी के बीच मध्यस्थ थे.

वो कहते हैं, " कश्मीर में गूजर गोजरी ज़ुबान बोलते हैं. ये राजस्थानी के बहुत क़रीब है. वैसे गोजरी बहुत समृद्ध भाषा है, ये हिन्दी और उर्दू के समान भी है."

मसूद चौधरी कहते हैं, " राजस्थान के गूजरों और कश्मीर के गूजरों के गोत्र भी एक जैसे ही हैं. यहाँ खताना और भड़ाना हैं तो कश्मीर में भी हैं. राजस्थान गूजरों का पुराना घर है. फिर कश्मीर में गूजरों ने जब आरक्षण के लिए आंदोलन किया तो राजस्थान के गूजरों ने हमारा साथ दिया."

वो कहते हैं, "राजस्थान में कभी गुजरात से लगता भीनमाल गूजरों की समृद्ध रियासत रहा है. हालाँकि अब वहां न तो गूजर हैं और ना ही वो गुज़रे दौर की समृद्धि है. हाल के वर्षों में भारत की सियासत में मज़हब बड़ी चीज़ थी मगर अब जात की दीवार उससे भी ऊँची हो गई है."

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