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शुक्रवार, 18 जनवरी, 2008 को 16:33 GMT तक के समाचार
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'पाकिस्तान में बाल शोषण बढ़ रहा है'
'पाकिस्तान में बाल शोषण बढ़ रहा है'
बहुत से बच्चों को शिक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं मिल पाती हैं
एक मानवाधिकार संगठन ने कहा है कि पाकिस्तान में बच्चों का शोषण, उनका अपहरण और उनके ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों में बढ़ोत्तरी हो रही है.

लॉयर्स फ़ॉर ह्यूमन राइट्स एंड लीगल एड (एलएचआरएलए) यानी मानवाधिकार और क़ानूनी सहायता नामक इस संगठन ने कहा है कि साल 2006 में बच्चों के ख़िलाफ़ इस तरह के मामलों की संख्या 617 थी जो वर्ष 2007 में बढ़कर 1595 हो गई यानी दो गुना से भी कहीं ज़्यादा.

संगठन की राय है कि देश में क़ानून लागू करने में कमज़ोरी और बाल अधिकारों के लिए समाज के दकियानूसी नज़रिए की वजह से इस तरह के मामले बढ़ रहे हैं.

मध्य पूर्व और यूरोप के देशों के लिए दक्षिण एशिया के देशों से जो बच्चों की तस्करी होती है उसमें पाकिस्तान से भी बहुत से बच्चों को शिकार बनाया जाता है.

इस मानवाधिकार संगठन के मुखिया ज़िया ऐवान का कहना था, "महिलाओं की ही तरह बच्चे भी बहुत आसान निशाना होते हैं क्योंकि पाकिस्तान जैसे दकियानूसी सोच वाले समाज में बच्चों को निजी संपत्ति समझा जाता है."

यह संगठन पाकिस्तान में बच्चों के अपहरण और उनके साथ होने वाले शोषण के मामलों पर नज़र रखता है. इस संगठन को ब्रिटेन के एक ग़ैरसरकारी संगठन सेव द चिल्ड्रन से वित्तीय सहायता मिलती है.

ज़िया ऐवान का कहना है कि बाल शोषण के मामलों में इसलिए भी बढ़ोत्तरी हो रही है क्योंकि क़ानून लागू करने वाली एजेंसियाँ इस मुद्दो को गंभीरता से नहीं लेतीं.

उनका कहना था, "इस मुद्दे से निपटने के लिए क़ानून मौजूद हैं लेकिन उन पर सख़्ती से अमल ही नहीं कराया जाता है. यही वजह है कि बाल शोषण करने वालों को कोई डर नहीं और उन्हें एक तरह से बढ़ावा ही मिलता है."

ज़िया ऐवान का कहना है कि बाल शोषण के मामले दरअसल कई हज़ारों में हो सकते हैं लेकिन बहुत से मामले सामने नहीं आते हैं, "जो मामले सामने आते हैं वो एक बड़ी समस्या का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है. 80 प्रतिशत मामलों का तो पता ही नहीं चलता है."

जिन बच्चों का अपहरण कर लिया जाता है उनके माता-पिता इसकी सूचना पुलिस के देने के बजाय ख़ुद ही अपहर्ताओं के साथ सौदेबाज़ी करके बच्चों को छुड़ाने की कोशिश करते हैं.

इस संगठन ने अपनी यह रिपोर्ट अख़बारों की ख़बरों पर आधारित की है जिसमें पुलिस के आँकड़ों को आधार बनाया गया है.

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