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प्यार, दुलार या धन का पलड़ा भारी! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कुछ लोग इस घटना को शायद ममता पर धन की जीत कहेंगे जबकि कुछ बदलते पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों का प्रतिबंब. आमतौर पर बच्चों को माँ के नज़दीक माना जाता है लेकिन शायद अब दौर बदल रहा है और एक रौबदार और कड़े आनुशासन वाले पिता की छवि भी बदल रही है. लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू ये भी है कि क्या ऐसा भी कोई बच्चा हो सकता है जिसे अगर माँ और बाप में से किसी एक को चुनने का मौक़ा मिले तो वह माँ को नहीं चुनकर बाप को चुने. आमतौर पर तो यही समझा जाता है कि माँ की ममता भौतिक चीज़ों से ऊपर होती है मगर मुंबई में तो एक ऐसा फ़ैसला आया है जिसमें ममता पर भौतिकवाद हावी हो गया है. पति-पत्नी की तलाक का मामला अदालत में पहुँचा और जब बात 11 वर्ष के बेटे पर आई कि वह माँ और बाप में से किसे चुनना पसंद करेगा तो बच्चे ने बाप के साथ रहने का रास्ता चुना. कहा तो यही गया है कि बच्चे ने बाप को इसलिए चुना क्योंकि उसके पास ज़्यादा धन-दौलत है इसलिए उसकी देखभाल अच्छी तरह हो सकती है. इस बच्चे का नाम क़ानूनी वजह से ज़ाहिर नहीं किया जा सकता. उसने जज से कहा कि वह अपने माता-पिता दोनों को ही प्रेम करता है लेकिन जहाँ तक साथ रहने की बात है तो वह अपने पिता के साथ रहना पसंद करेगा. बच्चे का यह बयान सुनने के बाद अदालत ने पिता के पक्ष में फ़ैसला सुना दिया और बच्चे को पिता को सौंपने का आदेश देते हुए कहा कि अदालत को बच्चे की परिपक्वता पर पूरा भरोसा है. भारतीय क़ानून के तहत पाँच साल से कम उम्र के बच्चों को तो सिर्फ़ माँ की ही देखभाल में रखा जा सकता है, बहुत ही असाधारण हालात में बच्चों की ज़िम्मेदारी पिता को दी जाती है. जब बच्चा दस साल की उम्र पूरी कर लेता है तो भारतीय अदालतों में यह आम चलन हो गया है कि वे बच्चों की राय जानना पसंद करते हैं और अक्सर मामलों में बच्चों की राय को वज़न दिया जाता है. परिपक्वता मुंबई की अदालत ने कहा है कि यह फ़ैसला बच्चे की राय को ध्यान में रखते हुए ही दिया गया है, "हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि बेशक बच्चे का झुकाव काफी़ हद तक पिता की तरफ़ है क्योंकि उसे अपनी ख़ुशहाल जीवनशैली नज़र आ रही है जो उसे संपन्न पिता से मिल सकती है." अदालत ने यह भी कहा, "लेकिन यह कहना भी ग़लत होगा कि सिर्फ़ एक यही वजह है जिसकी बजह से बच्चा अपने पिता के साथ रहना चाहता है. ऐसा लगता है कि बाप-बेटे के बीच मज़बूत भावनात्मक रिश्ता बन चुका है." न्यायालय ने कहा कि बच्चे की राय को वज़न दिया गया है और अदालत के लिए यह बच्चा काफ़ी परिपक्व लगता है और उसकी परवरिश भी संतुलित तरीके से हुई लगती है. अपनी उम्र के नज़रिए से तो बच्चे ने काफ़ी परिपक्वता दिखाई है.
"हालाँकि अदालत यह देख सकती है कि बच्चा अपने माता-पिता के संबंध टूट जाने की वजह से कितना दबाव में है. ज़ाहिर है कि बच्चा दोनों के बीच पैदा हुई कड़वाहट के बीच ऐसे फँस गया है जैसे कि गेहूँ और चक्की में घुन पिस जाता है. बच्चे ने अदालत को बताया कि वह अपने माता-पिता को बराबर प्रेम करता है लेकिन वह चाहता है कि उसे उसके पिता को सौंपा जाए." इस लड़के के माता-पिता संपन्न मुस्लिम हैं और उनकी शादी 1997 में हुई थी. उसी साल यह बच्चा भी पैदा हो गया था. दो साल बाद यानी 1999 में इस जोड़े ने अलग होने का फ़ैसला कर लिया. उस समय जब तलाक हुआ तो बच्चा माँ को सौंपा गया और पिता को उससे जब-तब मिलने की इजाज़त दी गई थी. ख़ुशहाल जीवनशैली वर्ष 2003 में पिता ने मुस्लिम क़ानून के एक प्रावधान के आधार पर बच्चे को पाने के लिए अदालत में अपील दायर की. मुस्लिम क़ानून के उस प्रावधान में कहा गया है कि जब बच्चा सात साल की उम्र पूरी कर लेता है तो माँ पर उसका प्राकृतिक अधिकार ख़त्म हो जाता है. जज ने अप्रैल 2007 में बच्चे की राय जानने के लिए उससे बातचीत की और अदालत ने महसूस किया कि बच्चा प्यार और दुलार के अलावा संपन्न और ख़ुशहाल जीवनशैली की तरफ़ भी आकर्षित था. हालाँकि उसकी माँ ने भी उसका ख़ूब ख़याल रखा था और उसे एक अच्छे स्कूल में पढ़ाया भी जा रहा था लेकिन जब अदालत में माँ और बाप में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया गया तो उसने अपने पिता को चुना. अदालत ने माँ की इस बात के लिए सराहना की है और उसे शाबाशी दी है कि उसने अपने बच्चे की इतनी अच्छी और परिपक्व परवरिश की और ख़ासतौर से अपने पति से संबंध बिगड़ने के बावजूद उसने अपने बच्चे को अपने पति के ख़िलाफ़ नहीं भड़काया. जज ने कहा, "हमने पाया है कि माँ भी बच्चे की अच्छी परवरिश करने और उसकी पूरी देखभाल करने में किसी तरह से कम नहीं रही है. दुनिया में बच्चे के लिए माँ की जो जगह है उसे कोई और तो ले ही नहीं सकता है लेकिन हमारे लिए जो वज़नदार बात है वो ये कि बच्चे ने ख़ुद ही अपने पिता के साथ रहने की मंशा ज़ाहिर की है." अदालत ने कहा कि माँ शनिवार-रविवार और छुट्टियों में अपने बच्चे से मुलाक़ात कर सकती है और बच्चे को अदालत की मंज़ूरी के बिना देश से बाहर नहीं ले जाया जा सकता है. क़ानूनी जानकारों का कहना है कि माँ अगर चाहें तो इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती है. | इससे जुड़ी ख़बरें माँ के दूध से बेहतर 'आईक्यू'07 मई, 2008 | विज्ञान 'पाकिस्तान में बाल शोषण बढ़ रहा है'18 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस 'आज भी भारत में लाखों बाल मज़दूर हैं'10 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस राजस्थान में तलाक़शुदा महिलाएँ मुश्किल में13 जून, 2007 | भारत और पड़ोस तीन में से दो बच्चों के साथ 'दुर्व्यवहार'09 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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