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मंगलवार, 16 सितंबर, 2008 को 13:35 GMT तक के समाचार
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प्रचंड की भारत यात्रा की अहमियत और नज़रिया

प्रचंड और मनमोहन सिंह
नेपाल के प्रधानमंत्री के रुप में प्रचंड की यह पहली भारत यात्रा है
ऐसा प्रतीत होता है कि नेपाली प्रधानमंत्री प्रचंड अपने पड़ोसी देश भारत के साथ संबंधों की अब तक की शर्तों को बदलने के इरादे से भारत का दौरा कर रहे हैं.

नेपाल के नेता वर्षों से उस शांति समझौते की समीक्षा करने पर ज़ोर देते रहे हैं जिसके तहत 1950 से भारत के साथ नेपाल के संबंध परिभाषित होते रहे हैं. इस वजह से नेपाली प्रधानमंत्री के इस दौरे पर सबकी नज़र टिकी है.

प्रचंड पर भारत की ओर न झुकने का नेपाली माओवादियों का दबाव है. उन्हें प्रोत्साहित किया गया है कि वे भारत से सामने न झुकें और उन्होंने कहा है कि वे भारत के समक्ष नई संधि का मसौदा रख रहे हैं.

1952 में भारत-नेपाल संबंध

 हम नेपाल में ऐसा कुछ ग़लत नहीं होने देंगे, या किसी को उस सीमा को पार नहीं करने देंगे या फिर उस सीमा को कमज़ोर नहीं होने देंगे, जिससे हमारी सुरक्षा को ख़तरा पैदा हो
प्रधानमंत्री नेहरू

वर्ष 1952 में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन के सहयोग से नेपाली सत्ता पर कब्ज़ा जमाने की असफल कोशिश की थी. इसके बाद भारत के साथ नेपाल के सैन्य और खुफ़िया जानकारी के क्षेत्रों में तेज़ी आई थी.

नेपाल की अहमियत को समझते हुए वर्ष 1959 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने कहा था, "हम नेपाल में ऐसा कुछ ग़लत नहीं होने देंगे, या किसी को उस सीमा को पार नहीं करने देंगे या फिर उस सीमा को कमज़ोर नहीं होने देंगे, जिससे हमारी सुरक्षा को ख़तरा पैदा हो."

प्रचंड इस बात को समझते हैं कि उनका यह दौरा नेपाल के पिछले नेताओं के दौरों से अलग है.

उनके बयानों और चाल-ढाल से स्पष्ट लगता है कि वे भारत के साथ एक संप्रभु राष्ट्र के नेता की हैसियत से मिलना चाहते हैं न कि एक आश्रित या दो नंबर के राष्ट्र के नेता की तरह.

उन पर अपनी पार्टी के कॉमरेड सहयोगियों का दबाव है कि वे भारत के साथ 1950 से चले आ रहे समझौते को रद्द करें.

नेपाल में दौरे की चर्चा

नेपाली टेलिवीज़न, रेडियो और अखबारों में प्रचंड के भारत दौरे की खूब चर्चा रही है. भारत और नेपाल के बीच 1800 से भी ज़्यादा किलोमीटर का खुला बॉर्डर है.

 जिस तरह भारत का प्रभावशाली और समृद्ध वर्ग में अमरीका के प्रति विरोध का भाव वर्षों से बैठा रहा, उसी तरह से नेपाल का ऐसा वर्ग भारत का विरोध करता है
इंदर मल्होत्रा, राजनीतिक विश्लेषक

क़रीब 50 लाख नेपाली भारत में काम करते हैं या वहाँ पर उनकी ज़मीन जायदाद है. भारत में रहने के लिए उन्हें किसी तरह के वीज़ा या 'वर्क परमिट' की ज़रुरत नहीं होती और उन्हें एक भारतीय नागरिक की तरह ही सभी अधिकार मिलते हैं.

ब्रितानी शासनकाल से ही भारतीय सेना में नेपाली गोरखा-सैनिकों की भर्ती होती है. लगभग 40 हज़ार नेपाली गोरखा सैनिक इस समय भारतीय सेना में शामिल हैं.

