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सोनिया गाँधी की छवि पर सवाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार, झारखंड और हरियाणा के चुनाव संपन्न हुए. हरियाणा में कांग्रेस पार्टी की शानदार जीत का सेहरा सोनिया गाँधी के विश्वासपात्रों ने उनके सिर पहनाया. दूसरी ओर बिहार और झारखंड की स्थिति का ज़िम्मा उनके सिपहसालारों अर्जुन सिंह और माखनलाल फोतेदार पर मढ़ दिया गया. पर आज से लगभग दस माह पहले सोनिया गाँधी की त्याग की मूर्ति के रूप में जो छवि बनी थी उस पर उंगलियाँ उठने लगीं हैं. वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी का कहना है, '' लोगों में उनकी छवि को धक्का लगा है क्योंकि यह धारणा बन गई है कि सोनिया गांधी पीछे से सरकार चला रही हैं.'' उनका कहना है, ''कारण यह भी है कि मनमोहन सिंह काफी संकोची है और ऐसा कहा जाता है सरकार चलाने का काम वो करते हैं और सारे राजनीतिक फ़ैसले सोनिया गाँधी करती हैं.'' विश्लेषकों का मत है कि हाल के घटनाक्रम ने सोनिया गाँधी के आभामंडल में सेंध ज़रूर लगा दी है. आउटलुक पत्रिका के संपादक आलोक मेहता कहते हैं, ''मुझे लगता है कि कांग्रेस ने ढोल पीटा इसलिए उनकी ऐसी छवि बनी. पर कांग्रेस में कई ऐसे नेता दबी ज़बान में कहते हैं कि त्याग वाली स्थिति अब नहीं है.'' वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी का कहना है कि सोनिया गाँधी अपनी छवि का इस्तेमाल यूपीए को मज़बूत करने के लिए और कांग्रेस के पुनर्जन्म के लिए कर सकती थीं पर वैसा हुआ नहीं. गठबंधन धर्म गठबंधन धर्म के पालन के लिए कांग्रेस पार्टी कितनी तैयार है इस पर अब एक बार फिर चर्चा हो रही है.
तमिलनाडु में केंद्रीय मंत्री इवीकेएस इलागोवन के बयान कि कांग्रेस दूसरों को सत्ता में बनाए रखने के लिए राजनीति में नहीं है. इस बयान ने एक बार फिर कांग्रेस के गठबंधन के प्रति नजरिए को उजागर किया है. प्रभाष जोशी का मानना है कि कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बिहार और उत्तरप्रेदश में है और शायद यही कारण था कि कांग्रेस ने बिहार में ऐसा रुख अपनाया. उनका कहना है,''कांग्रेस यह कोशिश कर रही है कि वह दलितों और मुसलमानों का एक गठबंधन बनाए जिसे वह अपनी ऊँची जाति के समर्थन को पुष्ट करते हुए उत्तर प्रदेश और बिहार में अपनी ताक़त बढ़ाए. पर कांग्रेस ऐसा नहीं कर पायी.'' पर यह भी एक यथार्थ है कि केंद्र में सत्ता चलाने के अलावा सोनिया गांधी पर कांग्रेस पार्टी को मज़बूत करने का ज़िम्मा भी है. पर सवाल यह है कि जो नतीजे निकले उनसे शायद कुछ सीख भी कांग्रेस पार्टी को मिले. नीरजा चौधरी का मानना है,'' मुझे लगता है कि सलाहकार बदलने से ज़्यादा सोनिया गाँधी जिन लोगों की मदद से निर्णय ले रही हैं,उसे विस्तृत बनाए जाने की ज़रूरत है.'' उनका मानना है कि शुरू में जब वे कांग्रेस अध्यक्ष बनी थी तो 20-30 लोगों से हर बात पर राय लेती थी. सवाल है कि क्या अब कांग्रेस में आत्ममंथन होगा और पार्टी की कार्यप्रणाली बदलेगी आने वाले दिनों में ये तस्वीर शायद कुछ साफ़ होगी. |
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