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'सरकार में इच्छाशक्ति की कमी' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के कुछ गै़र सरकारी संगठनों (एनजीओ) ने गुरुवार को एक सम्मेलन कर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए सरकार के चार साल के कार्यकाल की आलोचनात्मक समीक्षा की. इन संगठनों ने किसानों, महिलाओं, शिक्षा, काम के अधिकार, समाज के पिछड़े तबकों के विकास के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम में किए गए वादे और उन पर हुई कार्रवाई पर नज़र डाली है. इस समीक्षा के लिए इन ग़ैरसरकारी संगठनों ने दिल्ली में एक सम्मेलन आयोजित किया. सम्मेलन का आयोजन एक्शन एड, सीएएसए, सीबीजीए, सीडीएसए, सीएचएसजे, द हंगर प्रोजेक्ट, एनसीडीओआर, एनसीएएस, एनसीडीएचआर, एनएसडब्ल्यूसी, संसद, ऑक्सफ़ैम, प्रवाह, पीडब्ल्यूईसीएसआर, ओडब्ल्यूएसए और वादा नहीं तोड़ अभियान जैसे ग़ैर सरकारी संगठनों ने किया था. सम्मेलन में इन संगठनों ने माना कि सरकार ने राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना, किसानों के कर्ज़ माफ़ करने, असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर तो अपने वादे के अनुसार क़दम उठाए हैं, लेकिन इन योजनाओं को लागू करने की प्रक्रिया पर इन संगठनों ने सवाल उठाए. दूर है लक्ष्य इन संगठनों का मानना था कि जिन 27 राज्यों में राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना पहले चरण मे लागू की गई थी, उनमें से ज़्यादतर राज्य इस योजना का लक्ष्य पाने मे नाकाम रहे. ध्यान रहे कि यूपीए सरकार ने इसे अपनी एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया है जबकि संगठनों का कहना है कि सरकार इस योजना के तहत महिलाओं को रोज़गार उपलब्ध कराने में नाकाम रही जोकि इस योजना का मुख्य लक्ष्य था. किसानों को क़र्ज़ दिलाने या फिर क़र्ज़ माफ़ी के मुद्दे पर इन संगठनों की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है की यह सही है कि किसानों को बैंकों से क़र्ज़ के लिए दोगुना धन उपलब्ध कराया गया है, पर अब भी 73 फ़ीसदी से ज़्यादा किसान क़र्ज़ के लिए साहूकारों पर निर्भर हैं. किसान नेता कृष्णबीर चौधरी ने सम्मेलन में कहा कि एक तरफ़ किसानों की दुर्दशा है तो दूसरी तरफ़ सरकार की ग़लत नीतियों और कुप्रबंधन की वजह से देश को अन्न आयात करना पङ़ता है. असुरक्षित हैं किसान-मज़दूर इस रिपोर्ट में कहा गया है कि किसानों के 60 हज़ार करोड़ रुपए के क़र्ज़ माफ़ करने के बावज़ूद लगभग 70 फ़ीसदी किसानों को इसका लाभ नही मिलेगा. इस सम्मेलन में सामाजिक सुरक्षा और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए सरकार के वादों पर हुई कार्रवाई की समीक्षा करते हुए कहा गया कि अब भी 93 फ़ीसदी मज़दूर असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं. उनकी सामाजिक सुरक्षा की जो योजना सरकार ने पेश की है वह बहुत सतही है. मज़दूर नेता असीम रॉय ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि इस दिशा मे सरकार की कोई इच्छाशक्ति ही नज़र नही आती है, या यूँ कहें कि यह विषय उसकी सूची में तो है पर प्राथमिकता पर नहीं है. ग़ैर सरकारी संगठनों ने यूपीए सराकर के चार सालों का आलोचनात्मक लेखा-जोखा पेश करने के साथ ही कुछ सुझाव भी सरकार को दिए हैं और कुछ माँगें भी रखी हैं. |
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