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गधे की खाल और राजनेता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान में गधे और राजनीतिज्ञों की तुलना को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. विवाद की जड़ नवीं कक्षा की पाठ्यपुस्तक का एक व्यंग्यात्मक लेख है जिसमें कहा गया है कि राजनेताओं और गधों की खाल एक जैसी यानी मोटी होती है. यह पुस्तक इसी सत्र से राजस्थान सरकार ने लागू की है जिस पर कांग्रेस के विधायक हरिमोहन शर्मा ने कड़ी आपत्ति की है. शर्मा ने बीबीसी से बातचीत में कहा " मेरी आपत्ति ये है कि इस तरह की तुलना से भारत के महान नेताओं ( जवाहर लाल नेहरु, इंदिरा गांधी ) के बारे में बच्चों को ग़लत संदेश देगी. " यह पूछे जाने पर कि क्या घूस लेने वाले नेताओं ने छवि ख़राब नहीं की है और क्या ऐसे में उनकी तुलना गधों की ख़ाल से नहीं होनी चाहिए तो शर्मा का कहना था कि ऐसे नेताओं का विशेष उल्लेख किया जा सकता है लेकिन सभी पर ऐसी टिप्पणी नहीं होनी चाहिए. शर्मा ये भी कहते हैं कि व्यंग्य लिखे जाने चाहिए लेकिन अगर इस तरह के व्यंग्य पाठ्यक्रम में शामिल हुए और इस पर आधारित प्रश्न पूछे गए तो बच्चों की समझ ख़राब हो सकती है. इस पूरे विवाद पर राजस्थान के शिक्षा मंत्री घनश्याम तिवारी कहते हैं कि यह विवाद ही नहीं है. बीबीसी से बातचीत पर उन्होंने कहा कि इस पूरे मसले के लिए एक कमिटी बैठा दी गई है और अगले चार पांच दिन में पूरा लेख पढ़कर इस पर फ़ैसला किया जाएगा. यह पूछे जाने पर कि क्या यह लेख आपत्तिजनक है तो उन्होंने कहा कि यह तो लेख पढ़ने के बाद ही तय किया जा सकेगा. फ़ैसला चाहे जो भी हो लेकिन एक बात तय है कि राजनेताओं के चक्कर में बेचारे गधे यूं ही बदनाम हो रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें खच्चर ने किया चमत्कार02 अक्तूबर, 2002 | पहला पन्ना गधों के मेले में घोड़ों की मौज23 अक्तूबर, 2002 | पहला पन्ना बारिश के लिए गधे ब्याहे | भारत और पड़ोस घट रही है गधों के मेले की रौनक़22 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस लाहौर हाईकोर्ट में गधे का मामला22 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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