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'नरम' उल्फ़ा बातचीत को तैयार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पूर्वोत्तर राज्य असम के सबसे मज़बूत अलगाववादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम (उल्फ़ा) ने कहा है कि वह केंद्र सरकार के साथ बातचीत को तैयार है. उल्फ़ा के चेयरमैन अरबिंद राजखोवा ने ईमेल से एक बयान जारी करके यह जानकारी दी है. उन्होंने कहा है कि भारत सरकार को इसकी अनुमति देनी पड़ेगी कि उल्फ़ा नेता अपने साथियों से मिलने के लिए स्वतंत्र रूप से आ-जा सकेंगे. अपने बयान में राजखोवा ने कहा है, "अगर केंद्र सरकार उल्फ़ा की कार्यकारी परिषद की बैठक के लिए माकूल माहौल तैयार करती है, तो हम 48 घंटे के अंदर बातचीत के लिए तैयार हैं." राजखोवा ने कहा कि उल्फ़ा सभी राजनीतिक मसलों का हल राजनीतिक बातचीत से करना चाहती है. उन्होंने कहा कि वे लोग 'आतंकवादी' नहीं हैं. राजखोवा ने अपने बयान में स्पष्ट किया है कि मशहूर असमी लेखिका इंदिरा गोस्वामी के मनाने पर वह विदेशी धरती पर बातचीत की अपनी मांग को वापस ले रहे हैं. इंदिरा गोस्वामी सरकार और उल्फ़ा के बीच बातचीत के लिए मध्यस्थता कर रही हैं. राजखोवा के ईमेल में एक अहम बात और कही गई है कि उल्फ़ा बातचीत शुरू करने के लिए स्वायत्तता असम की मांग पर भी ज़ोर नहीं दे रहा है. शर्त अपने बयान में उन्होंने कहा है, "बातचीत शुरू करने के लिए स्वायत्तता ना तो कोई शर्त थी और ना ही हमारी मांग. हालाँकि असम की स्वायत्तता सुनिश्चित करना बातचीत का विषय होना चाहिए."
जानकारों का कहना है कि यह काफ़ी अहम बात है. अभी तक उल्फ़ा बातचीत शुरू करने के लिए असम की स्वायत्तता को एक शर्त के रूप में आगे रखता था. उल्फ़ा पर एक किताब लिखने वाले समीर दास का कहना है कि अब उल्फ़ा स्वायत्तता को एक शर्त नहीं रखना चाहते और अब बातचीत शुरू करने के लिए केंद्र के सामने कोई समस्या नहीं होनी चाहिए. मध्य जून में उल्फ़ा विभाजन के कगार पर पहुँच गया था. क्योंकि उसकी 28वीं बटालियन के कई नेताओं ने भारतीय सेना के साथ संघर्ष विराम की घोषणा कर दी थी. उल्फ़ा के शीर्ष नेतृत्व ने इन नेताओं को अनुशासनहीनता का आरोप लगाते हुए निलंबित कर दिया था. समीर दास का कहना है कि अब उल्फ़ा का शीर्ष नेतृत्व ये समझ गया है कि वे मुश्किल दौर में हैं और उनके गुरिल्ला यूनिट वाले भी लड़ाई करते-करते थक गए हैं. दो साल पहले भारत सरकार और उल्फ़ा के बीच बातचीत टूट गई थी. उसके बाद से सैनिक अभियानों में उल्फ़ा को काफ़ी नुक़सान हुआ है. पिछले चार महीने में उल्फ़ा के 50 विद्रोही मारे गए हैं जिनमें उनके कई शीर्ष कमांडर भी थे. | इससे जुड़ी ख़बरें असम के बाज़ार में बम विस्फोट, छह मरे29 जून, 2008 | भारत और पड़ोस असम के बर्ख़ास्त मंत्री जेल भेजे गए07 जून, 2008 | भारत और पड़ोस असम से महिलाओं की तस्करी पर चिंता06 जून, 2008 | भारत और पड़ोस असम में चौदह लोगों को मारने का दावा15 मई, 2008 | भारत और पड़ोस असम में बम धमाका, पाँच की मौत16 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस पूर्वोत्तर में कई जगह विस्फोट, 18 घायल08 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस चार अल्फ़ा विद्रोही मारे गए16 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस अल्फ़ा के साथ मुठभेड़ में कैप्टन की मौत 28 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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