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75 प्रतिशत तलाक़ महिलाओं की ओर से! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लगातार चार पीढ़ियों तक बेगमों की हुकूमत देख चुके भोपाल में मुसलमान महिलाओं के मिज़ाज बदल रहे हैं. और इसका असर यह है कि इस समाज में अब मर्दों के मुकाबले औरतें आगे बढ़कर अपने शौहर से तलाक़ ले रही हैं. आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल जो तलाक़ के मामले दर्ज हुए उनमें से तीन चौथाई यानी 75 प्रतिशत से ज़्यादा औरतों की ओर से लिए गए तलाक़ थे. इस्लाम में इजाज़त दी गई चीज़ों में तलाक़ सबसे ज़्यादा नापसंद बताया गया है. लेकिन इसके बावजूद लंबे समय से एकतरफा तलाक़ की तकलीफ सह रही महिलाएँ अब मर्दों का और जुल्म सहने के लिए तैयार नहीं. अगर भोपाल के कज़ीयात में मौजूद रिकॉर्ड पर नज़र डालें एकबारगी यक़ीन करना मुश्किल होगा. नैतिकता या आर्थिक आत्मनिर्भरता? आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल हुए 241 तलाक़ में से 185 में महिलाओं ने अपनी मर्ज़ी से वैवाहिक रिश्ते को ख़त्म किया. यानी 77 प्रतिशत तलाक़ महिलाओं ने लिए.
समाज में आया ये बदलाव मज़हबी गुरू, महिलाओं और मनोवैज्ञानिकों सबको हैरान कर रहा है. इन सबकी राय में मुसलमान महिलाओं का बदलता स्वरूप किसी भी हालत में समाज के लिए अच्छा नहीं है. शहरकाज़ी मौलाना अब्दुल तलीफ ख़ान के मुताबिक, "मियाँ-बीबी के झगड़े में सबसे ज़्यादा नुकसान बच्चों को उठाना पड़ता है. मानसिक रूप से आहत ये बच्चे अपने पारिवारिक बिखराव की पीड़ा ताउम्र भुगतते हैं." शहरकाज़ी का कहना है कि उनकी कोशिश पति-पत्नि में सुलह की होती है, लेकिन जब कोई और रास्ता नहीं रह जाता तो अलग होना ही बेहतर है. परिवारों के बिखराव को देखने का हर शख़्स का अपना नज़रिया है. कोई इसके लिए नैतिक मूल्यों में आई गिरावट को दोषी ठहरा रहा है तो कोई इसके पीछे महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता को देख रहा है. महिलाओँ के हक़ के लिए लड़ने वाली नुसरत बानो रूही कहती हैं कि महिलाओं द्वारा तलाक़ लेने के मामले किसी भी सूरत में खुश करने वाले तो नहीं ही हैं. उनका कहना है, "इस्लाम तलाक़ को मान्यता और इजाज़त देता है. मगर अभी तक इस मर्दों की दुनिया में उसे एक हथियार के तौर पर ही आदमी अपनी ताकत दिखाने के लिए इस्तेमाल करता रहा है." इतिहास शिक्षाविद् अफ़ाक अहमद इसे समाजिक मूल्यों में आ रहे बदलाव और भोपाल में 120 साल तक की गई औरतों की हुकूमत के तौर पर देखते हैं. भोपाल में नवाब शाहजहाँ बेगम, सिकंदरजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने समाज में भारी बदलाव किया और औरत को वो मुकाम दिया जो मुल्क में दूसरी जगह उन्हें हासिल नहीं था. मौलाना इसहाक खान को आज के वक्त टीवी में दिखाए जाने वाले सीरियलों से भी ऐतराज़ है. उनका कहना है, "ये टेलीविज़न सीरियल्स अलगाव में अहम भूमिका निभाते हैं." वे मानते हैं, "लड़कियाँ एक बड़ा वक़्त ऐसे कार्यक्रम में बर्बाद करती हैं, जिसमें हर तरह की सामाजिक बुराई को दिखाया जाता है. और धीरे-धीरे महिलाओं के मन में ये बात घर कर गई है कि अलगाव बेहतर ज़िंदगी देता है और इनमें से इसी का अनुसरण कई औरतें अपनी ज़िंदगी में करती हैं." हालाँकि 'ख़ुला' के ज़रिए अपने शौहर से तलाक़ लेने वाली औरतें इन तमाम बातों से इत्तिफाक़ नहीं रखतीं. इन महिलाओं का कहना है कि उनके मामले में मसला अलग था. टीवी में दिखाई जाने वाली ज़िंदगी से उनका कोई वास्ता नहीं था. पेशे से चार्टड एकाउंटेंट अमरीन की शादी ओमान में निजी कंपनी में काम करने वाले एक लड़के से हुई. शादी के बाद उसे ये महसूस होने लगा कि दोनों की नौकरियों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है. वहीं से दोनों के बीच दूरियाँ शुरू हो गईं और आख़िर में अमरीन ने अलग होने का फ़ैसला कर लिया. सामाजिक और आर्थिक असानता भी बहुत सी औरतों को अपने शौहर से अलग होने के लिए मजबूर कर रही है. ऐसा ही एक मामला है निदा का है जो एक कंपनी में काम करती थी, जिसकी शादी दूर के रिश्ते के भाई से हुई थी, जो पेशे से व्यावसायी था. कुछ वक़्त बाद ही उसे व्यवसाय में नुकसान होने लगा. लड़ाई-झगड़ा रोज़ की बात हो गई और बात इस हद तक पहुंच गई की तलाक की नौबत आ गई. आर्थिक मज़बूती ने निदा को इस रिश्ते को ख़त्म करने का साहस दिया. अभी यह पता लगना शेष है कि आर्थिक मज़बूती और आत्मनिर्भरता का असर सिर्फ़ भोपाल में ही ऐसा है या फिर दूसरी जगह भी इसका असर वैसा ही है. औरतों को हक़ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की भोपाल बैठक में मॉडल निकाहनामें को मंज़ूरी मिलने के बाद महिलाओं की स्थिति में एकदम से ख़ास बदलाव की कोई उम्मीद नहीं है.
बोर्ड की महिला सदस्य उज़मा नाहिद का कहना है कि तलाक़ लेने का हक़ औरत को भी दिया जाना चाहिए. उनका कहना है, "औरतें उस तरह से जज़्बाती नहीं होतीं जैसे कि मर्द होते हैं और खड़े-खड़े तलाक दे देते हैं." एक और महिला सदस्य हसीना हाशिया मानती हैं कि मॉडल निकाहनामे का अगर सही तरीके से पालन होगा तो महिलाओँ की स्थिति में बदलाव देर सवेर ज़रूर आएगा. दूसरी तरफ बोर्ड के सचिव अब्दुल रहीम कुरैशी का कहना है कि सारी कोशिश तलाक़ के मामलों को कम करने के लिए ही की जा रही है. वहीं वे यह भी मानते हैं कि हालात उतने बदतर नहीं है, जितना बताया जा रहा है. |
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