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मध्यप्रदेश में चुनाव प्रचार थमा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वोट के लिए मध्यप्रदेश में दर-दर घूम रहे नेताओं की सभाएँ, रैलियाँ ख़त्म हो गईं और गाँव-शहर में राजनीतिक दलों और नेताओं का बखान करते भोंपू मंगलवार को सूरज डूबने के साथ ही शांत हो गए. नियमानुसार मतदान शुरु होने से अड़तालीस घंटे पहले चुनाव प्रचार थम गया और अब नेताओं का घर-घर दस्तक देने का सिलसिला शुरु हो गया है. मध्यप्रदेश विधानसभा की 230 सीटों के लिए गुरुवार, 27 नवंबर को मतदान होना है. इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी शिवराज सिंह चौहान के कामकाज के आधार पर फिर से सरकार बनाने की कोशिश कर रही है वहीं कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है. वहीं मायावती की बहुजन समाज पार्टी और उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी दोनों पार्टियों के चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने में लगी हुई हैं. 230 सीटों के लिए 3,180 उम्मीदवार मैदान में हैं. तीन करोड़ 63 लाख मतदाता इन उम्मीदवारों के राजनीतिक भविष्य का फ़ैसला करेंगे. आरोप-प्रत्यारोप भारतीय जनता पार्टी की ओर से अंतिम दिन चुनावी सभाओं को संबोधित किया पार्टी के पूर्व अध्यक्ष वैंकया नायडू, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने.
आतंकवाद और मालेगाँव बम विस्फोट के मामले के अलावा उन्होनें कांग्रेस को 125 साल पुरानी ऐसी पार्टी बताया विकास जिसके बस की बात नहीं. कांग्रेस ने सोमवार को सोनिया गाँधी और मंगलवार को राहुल गाँधी की सभाएँ करवाकर अपने प्रचार का ज़ोरदार समापन करने की कोशिश की. अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण के वादे का हवाला देते हुए राहुल गाँधी ने कहा की बीजेपी सिर्फ़ वायदे करके उसे भूल जाना जानती है. उन्होंने कहा, "अब भाजपा आतंकवाद का मुद्दा उठा रही है और विकास की जगह उसकी बात ऐसे कर रही हो जैसे आतंकवाद बेहतर बिजली, सड़क और पानी मुहैया कराने के रास्ते में रोड़ा हो." हालाँकि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बार बार दोहराते रहे हैं कि विकास के अलावा चुनाव का कोई और मुद्दा नहीं है, और पार्टी का मुख्य नारा भी रहा, 'हमारा प्रयास निरंतर विकास' और 'कांग्रेस के पचास भाजपा के पाँच'. मगर पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से लेकर नरेन्द्र सिंह तोमर तक ने बार-बार चरमपंथ और ख़ासतौर पर मालेगाँव बम विस्फोट मामले में हिंदुत्ववादी संगठनों के कुछ कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का मामला उठाया. वोटरों के एक वर्ग में इन मुद्दों का असर तो है लेकिन जनता खुलकर भाजपा के विधायकों और स्थानीय नेताओं और संगठनों से जुड़े लोगों के कथित भ्रष्टाचार की बात कर रही है. मगर लगभग तीन साल पहले विरोधों के बीच मुख्यमंत्री बनाये गए शिवराज सिंह चौहान के ख़िलाफ़ जनता में कोई रोष नहीं है. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान जहाँ शिवराज सिंह की सभाओं में भीड़ जुटी वहीँ नरेन्द्र मोदी के अलावा सभी बड़े नेताओं की रैलियाँ खाली रहीं, जिससे 'पाँव पाँव वाले भैया' कहे जाने वाले शिवराज सिंह चौहान का पार्टी में कद ज़रूर बढ़ा है. शायद भाजपा ने इसीलिए उन्हें अपने चुनाव अभियान का केन्द्र बिंदु बनाया. मगर जनता जो अक्सर स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों के हिसाब से वोट देती है, मुख्यमंत्री और स्थानीय नेताओं वाले विरोधाभास में से किसे अहमियत देगी यह तो आठ दिसम्बर को ही तय होगा जब मतगणना होगी.
कांग्रेस ग़रीबों को एक बिजली कनेक्शन मुफ्त, विवादित बिजली बिलों की माफ़ी, सस्ता ऋण जैसे वायदे करके लाभ उठाना चाहती है. कांग्रेस ने मगर इस दौरान अपना चुनाव प्रचार अभियान थोड़ा मद्धम रखा, साथ ही साथ बड़े नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्र में ज़्यादा समय बिताया या फिर उन उम्मीदवारों के प्रचार में जिनके टिकटों की सिफारिश उन्होनें की थी. भाजपा को कहीं कहीं अपनी आक्रामकता का नुक़सान भी हुआ. प्रशासन ने क्रिकेटर और सांसद नवजोत सिंह सिद्धू को 'गौ-मांस' से जुड़े उनके बयान के कारण नोटिस थमा दिया. समाजवादी पार्टी और उमा भारती पर वोटरों को नोट बांटे का आरोप भी लगाया गया और भाजपा सरकार के एक मंत्री ने निर्वाचन अधिकारी से बदसलूकी करने के चलते जेल की हवा खाई. मायावती और उमाभारती कांग्रेस का मुक़ाबला भाजपा के अलावा उत्तर प्रदेश में सवर्ण-दलित वोटरों का 'सोशल इंजीनियरिंग' कर चुकी और मध्यप्रदेश में वही फार्मूला अपना रही बहुजन समाज पार्टी से भी है. बीएसपी ने इस बार राज्य की सभी 230 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और उत्तर प्रदेश से सटे विंध्य और ग्वालियर-चम्बल में कई जगह बसपा और कांग्रेस आमने सामने हैं जिसका फ़ायदा किसी अन्य दल को मिलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.
जो बसपा कांग्रेस के लिए कर रही है लगभग वही स्थति है भारतीय जनशक्ति की भाजपा के लिए है. कभी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में गिनी जाने वाली उमा भारती जिन्होनें 207 प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं अपनी पुरानी पार्टी को ध्वस्त करने की वचनबद्धता जताती रही हैं और बयान दिया है कि अगर भाजपा ने सरकार बना ली तो वह संन्यास लेकर केदारनाथ चली जाएँगीं. मालेगाँव विस्फोट का मामला सबसे पहले उठाकर और उस पर शुरुआत में भाजपा की खामोशी का मामला उठाकर उन्होनें ख़ुद को सबसे बड़े हिंदुत्व के हितैषी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है. साथ ही उन्होनें अपने लोधी समुदाय के अलावा अन्य पिछड़ी जातियों के लोगों को टिकट देकर उन्हें भी साथ मिलाने की रणनीति पर काम किया है. इन मुख्य दलों के अलावा कई अन्य दल और क्षेत्रीय पार्टियाँ - मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, लोक जनशक्ति और अब कई हिस्सों में बंट चुकी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी आदि भी मैदान में हैं जिससे बहुत सारी सीटों पर मुकाबला बहुकोणीय हो गया है. |
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