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'पाक के साथ शांति प्रक्रिया ख़तरे में' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि पाकिस्तानी ज़मीन पर चरमपंथियों की सक्रियता न रोक पाने की वजह से भारत के साथ चल रही शांति प्रक्रिया 'ख़तरे में' है. उन्होंने कहा कि चार-पाँच सालों में दोनों देशों के बीच चल रही शांति प्रक्रिया में काफ़ी प्रगति हुई थी लेकिन अब यह रुक गई है और इस समय दोनों देशों के बीच बैठक का कोई प्रस्ताव नहीं है. दुबई के 'ख़लीज-टाइम्स' को दिए एक साक्षात्कार में प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि अब दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार इस बात पर निर्भर करता है कि पाकिस्तान अपने देश में मौजूद 'आतंकवादी संगठनों के ख़िलाफ़' किस तरह कार्रवाई करता है. उल्लेखनीय है कि पिछले साल मुंबई में हुए चरमपंथी हमलों के बाद से भारत-पाकिस्तान के बीच चल रही शांति प्रक्रिया रुक गई है. भारत का कहना है कि उसके पास इस बात से पर्याप्त सबूत हैं कि इस हमले में पाकिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल किया गया और पाकिस्तान को दोषी लोगों पर ठोस कार्रवाई करनी चाहिए. लेकिन पाकिस्तान ने अभी सबूत के तौर पर दिए गए भारत के दस्तावेज़ पर अपना नज़रिया स्पष्ट नहीं किया है और इन दस्तावेज़ों के जबाव में एक नई प्रश्नावली भेजी है. 'वादाख़िलाफ़ी' अख़बार के अनुसार एक सवाल के जवाब में प्रणब मुखर्जी ने कहा कि पाकिस्तान ने छह जनवरी 2004 और 24 सितंबर 2008 में हुई दो उच्चस्तरीय बैठकों में आश्वासन दिया था कि वह अपनी ज़मीन से किसी भी तरह की कोई 'आतंकवादी गतिविधि' संचालित नहीं होने देगा. उन्होंने कहा, "ज़ाहिर है कि पाकिस्तान अपनी बात पर क़ायम नहीं रहा." विदेश मंत्री का कहना था, "चार या पाँच सालों में दोनों देशों के रिश्ते सामान्य करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई." उनका कहना था, "भविष्य में हमारे द्विपक्षीय रिश्ते पाकिस्तान की की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है और वह सिर्फ़ बातों में न हो ठोस कार्रवाई भी हो." एक और सवाल के जवाब में प्रणब मुखर्जी ने काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर हुए हमले का ज़िक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने भारत के प्रधानमंत्री से इस मामले की निष्पक्ष जाँच करवाने की बात कही थी लेकिन हुआ कुछ नहीं. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने प्रतिबंधित चरमपंथी गुटों को न सिर्फ़ बर्दाश्त किया बल्कि उन्हें फलने-फूलने का भी भरपूर मौक़ा दिया और अब एक और प्रतिबंधित गुट से सरकार ने समझौता कर लिया है. उन्होंने इस आरोप का खंडन किया कि भारत ने अपनी विदेश नीति अमरीकी हाथों में सौंप दी है. उनका कहना था कि भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है और वह राष्ट्रहित से ही संचालित होती है. | इससे जुड़ी ख़बरें मुंबई हमलों के मामले में आरोप पत्र25 फ़रवरी, 2009 | भारत और पड़ोस 'कूटनीति ने पाक को मजबूर किया'23 फ़रवरी, 2009 | भारत और पड़ोस कसाब को पाकिस्तान के सुपुर्द करें: क़ुरैशी17 फ़रवरी, 2009 | भारत और पड़ोस 'पाकिस्तान में भी रची गई थी साज़िश'12 फ़रवरी, 2009 | भारत और पड़ोस 'पाकिस्तान पर्याप्त क़दम नहीं उठा रहा है'11 फ़रवरी, 2009 | भारत और पड़ोस 'पाकिस्तान मीडिया का सहारा न ले'10 फ़रवरी, 2009 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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