|
सफलता के 10 साल और सिर उठाते सवाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले 10 बरसों में सोनिया गांधी की राजनीति के क्षेत्र में सबसे बड़ी उपलब्धि है उनका न सिर्फ़ कांग्रेस के बिखराव को टालना बल्कि सभी संभावनाओं और राजनीतिक भविष्यवाणियों को ग़लत साबित करते हुए पार्टी को 2004 के लोकसभा चुनावों में अप्रत्याशित विजय दिलवाना. इसमें कोई शक नहीं है कि जब 1998 में सीताराम केसरी के बाद सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्षा का पद संभाला, तो पार्टी को सत्ता से बाहर हुए 2-3 साल हो चुके थे और केसरी के नेतृत्व या कहिए कि पार्टी के आलाकमान को कई मोर्चों से चुनौती मिलनी शुरू हो गई थी. सोनिया के अध्यक्ष बनने के बाद से हाईकमान का इक़बाल पार्टी में एक बार फिर से स्थापित हुआ. कुछ लोगों जैसे शरद पवार को उनके नेतृत्व एवं विदेशी मूल के मसले पर ऐतराज था इसलिए वो पार्टी से बाहर हो गए. यह अलग बात है कि आज शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र और केंद्र, दोनों ही जगहों पर कांग्रेस के साथ गठबंधन में है. करियर का चरम वर्ष 2004 में कांग्रेस को विजयी बनाना सोनिया गांधी के अबतक के राजनीतिक जीवन का चरम था. सब नाउम्मीद थे परंतु सोनिया गांधी ने भाजपा के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी मुहिम छेड़ी, देशभर में चुनावी सभाएं कीं और भाजपा के नेतृत्ववाले सत्ताधारी एनडीए के सामने अन्य दलों से चुनाव पूर्व समझौते करते हुए जनता के सामने एक मज़बूत राजनीतिक विकल्प रखने का क़ामयाब प्रयास किया.
इतना ही नहीं, 2004 के चुनावों में जीत के फ़ौरन बाद भी उन्होंने एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह अपने पत्ते खेले. जबतक 300 सांसदों का संख्या गणित यूपीए के पक्ष में नहीं हो गया और सरकार का बनना तय नहीं हो गया तबतक उन्होंने मनमोहन सिंह के नाम की घोषणा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नहीं की. त्याग और तालमेल उन्होंने प्रधानमंत्री का पद त्यागकर स्वयं को भी एक त्यागमयी और सत्ता के पीछे न भागनेवाली नेता के रूप में स्थापित किया और कम से कम उनके समर्थकों की दृष्टि में उनका क़द इसके बाद और भी बढ़ा. प्रधानमंत्री पद त्यागकर कई दिनों तक के लिए उन्होंने विपक्षी दलों, ख़ासकर भाजपा की बोलती बंद कर दी थी. एक और बात का श्रेय हम सोनिया गांधी को दे सकते हैं. तख़्त के पीछे की शक्ति चाहे वो ही हों पर सार्वजनिक तौर पर और पार्टी के नेताओं के समक्ष भी उन्होंने कभी भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सम्मान देने में कमी नहीं रखी. सत्ता और संगठन के बीच अच्छा तालमेल रहा. 10 जनपथ शक्ति का असली केंद्र बिंदु रहा पर रेसकोर्स स्थित प्रधानमंत्री निवास की सार्वजनिक गरिमा कभी कम नहीं की गई. इसका श्रेय सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह, दोनों की ही राजनीतिक परिपक्वता को जाता है. एक बार फिर सोनिया गांधी के बड़प्पन की भी दाद देनी होगी. ख़ासकर अगर हम उनकी तुलना एक अन्य रिमोट कंट्रोल वाले बालासाहेब ठाकरे से करें और याद करें कि किस तरह महाराष्ट्र के शिवसेना मुख्यमंत्रियों को कई बार शिवसेना प्रमुख सार्वजनिक रूप से उनकी असली जगह दिखाने से नहीं चूकते थे. कमज़ोर कड़ियां गांधी परिवार को न केवल कांग्रेस बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के भी प्रथम परिवार के रूप में स्थापित रखने में चाहे सोनिया गांधी क़ामयाब रही हों और पार्टी में उनके वर्चस्व को भी कोई चुनौती न हो पर उनके कट्टर समर्थक भी सोनिया गांधी को कांग्रेस पार्टी के वोटबैंक में आ रही लगातार गिरावट को रोक पाने का श्रेय नहीं दे पाएंगे. उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में, जहाँ से लगभग एक चौथाई लोकसभा सदस्य चुने जाते हैं, कांग्रेस की हालत पिछले 10 बरस में और सोचनीय ही हुई है और निकट भविष्य में ये समीकरण बहुत ज़्यादा बदलेंगे, इसकी संभावना कम ही है.
जातिगत समीकरणों में भी पिछले 10 बरसों में कांग्रेस ने खोया ही ज़्यादा है. बात चाहे दलितों की हो, ठाकुरों की या अन्य सवर्ण जातियों की, सभी वर्ग अन्य दलों और अन्य नेताओं के साथ ख़ुद को ज़्यादा जोड़कर देख रहे हैं. मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस के साथ सिर्फ़ उन्हीं राज्यों में हैं जहाँ उनके पास भाजपा के अलावा कोई और विकल्प नहीं है. यह तेज़ी से खिसकता हुआ वोटबैंक ही आज कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता है और यही सोनिया गांधी और गांधी परिवार की अगली पीढ़ी के नेता राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी है. राजनीतिक गणित सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशें लागू कर और किसानों का कर्ज़ा माफ़ कर कांग्रेस आलाकमान को उम्मीदै है कि अगले लोकसभा चुनावों में पार्टी की ग़रीबों, किसानों और अल्पसंख्यकों का वोट मिलेगा. अगर ऐसा होता है तो अगली सरकार बनाने के लिए उनका दावा मज़बूत होता है पर हाल की घोषणाओं का परिणाम कांग्रेस के वोट बैंक में बढ़त ही है, ऐसा सभी प्रेक्षक नहीं मानते क्योंकि राजनीति में हमेशा 2+2=4 नहीं होता. राजनीति में आगे रहने के लिए सिर्फ़ करिश्मा और जादुई व्यक्तित्व से ही काम नहीं चलता. भारत के मौजूदा राजनीतिक मानचित्र पर सफल होने के लिए जिस जुझारू शख़्सियत, कुछ हाथ और कुछ कपड़े गंदे गंदे हो भी जाएं तो कुछ फ़र्क नहीं पड़ता..वाली प्रवृत्ति और कुछ हद तक जिस राजनीतिक कौशल या कहें कि धूर्तता की ज़रूरत है, वह सोनिया गांधी में उतनी नहीं दिखती जितनी शायद उनकी सास इंदिरा गांधी में थी. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||