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'हिंदू विवाह क़ानून घर तोड़ रहा है' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई है कि हिंदू विवाह अधिनियम जितने घर बसा नही रहा उससे ज़्यादा घरों को तोड़ रहा है. तलाक़ के एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के एक पीठ ने यह टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तलाक़ के बढ़ते मामलों का बुरा असर परिवार के बच्चों पर पड़ता है. तलाक़ और चिंता वर्ष 1955 में बने इस क़ानून में कई बार संशोधन किया जा चुका है. इसमें हिंदू विवाह की वैधता, वैवाहिक अधिकार और तलाक़ को परिभाषित किया गया है. पहले भारतीय विवाह पद्धति में तलाक़ का कोई प्रावधान या प्रचलन नहीं था और संसद ने क़ानून पारित करते हुए जब इसमें तलाक़ का प्रावधान किया तो इसे ब्रिटिश क़ानून से लिया गया था. तलाक़ ले चुके दंपति के बीच बच्चे को रखने के मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत और न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी ने कहा, "हिंदू विवाह अधिनियम घर जोड़ने से ज़्यादा तोड़ रहा है." उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा, "अब तो शादी के समय ही तलाक़ की अग्रिम याचिका तैयार कर ली जाती है." पीठ ने कहा, "माँ-बाप को बच्चों की ख़ातिर अपने अहं को दरकिनार कर देना चाहिए." अदालत का कहना था कि अलग होकर रहने वाले पति-पत्नी की तुलना में बच्चों का भविष्य ज़्यादा महत्वपूर्ण है. पीटीआई के अनुसार न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत ने कहा, "आख़िरकार तकलीफ़ बच्चे को होती है. यदि वह लड़की हुई तो उसकी पीड़ा बढ़ जाती हैं, ख़ासकर उसके अपने विवाह के वक़्त." अदालत का कहना था कि पारिवारिक जीवन में पहले भी समस्याएँ आती थीं लेकिन उन्हें घर के भीतर ही सुलझा लिया जाता था. हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार तलाक़ लेने के लिए कई आधार बताए गए हैं, जिनमें विश्वासघात, क्रूरता, धर्मपरिवर्तन, मानसिक रोग, यौनरोग आदि है. |
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