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बस इतना सा ख़्वाब है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
किसी भी फ़िल्म की शूटिंग में अगर कोई सबसे अधिक मेहनत का काम करता है तो वो होता है...डायरेक्टर.....एक्टर....जी नहीं... वो होता है स्पॉट ब्वॉय... जी हां...ये फ़िल्मी दुनिया के सबसे निचले पायदान पर रहने वाले लोग हैं जिनकी मेहनत का लोहा पूरी फ़िल्म यूनिट मानती है लेकिन इन्हें पहचानता कोई नहीं. फ़िल्म शूटिंग में प्रोडक्शन का काम संभालने वाले इम्तियाज़ कहते हैं कि बिना स्पॉट ब्वॉय के किसी भी शूटिंग का भली भांति समेटा जाना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव है. लेकिन आखिर ये करते क्या हैं. फ़िल्मों की शूटिंग में पिछले 22 वर्षों से काम कर रहे विनोद कुमार चौधरी बताते हैं कि ये बहुत कठिन काम है और सबके बस का नहीं है. बिहार से आए विनोद कहते हैं, ' स्पॉट ब्वॉय किसी भी शूटिंग के स्थान पर सबसे पहले आता है. शूटिंग सात बजे हो तो स्पॉट ब्वॉय छह बजे आएगा. शूटिंग का सामान उतारेगा, तंबू लगाएगा. चाय बनेगी तो पूरी यूनिट को चाय पिलाएगा. ' इसके बाद काम शुरु होगा शूटिंग का.लेकिन इसमें क्या काम है उनका. प्रोडक्शन के दिग्गज इम्तियाज़ कहते हैं, ' दस काम होते हैं. भीड़ आ गई है तो हटाएगा कौन. हीरो के लिए छाता लेकर खड़ा होना है. उसको पानी चाहिए. डायरेक्टर को चाय चाहिए. चीनी कम चाहिए अधिक चाहिए. हीरोईन को बुलाना है. ये सारा काम स्पॉट ब्वॉय का ही होता है. ' यानी पूरी यूनिट को जोड़ने वाली इस कड़ी पर सारे लोग चिल्लाते हैं. कभी कोई स्पॉट ब्वॉय कह कर बुलाता है तो कभी कोई स्पॉट दादा. फ़िल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा मानती हैं कि अच्छे स्पॉट ब्वॉय का असर फ़िल्म पर भी पड़ता है. लेकिन कैसे. वो बताती हैं, 'हीरो हीरोईन का ख़्याल रखना ही ज़रुरी नहीं है. पूरी यूनिट की देखभाल इनके ज़िम्मे है. अगर किसी का भी मूड ख़राब है तो उसका असर फ़िल्म पर दिख जाएगा. ये संबंध सीधे सीधे तो दर्शाना मुश्किल है लेकिन मैंने कई शूटिंग्स देखी है जहां स्पॉट ब्वॉय ठीक नहीं हो तो शूटिंग का कबाड़ा निकल सकता है. ' प्रोड्क्शन का काम देखने वाले इम्तियाज़ तो यहां तक मानते हैं कि अगर स्पॉट ब्वॉय अच्छे नहीं होते हैं तो फ़िल्म का बजट भी बढ़ सकता है क्योंकि शूटिंग सही समय पर ख़त्म करने में इनकी बड़ी भूमिका रहती है. ज़माना बदल गया स्पॉट ब्वॉय शूटिंग का अभिन्न हिस्सा हैं लेकिन क्या ये अपने काम से खुश रहते हैं.
विनोद कहते हैं, ' पहले तो हीरो लोग बहुत प्यार से बात करते थे. शॉट के बाद वो रुके रहते थे और हाल चाल पूछते थे लेकिन अब तो हीरो हीरोईन शॉट देकर वैन में चले जाते हैं. मैं बहुत दिनों से हूं लाइन में तो सब लोग जानते हैं लेकिन फिर भी बेवजह डांट तो पड़ ही जाती है.' विनोद को तो अनुभव है इसलिए थोड़ी इज्ज़त है लेकिन छोटू बस तीन चार साल से इस काम में लगे हैं. वो कहते हैं, ' बहुत मेहनत का काम है. सब हम पर चिल्लाते हैं. लाइटमैन को गुस्सा आए या कैमरामैन को या डायरेक्टर को. हम पर सब चिल्ला सकते हैं. हम पर चिल्ला कर सबका गुस्सा शांत होता है. ' हालांकि छोटू को डांट के बावजूद काम में मज़ा आता है, आखिर क्यों, वो कहते हैं, ' शुरु शुरु में मज़ा आता है. हीरो हीरोईन को पास से देखते हैं तो लेकिन फिर वो बात नहीं रहती है. हमें पैसे भी कम मिलते हैं. यूनियन है लेकिन हमारी कोई पूछ नहीं. ' शायद यही कारण है कि छोटू सपना देखते हैं. क्या करना चाहते हैं वो. छोटू कहते हैं, ' हम चाहते हैं कि हमको लाइटमैन का काम मिले. हम लाइट का थोड़ा काम सीख जाएंगे तो वही काम करेंगे. फिर उससे कुछ आगे बढ़ने का सोचेंगे. यही सपना है मेरा. ' विनोद अब अपनी पारी खेल चुके हैं. वो कहते हैं, 'बस लोग थोड़ी इज्ज़त करें यही काफ़ी है मेरे लिए. मैंने तो बहुत काम कर लिया है.' वैसे एक स्पॉट ब्वॉय है जिसकी कहानी इन सभी लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन सकती है और वो हैं अशोक मेहता. मेहता ने भी स्पॉट ब्वॉय से अपना कैरियर शुरु किया था लेकिन बाद में उन्होंने कैमरामैन का काम सीखा और अब उनकी गिनती बॉलीवुड के शीर्ष कैमरामैनों में होती है. फ़िल्मी दुनिया के अनचाने चेहरों की कहानियों की शृंखला में स्पॉट ब्वॉय की कहानी आपको कैसी लगी हमें इस पते पर hindi.letters@bbc.co.uk पर ज़रुर लिखिए.. आने वाले दिनों में आप ऐसी और कहानियां पढ सकेंगे. |
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