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सोमवार, 17 नवंबर, 2008 को 13:55 GMT तक के समाचार
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सोने के दाम समोसे

घोड़ा
बिहार के सोनपुर में हर वर्ष विख्यात पशु मेला लगता है
बिहार के सोनपुर में लगने वाले पशु मेले में अगर घोड़े की क़ीमत तीन लाख रुपए तक है तो यहाँ बिकने वाले समोसों की क़ीमत भी अपने आप में एक रिकार्ड है.

मेले में इस बार एक डच पर्यटक जोड़े ने चार समोसे ख़रीद कर ख़ूब चाव से खाए और जब पैसे देने की बात आई तो दुकानदार ने उन्हें क़ीमत बताई दस हज़ार रुपये. यानी, ढाई हज़ार का एक समोसा.

काफ़ी हीलहुज्जत के बाद पैसे तो अदा हो गए लेकिन पर्यटकों ने इसकी सूचना पुलिस को दे दी.

उसके बाद न सिर्फ़ उस दुकानदार को मेले से बाहर कर दिया गया, बल्कि पुलिस ने 10 रुपए कटवा कर 9990 रुपये पर्यटकों को वापस भी करवा दिए.

दुनिया भर में विख्यात सोनपुर का हरिहरक्षेत्र पशु मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता है और यहाँ अनेक देशों के लोग घूमने आते हैं.

कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होने वाले इस वार्षिक मेले में विदेश से भी लोग आते हैं.

 हमने लकड़ी के बने कुछ ख़ूबसूरत बर्तन ख़रीदे और उसकी जो क़ीमत हमने चुकाई वह सामान्य से कई गुना ज़्यादा है पर हमारे लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं था
मेले में आए एक सैलानी

मेले के विशेष पुलिस अधिकारी आलोकित कुमार कहते हैं, "कुछ स्थानीय दुकानदार विदेशी पर्यटकों को ठगने की कोशिश करते हैं लेकिन हम ऐसे लोगों पर कड़ी नज़र रखते हैं. हमारी कोशिशों के चलते ही विदेशी पर्यटक ठगने से बच गए."

आलोकित का कहना था, "वह हलवाई किसी और को न ठगे इसलिए हमने उसे मेला से बाहर कर दिया है."

ऐसा नहीं है कि इस मेले में बिकने वाली चीज़ों की क़ीमत ठगी में लगे लोग ही महँगी करते हैं.

समोसा
मेले में खानेपीने की चीज़ों की ख़ूब बिक्री होती है

शान का प्रदर्शन

कई बार ख़रीददार अपनी शान का प्रदर्शन करने के लिए भी मुँहमांगी क़ीमत अदा करते हैं.

क़रीब दो वर्ष पहले रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव के घोड़े 'चेतक' को ख़रीदने के लिए बोली लगी और वह एक लाख एक हज़ार रुपए में बिका.

इस वर्ष एक विक्रेता ने अपनी एक घोड़ी क़ीमत तीन लाख तय की है तो वैशाली के कौशल किशोर सिंह के घोड़े की बोली एक लाख सत्तर हज़ार रुपए लग रही है.

 कुछ स्थानीय दुकानदार विदेशी पर्यटकों को ठगने की कोशिश करते हैं लेकिन हम ऐसे लोगों पर कड़ी नज़र रखते हैं. हमारी कोशिशों के चलते ही विदेशी पर्यटक ठगने से बच गए
आलोकित कुमार, पुलिस अधिकारी

नेपाल के एक सैलानी मुकेश थापा कहते हैं, "हमने लकड़ी के बने कुछ ख़ूबसूरत बर्तन ख़रीदे और उसकी जो क़ीमत हमने चुकाई वह सामान्य से कई गुना ज़्यादा है पर हमारे लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं था."

मेले की भीड़-भाड़ में अपनी दुकान सजाए अमित कुमार कहते हैं, "मेले में बिकने वाली चीज़ों की क़ीमत अगर सामान्य हो तो ख़रीददार के लिए इसमें कोई ख़ास आकर्षण नहीं होता और दूसरी बात यह है कि हमारी भी कोशिश होती है कि हम कुछ अधिक कमा सकें लेकिन अगर चीज़ों के दाम बिल्कुल असमान्य हों तो यह किसी भी तरह अच्छी बात नहीं है."

गंगा और गंडक के मुहाने पर लगने वाले इस मेले का इतिहास राजा चंद्रगुप्त मौर्य के ज़माने से जोड़ा जाता है.

कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य अपनी सेना के लिए हाथियों की ख़रीददारी गंगा के इसी क्षेत्र से करते थे. हालाँकि आज भी इस मेले में हाथी और घोड़े काफ़ी संख्या में ख़रीद-बिक्री के लिए लाए जाते हैं लेकिन वन्यजीवों की ख़रीददारी पर सख़्त क़ानूनी शिकंजे के कारण रफ़्ता-रफ़्ता इस मेले का आकर्षण भी कम हुआ है.

लेकिन राज्य सरकार अब इस कोशिश में जुटी है कि इस मेले की पुरानी रौनक़ फिर से बहाल हो सके.

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