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सिंगुर में सीपीएम ने बंद रखा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
टाटा समूह के नैनो परियोजना को पश्चिम बंगाल से बाहर ले जाने की घोषणा के बाद सिंगुर में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने शनिवार को 12 घंटे का बंद रखा. समाचार एजेंसियों के अनुसार शुक्रवार देर रात दुर्गापुर एक्सप्रेस को रोक दिया गया था लेकिन शनिवार दोपहर से रेलगाड़ी फिर चलने लगी है. ये टाटा के कारखाने और कमाराकुंडा रेल स्टेशन के बीच चलती है. हावड़ा-बर्दवान रेल लाइन पर भी रेलगाड़ियों की आवाजाही बाधित की गई है. दुर्गापुर एक्सप्रेसवे पर सभी दुकानें बंद रहीं. बीबीसी संवाददाता सुबीर भौमिक के अनुसार किसान और स्थानीय लोग भी प्रदर्शनों में शामिल हुए क्योंकि वे इस कारखाने के काम करने से नौकरियों और व्यवसाय शुरु होने की उम्मीद कर रहे थे. उधर पश्चिम बंगाल की सरकार का कहना है कि टाटा के राज्य से हटने से पहले 11 हज़ार लोगों ने टाटा के कारखाने के लिए ज़मीन दी थी जबकि केवल दो हज़ार किसान विपक्षी दलों के साथ जुड़कर टाटा का विरोध कर रहे थे. जो लोग मज़दूरी और अन्य नौकरियों की उम्मीद लगाकर बैठे थे, उन्होंने विपक्ष की नेता ममता बनर्जी और अन्य नेताओं के पुतले जलाए. अनेक जगहों पर सड़कों पर आवाजाही बंद की गई और कई सड़कों पर गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने खुदाई कर दी. उधर टाटा के सिंगुर कारखाने में अगस्त महीने के अंत से काम बंद है क्योंकि तब से विपक्षी दलों के कार्यकर्ता त्रिणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व में प्रदर्शन कर रहे हैं. पश्चिम बंगाल में चिंता, निराशा राज्य के कई हिस्सों में टाटा की इस घोषणा के बाद चिंता और निराशा व्यक्त की जा रही है कि दुनिया की सबसे सस्ती कार नैनो का उत्पादन सिंगुर में नहीं होगा. सिंगुर और राज्य के अन्य हिस्सों में काफी तनाव का माहौल है. पिछले कुछ समय से सिंगुर में संयंत्र और उसके लिए आवंटित भूमि को लेकर जो विरोध टाटा समूह को झेलना पड़ रहा था, उसके चलते समूह के चेयरमैन रतन टाटा ने शुक्रवार को सिंगुर से इस परियोजना को हटा लेने की घोषणा की थी. जानकारों का मानना है कि जहाँ टाटा की इस घोषणा से राज्य सरकार को ख़ासा नुकसान हुआ है वहीं आने वाले दिनों में संभावित पूँजी निवेश को भी लेकर शंकाएं व्यक्त की जा रही है. अर्थ जगत के विशेषज्ञ बताते हैं कि टाटा की सिंगुर से वापसी का राज्य की आर्थिक प्रगति पर असर पड़ेगा और यह फ़ैसला निवेशकों को हतोत्साहित करनेवाला है. ममता की मुश्किलें बढ़ीं टाटा समूह के इस फ़ैसले से सबसे ज़्यादा घबराहट तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता और पदाधिकारी महसूस कर रहे हैं. ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस कुछ स्थानीय लोगों के साथ टाटा को भूमि आवंटन के मुद्दे पर लगातार विरोध करती रही है.
अब टाटा की वापसी के फ़ैसले के बाद स्थानीय लोगों को काफी निराशा हुई है और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को लगता है कि इसका असर उनकी राजनीति और जनाधार पर पड़ेगा. पार्टी कार्यकर्ता इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से कतरा रहे हैं. उधर ममता बनर्जी ने कहा, "ये टाटा समूह का निजी फ़ैसला है और ये टाटा और सीपीएस की संयुक्त रणनीति है. इसका आरोप हमारी पार्टी पर नहीं लगाना चाहिए." साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि राज्य में टाटा की इस परियोजना को लाने का काम वर्तमान मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने किया था इसलिए इसके राज्य से जाने के लिए भी उन्हें ही ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. सिंगुर और आसपास के इलाक़े के लोग टाटा के वापसी के फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि इससे स्थानीय लोगों को बहुत ज़्यादा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा. लोगों ने ज़मीनों के बदले में मिले पैसे का निवेश किया था पर अब कारखाने के वापस जाने के बाद लोगों को अपना निवेश डूबता नज़र आ रहा है. श्रमिकों के एक बड़े कॉन्ट्रेक्टर मानस घोष ने बीबीसी से कहा, "टाटा समूह के इस संयंत्र से हम सभी को लाभ मिल रहा था. अब हमारा कामकाज इससे बुरी तरह प्रभावित होगा इसलिए हमने तय किया है कि टाटा को यहाँ से वापस नहीं जाने देंगे. टाटा की गाड़ियाँ लौटेंगी तो हम उनके सामने लेट जाएंगे." वापसी की घोषणा टाटा समूह ने शुक्रवार को घोषणा की थी कि वो सिंगुर स्थित अपने संयंत्र को पश्चिम बंगाल से हटा रहा है लेकिन यह नहीं बताया गया है कि नैनो का उत्पादन अब कहाँ होगा. रतन टाटा ने कहा, "हमें कई भारतीय राज्यों ने आमंत्रित किया है कि हम उनके यहाँ नैनो के उत्पादन के लिए संयंत्र लगाएँ लेकिन अभी तक हमने निर्णय नहीं किया है." उन्होंने पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार की कोशिशों की सराहना की और कहा कि विपक्ष की नीतियों की वजह से उन्हें यह फ़ैसला करने पर मजबूर होना पड़ा. रतन टाटा ने कहा, "हमें फैक्ट्री लगाने में बहुत आक्रामक विरोध का सामना करना पड़ा, हमें लगा कि विपक्ष जायज बात को समझेगी और हमें पर्याप्त भूमि मिल सकेगी ताकि मुख्य प्लांट और सहायक इकाइयाँ एक साथ लगाई जा सकें, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. हम हमेशा पुलिस की सुरक्षा में काम नहीं करना चाहते थे." पश्चिम बंगाल सरकार ने दो वर्ष पहले नैनो परियोजना के लिए 100 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया था लेकिन किसानों विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में ज़मीन वापस माँगना शुरू कर दिया. दस हज़ार से अधिक किसान मुआवज़ा लेकर अपनी ज़मीन देने को तैयार थे लेकिन दो हज़ार किसान किसी हालत में अपनी ज़मीन नहीं छोड़ना चाहते थे. |
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