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मंगलवार, 03 जून, 2008 को 12:36 GMT तक के समाचार
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हत्याओं के मामले में भारत सबसे ऊपर

पुलिस
राजधानी दिल्ली में पिछले कुछ सालों में हत्या के अनेक मामले चर्चा में रहे हैं
दिल्ली में जारी आँकड़ों के अनुसार दुनिया में सबसे ज़्यादा हत्याएँ भारत में होती हैं.

सरकार की एक नई रिपोर्ट का कहना है कि पिछले साल 32,719 हत्याएं रजिस्टर की गई थीं जो उसी साल अमरीका में हुई हत्याओं का दुगना है और पाकिस्तान में हुई हत्याओं से तीन गुना है.

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में अपराध की असली दर तो इससे कहीं ज़्यादा होगी क्योंकि यहाँ अनेक मामले तो रजिस्टर ही नहीं हो पाते हैं.

इस रिपोर्ट के अनुसार, अगर जनसंख्या को ध्यान में रखा जाए तो हत्याओं की दर दक्षिण अफ़्रीका में सबसे ज़्यादा है.

कुल मिलाकर, भारत में 2007-08 में अपराध के 50 लाख मामले दर्ज किए गए जिनमें हत्या, बलात्कार और नशीली दवाओं के मामले शामिल हैं.

यह रिपोर्ट राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने तैयार की है और इसे भारतीय गृह मंत्रालय ने जारी किया है.

भारत में हत्या की दर एक लाख लोगों पर तीन की है जबकि बलात्कार की दर एक लाख लोगों पर दो की है.

चर्चित मामले

भारतीय राजधानी दिल्ली में जहाँ पिछले कुछ सालों से हत्याओं के अनेक चर्चित मामले सामने आए हैं, वहाँ 2006 के बाद से हत्याओं की संख्या में करीब दो फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है.

पुलिस
अनेक मामलों को तो पुलिस दर्ज ही नहीं करती

दुनिया भर से आँकड़े जुटाने वाले इस रिपोर्ट के लेखक कहते हैं कि हत्याओं के मामले में भारत 30,960 की संख्या के साथ दक्षिण अफ़्रीका के बहुत नज़दीक है.

इसी दौरान अमरीका में 16,692 हत्याएं दर्ज हुई हैं जबकि पाकिस्तान में इस बीच 9, 631 हत्याएं दर्ज की गई हैं.

अगर जनसंख्या में अंतर को ध्यान में रखा जाए तो दक्षिण अफ़्रीका कहीं ज़्यादा ख़तरनाक स्थान के रूप में सामने आया है जहाँ एक लाख लोगों में 65.27 लोगों की हत्याएं और 115.8 बलात्कार होते हैं.

अपराध के बढ़ते जाने से भारतीय अधिकारियों की खिंचाई होती ही रहती है.

सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह ने बीबीसी से कहा कि अपराध के असली आँकड़े इससे कहीं ज़्यादा हो सकते हैं क्योंकि अनेक राज्यों की सरकारें अक्सर अपने सही आँकड़े नहीं प्रदर्शित करती हैं.

उन्होंने कहा, "ऐसे भी वाकये होते हैं जब पुलिस शिकायत दर्ज करने से इंकार कर देती है."

प्रकाश सिंह ने कहा कि एनसीआरबी जैसी संस्था को अपने आँकड़ों के लिए राज्य सरकारों पर निर्भर रहना पड़ता है. इस पर शोध करने के लिए कोई स्वायत्त संस्था नहीं है. वह राज्यों से आँकड़ों की माँग करते हैं जिन्हें पहले संग्रह किया जाता है फिर रिपोर्ट की तरह पेश किया जाता है.

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