नेपाल के भारत में पूर्व राजदूत प्रोफ़ेसर लोकराज बाराल कहते हैं कि समझौते की समीक्षा की माँग कोई नई नहीं है. वे कहते हैं कि समझौते को लेकर मचा हंगामा लोकमत को 'संतुष्ट' करने का तरीक़ा है.

हाल ही में नेपाली मीडिया में ऐसी अटकलें थी कि भारतीय सैनिकों को नेपाल में नदी परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए तैनात किया जा सकता है और मीडिया में इसकी ख़ासी आलोचना थी.

नेपाल में कोसी नदी के तटबंध का टूटना भी बहस का एक मुद्दा है.

प्रचंड
1950 में भारत-नेपाल समझौते को बदलने पर कई नेपाली नेताओं का ज़ोर रहा है

चारों तरफ़ ज़मीनी इलाक़ों से घिरा नेपाल काफ़ी हद तक भारत पर निर्भर हैं. नेपाल का सारा तेल भारत से बेचा जाता है और भारतीय बंदरगाहों के माध्यम से ही नेपाली अर्थव्यवस्था का आयात-निर्यात होता है.

वर्ष 1990 में दोनों देशों के बीच होने वाले कारोबार के लिए समझौते के मसौदे की भाषा को लेकर मतभेद पैदा हुए थे. इसके बाद भारत ने नेपाल पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे और उसे अपनी शर्तों पर राज़ी करने की कोशिश की थी. आर्थिक प्रतिबंध कई महीने चले थे.

आंतरिक सुरक्षा

चीन के साथ भारत के संबंधों में नेपाल एक 'बफ़र स्टेट' के रुप में यानी दो बड़ी शक्तियों के बीच स्थित देश का काम करता है. इस वजह से भारत की आतंरिक सुरक्षा में नेपाल की महत्वपूर्ण भूमिका है.

नेपाल और भारत के बीच समझौते में एक विवादास्पद प्रावधान के तहत नेपाल बिना भारत की अनुमति के किसी भी तीसरे देश से हथियार नहीं ख़रीद सकता है. इसे कई नेपाली देश की संप्रभुता के ऊपर चोट मानते हैं.

वर्ष 1990 में जब राजा बीरेंद्र ने चीन से हथियार ख़रीदने की धमकी दी तो भारत ने अपना रोष जताया था.

हालांकि भारत पर नेपाल की निर्भरता को प्रचंड और उनके सहयोगी ख़ारिज नहीं कर सकते हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि 1950 के समझौते में इस्तेमाल किए गए कुछ शब्दों में बदलाव ज़रुरी है.

एक भारतीय अधिकारी का कहना है कि हथियारों की ख़रीद को लेकर समझौते में जो प्रावधान है उसमें बदलाव की ज़रुरत है.

वे कहते हैं, "लोगों को समझना होगा कि वर्ष 1950 और वर्ष 2008 में बहुत फ़र्क है. लोगों की इच्छाओं को आप ख़ारिज नहीं कर सकते."

लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इंदर मल्होत्रा का कहना है कि भारत के लिए इस प्रावधान में बदलाव पर सहमत होना आसान नहीं होगा. भारत नहीं चाहेगा कि नेपाल चीन से नज़दीकी बनाए.

मल्होत्रा कहते हैं कि नेपाल के प्रभु वर्गों में भारत के प्रति विरोध का भाव पुराना है. यही वर्ग शांति समझौते को ख़त्म करने की फिर से माँग कर रहा है.

वे कहते हैं, "जिस तरह भारत का प्रभावशाली और समृद्ध वर्ग में अमरीका के प्रति विरोध का भाव वर्षों से बैठा रहा, उसी तरह से नेपाल का ऐसा वर्ग भारत का विरोध करता है."

यदि हम इसे मानें तो भी भारत एक नए नेपाल के साथ संबंध बना रहा है जो चाहता है कि उसे एक पार्टनर के रुप में देखा जाए न कि भारत के मातहत एक देश की तरह.

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