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...ताकि अविरल बहती रहे गंगा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गंगा को अविरल बहने देने की मांग को लेकर नौ दिनों से आमरण अनशन पर बैठे प्रोफ़ेसर गुरूदास अग्रवाल की हालत दिनोंदिन ख़राब होती जा रही है. इस बीच कुछ स्थानीय लोगों के विरोध और हंगामे के बाद उन्हें उत्तरकाशी के मणिकर्णिका घाट में अनशन स्थल से हटा दिया गया है. 74 वर्षीय प्रोफ़ेसर अग्रवाल आईआईटी कानपुर में सिविल और पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष रहे है. उत्तराखंड सरकार ने उनके दबाव में पाल मनेरी और भैंरोघाटी दो परियोजनाओं पर रोक लगा दी है. ये परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं और इनपर अब तक 80 करोड़ रूपये खर्च हो चुके हैं लेकिन जीडी अग्रवाल की मांग है कि चालू परियोजनाओं को भी बंद किया जाए और सारे बैराज खोल दिए जाएं. उनका कहना है कि गंगा का गला घोंटा जा रहा है. टिहरी में जो विनाशकारी ग़लती हो गई सो हो गई लेकिन कम से कम अब उसके ऊपर गोमुख तक तो गंगा की अविरल धारा को बहने दिया जाए और इन सभी बांध परियोजनाओं को तत्काल बंद किया जाए. कड़ा विरोध उनका कहना है कि अगर अब भी गंगा को नहीं बचाया गया तो इसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और वो नदी की रक्षा के लिए खुद को समर्पित कर देंगे.
टिहरी में भागीरथी पर बने एशिया के सबसे ऊंचे बांध के अलावा अब गंगोत्री से उत्तरकाशी तक गंगा और उसकी सहायक नदियों पर सात बांध बनाए जा रहे हैं. इनमें से एक भैंरोघाटी परियोजना गोमुख से सिर्फ़ 29 किलोमीटर पहले है. इन बांध परियोजनाओं की वजह से गंगोत्री से उत्तरकाशी गंगा कुछ स्थानों पर अपने नदी प्रवाह में नहीं बल्कि 15 से 20 किलोमीटर लंबी सुरंगों मे बहेगी. इसके अलावा देवप्रयाग से ऊपर 20 और बांधों की योजना पर काम चल रहा है. गंगा के इसी सुरंगीकरण के विरोध मे ये आंदोलन चल रहा है. प्रोफेसर राजेंद्र सिंह और एमसी मेहता जैसे जानेमाने पर्यावरणविद् भी इस ‘गंगा बचाओ अभियान’ में शामिल हैं. जनहित याचिका एमसी मेहता ने गंगा के प्रदूषण के विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की है जिसपर पिछले 10 वर्षों से सुनवाई चल रही है. हाल ही में गोमुख से लौटे एमसी मेहता कहते हैं, “ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं और गंगा में पानी लगातार कम हो रहा है. सवाल ये भी है कि जब पानी ही नहीं होगा तो इन बांध परियोजनाओं का मतलब क्या है.” स्थानीय लोग भले ही ग्लोबल वार्मिंग की तकनीकी शब्दावली को न समझें लेकिन वो भी आशंकित हैं. इस समय अकेले गंगा पर ही नहीं बल्कि उत्तराखंड की 14 नदी घाटियों में 220 से ज्यादा छोटी बड़ी परियोजनाएं बन रही हैं. ध्यान रहे कि इनमें से अधिकांश नदियां चाहे वो अलकनंदा हो या फिर मंदाकिनी, गंगा की सहायक नदियां हैं. उत्तरकाशी की जीवंती देवी कहती हैं, “जब ये निर्माण कंपनियां विस्फोट करती हैं तो हमारे घर कांप उठते हैं. गांव और खेतों में दरारें पड़ रही हैं और वो धंस रहे हैं.” भावनात्मक विरोध गौरतलब है कि हिमालय का ये क्षेत्र भूकंप के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील जोन-5 में पड़ता है. विष्णुप्रयाग परियोजना के पास मैठाणा गांव के निवासी श्रीनिवास डोभाल कहते हैं, “नदियां आज हताश और मैली दिख रही है. इसी तरह से अगर नदियों को बांधा जाता रहा तो हमारे प्रयाग नष्ट हो जाएंगे जिन्हें देखने के लिये लोग दूर-दूर से यहां आते हैं और ये स्थानीय पर्यटन का स्रोत बना रहा है.” मूल रूप से ये विरोध तीन बातों को लेकर है. बड़े पैमाने पर विस्थापन, गंगा हिमालय की परिस्थितिकी को ख़तरा और धार्मिक आस्था और श्रद्धा को ठेस. हांलाकि कुछ प्रगतिशील लोग इस विरोध को भावनात्मक करार देते हैं. साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात कवि और संस्कृतिकर्मी लीलाधर जगूड़ी कहते हैं, “गंगा एक पौराणिक और मिथकीय नदी ज़रूर है लेकिन वो मनुष्य के उद्धार के लिए ही पृथ्वी पर लाई गई है.'' उनका कहना है,'' गंगा सिर्फ़ शिशुओं के बाल बहाने और अस्थि प्रवाह और गंदे नालों का पानी डालने के लिए ही नहीं है. अगर बांध बनने से ऊर्जा का संकट हल होता है, पहाड़ का विकास होता है तो गंगा अपने प्राकृतिक प्रवाह में बहे या सुरंगों में इससे क्या फ़र्क पड़ता है.” इस बीच गंगा बचाने के लिए योगगुरू रामदेव भी मैदान में आ गए हैं और उनके नेतृत्व में गंगा रक्षा मंच का गठन किया गया है. इस मंच में धर्म प्रचारक, साधु-संत और विश्व हिदू परिषद के नेता भी शामिल हैं. इस मंच ने गंगा को विश्व धरोहर घोषित करने की मांग की है. |
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