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सोमवार, 09 जून, 2008 को 11:32 GMT तक के समाचार
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भारत में सबसे ज़्यादा सड़क दुर्घटनाएँ

दिल्ली में ट्रैफ़िक
भारत में सड़क सुरक्षा को लेकर जागरुकता की कमी है
भारत की एक सरकारी समिति के मुताबिक भारत में सड़क हादसों में हताहत होने वाले लोगों की संख्या दुनिया में सबसे ज़्यादा है.

वर्ष 2006 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक उस वर्ष एक लाख से ज़्यादा लोग सड़क दुर्घटना में मारे गए जबकि 20 लाख से भी ज़्यादा लोग बुरी तरह घायल हो गए.

अस्त-व्यस्त सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं की भारी आर्थिक और सामाजिक क़ीमत भारत को चुकानी पड़ती है.

भारत को अपने सकल घरेलू उत्पाद का तीन प्रतिशत प्रति वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में खोना पड़ता है. ज़्यादातर दुर्घटनाएँ ग्रामीण इलाक़ों में घटती है.

एक अध्ययन के मुताबिक सड़क दुर्घटना में परिवार के मुख्य कर्ताधर्ता के खोने के बाद 70 प्रतिशत परिवार कालांतर में ग़रीबी रेखा के नीचे आ जाते हैं.

मानव निर्मित इस व्याधी से मरने वाले लोगों की संख्या एड्स, टीबी और मलेरिया जैसी बीमारियों से मरने वालों से कहीं ज़्यादा है. फिर भी इससे निपटने के लिए बहुत की कम पैसे खर्च किए जाते हैं.

राष्ट्रीय संकट

पटना में सड़क दुर्घटना (फ़ाइल फ़ोटो)
हाल के वर्षों में सड़कों पर वाहनों की संख्या में काफ़ी वृद्धि हुई है

सड़क सुरक्षा के लिए काम करने वाले रोहित बलुजा कहते हैं, "यह एक राष्ट्रीय संकट है. न सिर्फ़ दुर्घटना में हताहत लोगों की संख्या बढ़ रही है बल्कि सड़को के नियम का पालने नहीं करने वालों की संख्या भी बढ़ रही है. इसे रोकने के लिए मज़बूत राजनीतिक इच्छा शक्ति की ज़रुरत है."

हाल में सरकार ने इस मामले पर क़दम उठाया है. राष्ट्रीय और राज्य के स्तर पर नई सड़क सुरक्षा एजेंसियों के गठन के लिए क़ानून बनाने के लिए राजनीतिक कार्रवाई की जा रही है.

आलोचकों का कहना है कि यह प्रक्रिया महज़ एक नौकरशाही फेरबदल तक ही सीमित रह जाएगी. लेकिन इस नई योजना के पीछे काम करने वाले इसका खंडन करते हैं.

सड़क सुरक्षा के लिए बने विशेष सरकारी समिति की अध्यक्षता करने वाले संजीवी सुंदर कहते हैं, "हम एक युद्ध लड़ रहे हैं और इसके लिए हमें कुशल सेना की आवश्यकता है और हमने इस बात ही सिफ़ारिश की है."

अच्छी सड़क, कुशल चालक और क़ानून को लागू करने की तुरंत आवश्यकता है.

 यह एक राष्ट्रीय संकट है. न सिर्फ़ हताहत लोनो वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है बल्कि सड़को के नियम का पालने नहीं करने वालों की संख्या भी बढ़ रही है. इसे रोकने के लिए मज़बूत राजनीतिक इच्छा शक्ति की ज़रुरत है
रोहित बालुजा, एक कार्यकर्ता

भारत में इस समय बिना किसी तरह की जाँच-परीक्षा के ड्राइविंग लाइसेंस ख़रीदना बेहद आसान है.

एक सड़क दुर्घटना में 12 वर्ष पहले विकलांग हुए हरमन सिंह सिंधु कहते हैं, "लोग सड़क सुरक्षा का ध्यान नहीं रखते हैं. जब वे व्यक्तिगत रूप से इससे प्रभावित होते हैं तब ही वे इस पर ध्यान देते हैं."

हाल ही में सड़क सुरक्षा से संबंधित एक प्रशिक्षण में हिस्सेदारी करने वाले दो ट्रक ड्राइवरों से बात करने पर मैने पाया कि उनमें से एक को यह पता नहीं था कि आपातकालीन सेवाओं के समय दूसरे वाहनों को पहले जाने दिया जाना चाहिए, जबकि दूसरे चालक को सड़कों पर मौजूद कई निशानों के संबंध में जानकारी नहीं थी.

सड़क दुर्घटना में सबसे ज़्यादा ख़तरा पैदल चलने वालों को रहता है.

संजीवी सुंदर कहते हैं, "बच्चे जब छोटे रहते हैं तब बीमारियों से हम उनको बचाते हैं लेकिन बाद में हम उन्हें मरने के लिए छोड़ देते हैं. हमें इस बारे में ज़ल्दी क़दम उठाने होंगे."

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