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श्रीलंका में प्रमुख संपादक की हत्या | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका में अक्सर सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले एक प्रमुख संपादक की अज्ञात लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी है. पुलिस का कहना है कि 'संडे लीडर' के संपादक लासांता विक्रमतुंगा को मोटरसाइकिल पर सवार अज्ञात लोगों ने उस समय गोली मारी जब वे कार्यालय की ओर आ रहे थे. डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की कोशिशों में तीन घंटे ऑपरेशन किया लेकिन उन्हें नहीं बचाया जा सका. उनका कहना है कि सिर पर लगे ज़ख़्मों की वजह से उनकी मौत हुई. संवाददाताओं का कहना है कि विक्रमतुंगा और सरकार के बीच कई विषयों पर गंभीर मतभेद थे. श्रीलंका में इस हफ़्ते यह दूसरा बड़ा हमला है. मंगलवार को बंदूक और हथगोलों से लैस हमलावरों ने देश के सबसे बड़े टेलीविज़न चैनल के कार्यालय पर हमला किया था. श्रीलंका में पिछले दिनों में मीडियाकर्मियों पर कई हमले हुई हैं और मीडिया की स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि श्रीलंका दुनिया के उन देशों में से एक है जहाँ ख़बरें एकत्रित करने के लिए काम करना सबसे कठिन है. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पिछले नवंबर में कहा था कि वर्ष 2006 से तब तक वहाँ कम से कम 10 मीडिया कर्मियों की हत्या कर दी गई थी. कोलंबों में बीबीसी संवाददाता रोनाल्ड बर्क का कहना है कि सरकार पर आरोप लगता रहा है कि वह मीडियाकर्मियों पर तमिल विद्रोहियों के शुभचिंतक और सरकार विरोधी होने का आरोप लगाकर वह हिंसा को बढ़ावा देती रही है. हमला टेलीविज़न पर जो तस्वीरें दिखाई गईं उसमें संपादक विक्रमतुंगा की कार के शीशे पर गोलियों के निशान दिख रहे थे और ख़ून दिखाई पड़ रहा था.
पुलिस के प्रवक्ता रंजीत गुणशेखर का कहना है कि बंदूकधारी दो मोटरसाइकिलों पर आए थे और हमले के बाद भाग गए. इस संबंध में अब तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हो सकी है. राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपक्षे ने एक बयान में संपादक की हत्या पर संवेदना व्यक्त की है और पुलिस को इस मामले की जाँच करने के निर्देश दिए हैं. 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर' संस्था ने अपने बयान में कहा है, "श्रीलंका ने सबसे प्रतिभाशाली और बहादुर पत्रकारों में से एक को खो दिया है." संस्था ने कहा है, "उनकी मौत के लिए राष्ट्रपति राजपक्षे, उनके सहयोगी और सरकारी मीडिया प्रत्यक्ष रुप से ज़िम्मेदार है जिसने उनके (संपादक के) ख़िलाफ़ वातावरण तैयार किया और मीडिया के ख़िलाफ़ हिंसा की अनुमति दी." 52 वर्षीय विक्रमतुंगा सरकारी की नीतियों और तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ लड़ाई के बड़े आलोचक थे. उन्हें कई बार जान से मारने की धमकी मिली और कई बार उनकी ख़बरों के विवादित होने के कारण उन्हें हिरासत में लिया गया. अपने आख़िरी संपादकीय में उन्होंने राष्ट्रपति पर आरोप लगाए थे कि वे सत्ता में बने रहने के लिए युद्ध को जारी रखे हुए हैं. वे विपक्षी दलों की ख़ामोशी की वजह से उनकी भी आलोचना करते रहे. | इससे जुड़ी ख़बरें 'श्रीलंका के 53 सैनिकों' को मारने का दावा05 जनवरी, 2009 | भारत और पड़ोस श्रीलंका सेनाएं जाफ़ना के पास पहुंची05 जनवरी, 2009 | भारत और पड़ोस दस साल बाद श्रीलंकाई सेना किलीनोची में02 जनवरी, 2009 | भारत और पड़ोस श्रीलंकाई सेना को उत्तर में 'सफलता' 01 जनवरी, 2009 | भारत और पड़ोस एलटीटीई के गढ़ में घुसी सेना16 नवंबर, 2008 | भारत और पड़ोस श्रीलंका में 'पत्रकारों के लिए ख़तरा बढ़ा'07 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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