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भ्रष्टाचार मामले पर सुनवाई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुप्रीम कोर्ट सोमवार को निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट के 36 जजों के ख़िलाफ़ कथित भ्रष्टाचार के मामले की जांच कराने पर विचार करेगा. यह मामला गाज़ियाबाद के जजों का है जिसमें जजों पर कर्मचारियों के भविष्य निधि खाते से अवैध रुप से निकाली गई रकम का दुरुपयोग करने का आरोप है. गाज़ियाबाद बार एसोसिएशन और ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल ने अपनी रिट याचिकाओं में कहा है कि इस मामले की जांच स्थानीय पुलिस से लेकर सीबीआई को दे दी जाए क्योंकि उनके अनुसार स्थानीय पुलिस बड़े जजों से पूछताछ और उनके ख़िलाफ जांच पड़ताल ठीक से न कर सके. इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने सीबीआई जांच की मांग नामंजूर कर दी थी और कहा था कि न्यायपालिका के उच्च पदस्थ लोगों के शामिल होने के बावजूद इस मामले की जांच करने में स्थानीय पुलिस सक्षम है. इसी साल फ़रवरी में हुए इस घोटाले में गाज़ियाबाद ज़िला अदालत के कर्मचारियों और अन्य लोगों समेत 69 लोग गिरफ़्तार किए जा चुके हैं. हाई कोर्ट के सतर्कता जांच के बाद कायम कराए गए इस मुकदमे में आरोप है कि सन 2000 से 2007 तक कर्मचारियों के भविष्य निधि खाते से सात करोड़ रुपए निकाले गए जिसका अनुचित इस्तेमाल छोटे बड़े सभी 36 जजों ने किया. मामले के मुख्य अभियुक्त आशुतोष अस्थाना ने कोर्ट में रिकार्ड कराए गए अपने कलमबंद बयान में उन सभी 36 जजों के नाम लिए हैं जिनको इस धन से अनुचित लाभ पहुंचाया गया. स्थानीय पुलिस का कहना है कि जजों के ख़िलाफ़ पूछताछ के लिए उन्हें मुख्य न्यायाधीश की अनुमति चाहिए जबकि अनेक न्यायविदों का कहना है कि भ्रष्टाचार का ये मामला अदालती कार्य से संबंधित नहीं है इसलिए अनुमति के बिना पुलिस आगे की पूछताछ कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट में पिछली सुनवाई के दौरान ये दलील दी गई थी कि इस मामले की जांच पुलिस की बजाय जजों के माध्यम से करा ली जाए लेकिन ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल नामक संस्था ने इसका विरोध किया है और कहा है कि जांच सीबीआई को सौंपनी चाहिए. |
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