|
कपड़े पहनाना है हमारा काम | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ़िल्मों के अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार ऑस्कर से अब तक सिर्फ दो भारतीयों को नवाज़ा गया है और उनमें से एक हैं भानु अथैय्या जिन्हें कॉस्ट्यूम डिज़ाइनिंग के लिए यह सम्मान दिया गया था. भानु को गांधी फ़िल्म में ड्रेस डिजाइनिंग के लिए अवार्ड मिला और इससे अंदाज़ा लग सकता है कि कॉस्ट्यूम देखने वालों का काम फ़िल्म के लिए कितना महत्व रखता है. अब बॉलीवुड में भी कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर आ रहे हैं लेकिन यहां कपड़ों का असली काम ड्रेसमैन करते हैं. इन ड्रेसमैनों का काम होता है जिस तरह के ड्रेस की डिमांड हो वो मुहैय्या करवाना. रुपेश कई वर्षों से ड्रेसमैन का काम कर रहे हैं और अब कपड़ों की सप्लाई भी करते हैं. वो अपने विशेष अंदाज़ में कहते हैं, "अपुन ने तो बहुत हीरो लोग को कपड़ा पहनाया है. अमिताभ बच्चन को पहनाया है कपड़ा. बोले तो सैफ़ खान को, बाबा को... बाबा ...बोले तो संजय दत्त. और भी हीरो के साथ काम किया है मैंने". रुपेश कपड़े डिज़ाइन भी करवाते हैं और वो हर तरह के कपड़े उपलब्ध करवा सकते हैं क्योंकि उन्हें इंडस्ट्री में 14 साल हो गए हैं. कभी कोई दिक्कत होती है कपड़ों में. रुपेश कहते हैं, "हां होती है न.. जैसे देखो अभी बाबा ( संजय दत्त) है न लंबा है बहुत तो उसको कोट पहनाने में प्राब्लम होता है. उसका साइज का फिटिंग ठीक रहना मंगता है. ये ख्याल रखना पड़ता है". अगर कपड़े छोटे बड़े हो गए तो सेट पर ही कपड़े ठीक साइज के करवाने होते हैं. ड्रेसमैन आम तौर पर असिस्टेंट डायरेक्टरों के साथ संपर्क में रहते हैं और उन्हीं के निर्देशों का पालन करते हैं. फ़िल्म अभिनेत्री विशाखा सिंह कहती हैं कि कॉस्ट्यूम वाले कई बार हीरोईनों के बहुत काम आते हैं.
वो कहती हैं, '"मैं नई हूं इंडस्ट्री में. जैसे कभी कोई ऐसी ड्रेस है जो लो कट है या अश्लील लग रही हो तो मैं कॉस्ट्यूम वाले से कहती हूं तो वो उसको इस तरह से पहनाता है कि वो बहुत ख़राब न लगे". असिस्टेंट डायरेक्टर वसुंधरा प्रकाश कहती हैं, "मैं कॉस्ट्यूम का काम देख रही हूं और ड्रेसमैन को बताती हूं कि कैसी ड्रेस चाहिए. कई बार तो ड्रेसमैन नया डिज़ाइन कर देते हैं". रुपेश ने झूम बराबर झूम में एक कपड़ा डिज़ाइन किया है जिसके बारे में वो बताते हैं कि उन्होंने सड़कों से कपड़े उठाए और काट पीट कर नई शर्ट बनाई थी. रुपेश मस्त रहने वाले लोगों में से है और शिकायत नहीं करते. उन्हें इससे भी शिकायत नहीं रहती कि पहचान बहुत नहीं मिलती है. वो कहते हैं, "मेहनत करते हैं हम लोग लेकिन उतना नाम नहीं मिलता. सबकी मजबूरी है उसी हिसाब से काम करता है आदमी. जैसे मैं अपने काम से खुश हूं. कम बजट की फ़िल्म में पैसा का प्राब्लम होता है वर्ना कॉस्ट्यूम वाले से जल्दी कोई पंगा नहीं करता है". वसुंधरा बताती हैं कि फैशन डिज़ाइनरों के नाम भले ही फ़िल्मों में आते हों लेकिन क़ॉस्ट्यूम का असली काम इन्हीं ड्रेस मैनों का होता है जो आपके निर्देश पर कुछ भी बना सकते हैं. रुपेश सपना देखते हैं और उनका सपना भी कपड़ों का ही है. वो कहते हैं, '"अपना क्या है न.. दो दुकान होना चाहिए अपुन का मुंबई में जिसमें मैं सब टाइप के कपड़े रखूं. मैं ये कपड़ा फ़िल्मों के लिए सप्लाई करुंगा. यही मेरा ख्वाब है. बस ज़्यादा नहीं मांगता है अपने को". ड्रेसमैनों की ये कहानी आपको कैसी लगी. हमें लिखिए [email protected] पर |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||