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न घर के न घाट के... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान के लुनियावास क्षेत्र में गधों के मेले में गधों की आवक बहुत कम हो गई है. गधों के अपने मेले में घोड़ों ने गधों को संख्या बल में पछाड़ दिया है. इस बार मेले में घोड़ों की संख्या से अधिक है. लोग अब घोड़ों की शक्ति को सलाम करने लगे है. सदियों पुराने इस मेला मैदान पर अब गधों की ढेंचू-ढेंचू की बजाय घोड़ों की हिनहिनाहट अधिक सुनाई देने लगी है. कभी यह मेला मैदान गधों से भरा-भरा रहता था. अब गधे अपने ही मेले में अल्पसंख्यक हो गए हैं. आयोजकों के मुताबिक इस बार मेले में लगभग एक हज़ार गधे आए लेकिन घोड़ों की संख्या बढ़कर ढाई हज़ार हो गई. मेले के एक आयोजक भगवत सिंह कहते हैं, "ऐसा ही हाल रहा तो इस पारपंरिक मेले का वजूद ही ख़त्म हो जाएगा. घोड़ों के लिए भारत में और भी जगह हो सकती हैं लेकिन बेचारे गधे कहाँ जाएंगे. सरकार इस मेले को बचाने के लिए कोई मदद नहीं कर रही है." भारत में मेला और उत्सवों के लिए नेता और मंत्री हमेशा उदघाटन के लिए तैयार मिल जाते हैं लेकिन इस मेले का नाम आते ही नेता हाथ खींच लेते हैं. आयोजन मेला समिति के उमेद सिंह ने बताया, "जब मैं एक मंत्री को उदघाटन के लिए बुलाने गया तो उनके सचिव ने कहा कि गधों के मेले का उदघाटन कराने के लिए क्या उनके ही मंत्री मिले हैं." इस बार कांग्रेस नेता प्रताप सिंह खर्चिवास ने इन जानवरों की पुकार सुनी और मेले का उदघाटन किया.
प्रताप सिंह का कहना है, "यह धारणा ग़लत है कि जो भी नेता इस मेले का उदघाटन करेगा वो चुनाव हार जाएगा. गधे-घोड़े चुनाव का फ़ैसला नहीं करते हैं." जब कोई अधिकारी या नेता मेले की तरफ आते हैं तो गधे उनकी ओर उम्मीद भरी नज़रों से देखने लगते हैं. जब लोग इन गधों का मजाक उड़ाते हैं तो रमेश जैसे गधा पालकों को बहुत दुख होता है. रमेश कहते हैं, "लोग इसे मूर्ख कहते हैं. बेटा धोखा दे देगा लेकिन गधा कभी धोखा नहीं देता. आधी रात को भी काम ले लो कभी कुछ नहीं कहेगा. हमारे लिए यह भगवान है. हमारा अन्नदाता है." गधों के इस समागम में बॉलीवुड के दर्शन भी हो जाते हैं. मेले में आए एक आदमी ने बताया कि यहाँ काजोल, आमिर ख़ान, मल्लिका शेहरावत, शाहरुख़ ख़ान और प्रिटी जिंटा नाम के गधे-गधियाँ बड़ी तादाद में हैं. गधों के मालिक इन गधों का नाम चाल और जोड़ी के हिसाब से रखते हैं. जैसे जो तेज़ चलता है वो शाहरुख़ हो जाता है और धर्मेन्द्र नाम के गधे के साथ वाली गधी का नाम हेमा मालिनी हो जाता है. लोकतंत्र में यह जुमला बहुत सुना है कि गधे पंजीरी खा रहे हैं लेकिन लुनियावास में गधा न घर का है न घाट का. | इससे जुड़ी ख़बरें लाहौर हाईकोर्ट में गधे का मामला22 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस गधे की खाल और राजनेता02 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस पाकिस्तान में गधों की संख्या बढ़ी14 जून, 2006 | भारत और पड़ोस श्रमजीवी गर्दभ चिकित्सालय खुला24 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस घट रही है गधों के मेले की रौनक़22 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस अर्धकुंभ में फ़ोटोग्राफरों पर कड़ी 'नज़र'16 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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