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अर्धकुंभ में फ़ोटोग्राफरों पर कड़ी 'नज़र' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अर्धकुंभ में शाही स्नान के दौरान फ़ोटोग्राफरों पर नज़र रखी जा रही है. कई फ़ोटोग्राफरों को शाही स्नान की तस्वीरें खींचने से रोका भी गया. प्रशासन के इस क़दम से स्थानीय पत्रकारों में रोष है और वो इसके लिए पुलिस को दोष दे रहे हैं. पहले शाही स्नान के दौरान कई फ़ोटोग्राफरों को अखाड़ों के जुलूस के पास ही रोक दिया गया और उन्हें स्नान घाट तक जाने की अनुमति नहीं दी गई. इनमें कई स्थानीय फ़ोटोग्राफर थे और कुछ दिल्ली के. स्थानीय अधिकारियों का कहना था कि प्रशासन ने स्नान के दौरान तस्वीरें खींचने की मनाही की है. हालांकि जब उनसे यही बात पूछी गई तो वो साफ़ यह कहते हुए मुकर गए कि वो रिकॉर्ड पर कुछ नहीं कहेंगे. बाद में मेला के नोडल अधिकारी और डिवीजनल कमिश्नर रविंद्र त्रिपाठी ने भी गोल-मोल जवाब देते हुए कहा कि इस बारे में नीति पर विचार-विमर्श किया जाएगा. हालांकि कई अधिकारियों ने नाम उजागर न करने की शर्त पर इस फ़ैसले का असली कारण बताया. अधिकारियों का कहना था कि इलाहाबाद में पिछले बार यानी 2002 में आयोजित कुंभ के दौरान कई ऐसी तस्वीरें छापी गईं जो अच्छी नहीं थी और इसे लेकर स्थानीय लोगों ने काफ़ी गुस्सा जताया था. पिछले महाकुंभ में ऐसी तस्वीरों को लेकर इलाहाबाद और पूरे राज्य में काफ़ी विवाद भी हुआ था. इसके मद्देनज़र कोशिश की गई कि कम से कम फ़ोटोग्राफरों को स्नान घाट तक जाने दिया जाए और वहाँ भी स्नान की तस्वीरें खींचने के लिए बिल्कुल प्रोत्साहित न किया जाए. इलाहाबाद में आकाशवाणी के लिए काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ला भी इसकी पुष्टि करते हैं. वो बताते हैं कि पिछले कुंभ की आधिकारिक रिपोर्ट में भी इस बात की अनुशंसा की गई थी कि फ़ोटोग्राफरों पर नज़र रखी जानी चाहिए ताकि किसी ऐसे विवाद को रोका जा सके. विदेशियों को छूट हालांकि विदेशी पत्रकारों के साथ प्रशासन का रवैया बिल्कुल अलग दिखा. बड़ी संख्या में विदेशों से आए फोट़ोग्राफरों ने प्रशासन से बचने की तरकीब निकाल ली थी और वो प्रेस के पास के बजाय अखाड़ों के साथ ही आए थे. इसका नतीजा हुआ कि उन्होंने जमकर तस्वीरें खींचीं और उनकी तस्वीरें विभिन्न विदेशी अख़बारों में प्रकाशित भी होंगी. ऐसे ही एक पत्रकार थे इटली से आए अंटोनियो जो निर्वाणी अखाड़े के साथ शामिल हो गए और उन्होंने नागा साधुओं की नहाते हुए ख़ूब तस्वीरें खीचीं. वो मुस्कुराते हुए कहते हैं, " मैं तो नागाओं के बीच में था. थोड़ी दिक्कत हुई लेकिन वो सब अच्छे थे. मुझे ख़ूब फ़ोटो मिले." इससे स्थानीय पत्रकार और भी नाराज़ थे. उनका कहना था कि प्रशासन उन लोगों को नहीं रोकता जो भारतीय संस्कृति को नहीं समझते बल्कि स्थानीय फ़ोटोग्राफरों को परेशान कर रहा है. इस पूरे प्रकरण में प्रशासन की हालत उस साँप जैसी हो गई है जिसके गले में छछूंदर फँसा हुआ है. अगर सभी फ़ोटोग्राफरों को स्नान की तस्वीरें लेने देते हैं तो फिर उनके शब्दों में ग़लत तस्वीरों को प्रकाशित होने से कैसे रोका जाएगा और अगर अनुमति नहीं देते हैं तो उन्हें इन फ़ोटोग्राफरों का कोपभाजन बनना पड़ रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें शाही स्नान पर भ्रम की स्थिति14 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस अर्ध कुंभ का पहला शाही स्नान संपन्न15 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस अर्ध कुंभ के मद्देनज़र 80 कारखाने बंद15 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस पहले दिन का स्नान शांतिपूर्ण संपन्न03 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस पौष पूर्णिमा स्नान के साथ अर्धकुंभ शुरू03 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस कुंभ मेले के लिए पानी छोड़ा गया15 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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