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राहुल गांधी की नई पारी: एक विवेचना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पांच महीने पहले उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान जब राहुल गांधी मतदाताओं को तरह-तरह के आश्वासन दे रहे थे तो शायद जनता ने इस हिचकिचाते राजनीतिक नेता को गंभीरता से नहीं लिया था. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसा प्रतीत होता रहा है कि जैसे वे राजनीति के लिए बने नहीं हैं, उनपर राजनीति थोपी जा रही है. जब जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस की बागडोर संभाली थी तो उनके बारे में सरोजिनी नायडू ने कहा था कि 'ये उनकी ताजपोशी भी है और उनको सूली पर चढ़ाना भी' है. यही बात राहुल गांधी पर भी लागू होती है. क्या राहुल गांधी में ये काब़िलियत है कि वे कांग्रेस को अपने बेहतर दिनों की तरफ़ ले जा पाएँ ? कांग्रेस में युवा पीढ़ी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पुश्पेष पंत कहते हैं, "कांग्रेस में राहुल गांधी के साथ-साथ ज्योतीरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट और नवीन जिंदल जैसे कई युवा नेता हैं. अगर राहुल गांधी के बहाने कांग्रेस में एक नई पीढ़ी उभरती है तो इसे मैं एक बेहतर शुरुआत मानता हूँ." कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी गलती रही है कि वो सत्तर और अस्सी के दशक में पनप रहे नए जाति-समिकरणों को अपने से जोड़ने में सफल नहीं रही. वरिष्ठ पत्रकार जफ़र आगा मानते हैं कि राहुल गांधी के लिए हालात उतने आसान नहीं हैं जितने शायद उनके पिता राजीव गांधी के लिए थे. उनका मानना है, "राजीव गांधी जिस समय राजनीति में आए थे उस समय हिंदुस्तान की सामाजिक और सियासी राजनीति कुछ और थी. आज राजनीति में जाति और धर्म का असर इतना है कि कांग्रेस आज एक नेशनल पार्टी नहीं बची है." प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, "आज कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति करनी पड़ रही है. क्षेत्रिय पार्टियां उसके सहारे राजनीति कर रही हैं. इसे काबू करने में राहुल गांधी कामयाब नहीं हो पाएँगे. इसे वही अच्छी तरह काबू कर सकता है जिसे भारत की सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों की अच्छी समझ हो." राहुल की पहली परीक्षा
उत्तर प्रदेश के चुनाव में राहुल ने कांग्रेस के प्रचार का बीड़ा उठाया था. लेकिन पार्टी का प्रदर्शन पहले से भी बुरा रहा. लोग उन्हें सुनने और देखने तो आए लेकिन उन्होंने कांग्रेस को वोट नहीं दिया. पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता शाहनवाज़ हुसैन कहते हैं,"कांग्रेस ने राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश का इंचार्ज बनाया था, वहां वे पूरी तरह फ़्लॉप साबित हुए." उन्होंने कहा, "अब अगर कांग्रेस उन्हें पार्टी का महासचिव, वर्किंग प्रेसीडेंट या वाइस प्रेसीडेंट भी बना दे, उसका कांग्रेसियों को तो फ़र्क पड़ेगा लेकिन इसका देश या नौजवानों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला." सवाल ये है कि राहुल गांधी को ये ज़िम्मेदारी अब ही क्यों दी गई है? क्या ये कांग्रेस पार्टी के जल्द लोकसभा चुनाव कराने की मंशा का संकेत है? चुनाव की तैयारी जफ़र आग़ा ऐसा नहीं मानते. उनका कहना है, "वामपंथियों के परमाणु सहमति पर रवैए को देखते हुए अगले चार-पाँच महीने में चुनाव होने के अनुमान लगाए जा रहे हैं. ये समय राहुल के राजनीति में पाँव जमाने के लिए काफ़ी नहीं होंगा. इसलिए ऐसा नहीं लगता कि राहुल के आने से चुनाव जल्दी हो जाएँगे." उनका कहना है, "राहुल के महासिचव बनाए जाने के पीछे कोई बहुत बड़ा रहस्य नहीं छिपा हुआ. अगर अब ऐसा नहीं होता तो फिर उनकी कठिनाइयाँ और बढ़ जातीं." क्या राहुल को महासचिव बनाने से कांग्रेस की समस्यायों का हल निकलेगा, हालाँकि, अभी भी पार्टी के शीर्षस्थ पदों पर ज़्यातर बुर्ज़ुग नेताओं का ही कब्ज़ा है. इक्नॉमिक टाइम्स के राष्ट्रीय संपादक एमके वेणु मानते हैं कि र्सिफ़ राहुल गांधी के पद संभालने से कांग्रेस के अच्छे दिन नहीं आने वाले. उनका कहना है, "केवल राहुल को महासचिव बना देने से कांग्रेस की समस्याओं का समाधान नहीं हो जाएगा. राहुल को ज़मीनी स्तर पर काम करना होगा". एमके वेणु कहते हैं, "यदि वे एनएसयूआई और युवा कांग्रेस जैसे संगठनों के कार्यकर्ताओं को प्रेरित कर संगठन को मज़बूत कर सकते हैं तो कांग्रेस को कुछ लाभ हो सकता है, वर्ना यह पूरी क़वायद केवल चेहरा बदलने की बनकर रह जाएगी." लोगों की उम्मीदें राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वो ये संदेश दे सकें कि उनका इरादा अपनी विरासत के आधार पर राजनीति करने का नहीं, बल्कि उससे कहीं आगे जाने का है. प्रोफ़ेसर पुश्पेष पंत चाहते हैं, "यदि राहुल देश की राजनीति के केंद्र में बना रहना चाहते हैं तो उन्हें अपना मुँह खोलना होगा. उन्हें लोगों से बहस करनी पड़ेगी. राहुल को परमाणु सहमति के मुद्दे पर कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी की जगह ख़ुद बोलना चाहिए." सही या ग़लत, राहुल की पदोन्नती में अब वंशवाद की बू आती है. लेकिन क्या वो इसको एक चुनौती के रूप में बदल पाएँगे? यदि किसी सत्ताधारी पार्टी की प्रगति उसके प्रतिद्वंदी (इस समय भाजपा) की कमज़ोरियों पर ही निर्भर करती है, अपनी ताकत पर नहीं, तो आज या कल उसे झटका लगना स्वाभाविक है. देखना ये है कि राहुल गांधी इन परिस्थितियों से किस तरह निपटते हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें राहुल पर टिकी कांग्रेसियों की उम्मीदें01 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस 'राहुल को अनुभवहीन समझना ग़लती'22 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस लंबी पारी खेलने आया हूँ : राहुल गांधी05 मई, 2007 | भारत और पड़ोस नहीं चला राहुल के रोडशो का जादू11 मई, 2007 | भारत और पड़ोस राहुल गांधी कांग्रेस के महासचिव नियुक्त24 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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